प्रधान संपादक की कलम से

विकसित देश के दर्जे की तरफ भारत का जाना हमारे 'सॉफ्टवेयर' हिस्से यानी कि हमारे मानव संसाधन को रीकोड किए बिना पूरा नहीं होगा

भारत@100
भारत@100

लाल किले की प्राचीर से 76वें स्वतंत्रता दिवस के अपने भाषण में प्रधानमंत्री ने ऐलान किया: ''इस अमृत काल में हमें 140 करोड़ भारतीयों के सपने साकार करने के लिए काम करना होगा और 2047 में जब तिरंगा फहरेगा तब विश्व एक विकसित भारत का गुणगान कर रहा होगा.'' मगर सवाल यह है कि 100वें स्वतंत्रता दिवस तक चलने वाली इस चौथाई सदी में हम इस स्वर्ण युग की क्षमता को कैसे साकार करेंगे? अनुकूल अंतरराष्ट्रीय परिस्थितियों और ताकतवर नेतृत्व के मेल के साथ अपनी पूर्ण क्षमता को साकार करने के लिए भारत के पास स्थितियां बेशक पूरी तरह अनुकूल हैं. प्रधानमंत्री ने ''परफॉर्म, रिफॉर्म और ट्रांसफॉर्म'' शब्दों के जरिए गरज के साथ आह्वान किया है.

स्वतंत्रता दिवस के विशेष अंक में हमने उन 10 व्यापक क्षेत्रों की सूची बनाई है जिनमें समूचे सामाजिक और भौगोलिक विस्तार में बदलाव का अधिकतम सकारात्मक असर पड़ेगा. ये ऐसा जाल बिछाएंगे जिसके ऊपर गगनचुंबी मंजिलों—और आशा तथा खुशी जगाने वाली कहानियों—का निर्माण किया जा सकेगा. ये बड़े दस क्षेत्र हैं: ऊर्जा, कंप्यूटिंग, संचार, स्वास्थ्य, शिक्षा, खेती-बाड़ी, परिवहन, ई-कॉमर्स, ई-गवर्नेंस और प्रतिरक्षा. इनमें हरेक को तीन हिस्सों में बांटा गया है. जिनमें आमूलचूल बदलाव पहले ही दिखाई दे रहा है, जिनमें अंतरराष्ट्रीय स्तर पर धमक बनाने की क्षमता है और अपना रास्ता खुद परिभाषित करने के लिए जरूरी आग हमारे भीतर है. साथ ही, हम हर श्रेणी में बदलाव की अगुआई कर रहे किरदारों का परिचय भी लेकर आए हैं—इनमें अभी खुल ही रही संभावनाओं की ड्योढ़ी पर खड़े वैज्ञानिक, नवप्रवर्तक और दूरद्रष्टा शामिल हैं. यह भी महत्वपूर्ण है कि साथ ही साथ हम ऐसे स्वस्थ, हुनरमंद, ज्ञानवान नागरिक तैयार करने की कोशिशों को बल दें जो इस नई क्षमता और संभावना की चिंगारी को हवा दे सकें. हम यहां जो पेश कर रहे हैं, वह समग्रता में देखें तो सम्मोहक झांकियों की शृंखला है, जो बताती है कि कैसे हमारी जिंदगी का कायापलट हो सकता है और होगा.

मसलन ऊर्जा को हम ऐसे प्रिज्म से देख रहे हैं जो इसे तीन धाराओं में बांटता है: ग्रीन हाइड्रोजन ऊर्जा, बायो फ्यूल और बैटरी टेक्नोलॉजी. पहले दो में हमारे बीच बहुतायत से मौजूद ऊर्जा के स्रोतों को खोल देने की क्षमता है. तीसरा उस बिंदु पर पहुंचने की संभावना से भरपूर है जहां हम इसकी हैरतअंगेज मात्रा को जमा करके रख सकते हैं. हमारी हकीकतों को यह कितनी गहराई से बदलेगा? आमूलचूल. हाल के दशकों की चिंताएं 'पीक ऑयल' को लेकर थीं, यानी वह मुकाम जहां दुनिया में पेट्रोलियम के सारे ज्ञात संसाधनों का दोहन कर लिया गया होगा और उपलब्धता का ग्राफ नीचे गिरना शुरू हो जाएगा. इसी डर से भीषण युद्ध हुए, और शक्तिसंपन्नों के पक्ष में जलवायु परिवर्तन वार्ताओं का ताना-बाना बुना गया. मगर पेट्रोलियम 20वीं सदी का ईंधन था. अब हम ज्यादा परिष्कृत तत्वों से ऊर्जा हासिल करने के कगार पर हैं. दुनिया की सबसे तेज बढ़ती अर्थव्यवस्थाओं में से एक के लिए इसके निहितार्थ दूरगामी हैं.

ऐसी ही रोमांचक क्षमता कंप्यूटिंग और कम्युनिकेशन के क्षेत्रों में भी है. आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस इन दिनों खबरों में है, पर हमने अभी ट्रेलर भर देखा है. इसी तरह क्वांटम कंप्यूटिंग लॉन्चपैड के उसी चरण में है जहां एटम के बंटने से ठीक पहले विज्ञान था. इसके इर्द-गिर्द ज्ञान के समूचे चहचहाते पारिस्थितिकी तंत्र पर ज्यादातर पश्चिम का एकाधिकार है, लेकिन भारत मेधा और प्रतिभा के पंख पसारने में धन लगा रहा है. अप्रैल में केंद्रीय कैबिनेट से मंजूर 6,000 करोड़ रुपए का राष्ट्रीय क्वांटम मिशन (एनक्यूएम) इसी दिशा में एक कदम है. सेमीकंडक्टर कंप्यूटिंग के लिए वही हैं, जो थोड़ा अलग तरह से देखें तो बैटरी टेक्नोलॉजी ऊर्जा के लिए है. खुशकिस्मती से भारत चिप डिजाइनिंग में अपनी बढ़त पर गर्व कर सकता है. यह हमारे महारथियों की काबिलियत ही है जिसकी बदौलत पिछले 20 साल में सेमीकंडक्टर डिजाइन करने वाली दुनिया की शीर्ष कंपनियों ने हमारे यहां केंद्र स्थापित किए. उद्योग के एक जानकार ने हमें बताया, ''दुनिया के 20-25 फीसद चिप डिजाइनर हमारे यहां भारत में हैं.'' उम्मीद कीजिए कि हमारी नई अर्थव्यवस्था का जेनेटिक कोड ऐसी ही तिहरी कुंडली पर लिखा जाएगा.

कम्युनिकेशन यानी संचार में नई लहरें सुनामी जैसी हो सकती हैं. 6जी के साथ हम उस दहलीज को पार कर लेंगे जहां मानव जीवविज्ञान और डेटा बड़ी सहजता के साथ एकमेक हो जाएंगे, जहां लगभग होशमंद नेटवर्क हमारे इशारे तक समझ लेंगे और हमारी वर्चुअल मौजूदगी को होलोग्राम के जरिए बुलाया जाएगा. सैटेलाइट इंटरनेट रेडियोतरंग आधारित कनेक्टिविटी को सर्वसुलभ बनाने के लिए जमीनी चुनौतियों को लांघने में मदद करेगा, तो लाइ-फाइ रेडियो से ऊपर उठकर बिजली की रोशनी तक जाएगा और उसके जरिए संकेत भेजेगा. ई-गवर्नेंस या ई-कॉमर्स सरीखे धारा के विपरीत क्षेत्रों में मिलने वाले फायदों की कल्पना करना आसान है. पहले में ग्राम स्वराज 2.0 जैसा कुछ होता देखा जा रहा है, जिसके पीछे सार्वजनिक डिजिटल बुनियादी ढांचे का जबरदस्त विस्तार है; यह हर चीज को वर्चुअल दस्तावेज में बदल देता है और जनसेवाओं को निर्बाध ढंग से पहुंचाता है. ऐसी ही क्रांति की धूमधाम बाजार स्थलों में छाई है, जिसे ड्रोन के जरिए डिलिवरी, संपर्कहीन भुगतान और ओपन बैंकिंग सरीखी नई-नवेली चीजें आगे बढ़ा रही हैं.

विकसित देश के दर्जे की तरफ भारत का जाना हमारे 'सॉफ्टवेयर' हिस्से यानी कि हमारे मानव संसाधन को रीकोड किए बिना पूरा नहीं होगा. टेक्नोलॉजी रोशनी की तरह चौतरफा फैल रही हो तो स्वास्थ्य और शिक्षा भी अछूते नहीं रहेंगे. एआइ और जेनेटिक आधारित उन्नत चिकित्सा अकल्पनीय तरीकों से सब तक बराबर पहुंचने की संभावना से भरपूर है. मशीनें अब खुद सीखने में सक्षम हैं तो वे सिखाने में मददगार भी हो ही सकती हैं: भारत का लक्ष्य एसटीईएम या स्टेम ज्ञान का न्यायसंगत भंडार तैयार करना है जो विकास चक्र को खुराक दे सके. खेती के मोर्चे पर भारत को दूसरी हरित क्रांति की जरूरत है, जो इस क्षेत्र में परिष्कृत विशेषज्ञता और दूरदर्शी स्थितियों का निर्माण करे. दलहन और तिलहन में आत्मनिर्भर होने की तत्काल जरूरत देखकर पुराने दिनों के उतार-चढ़ाव याद आते हैं. इनसे हमें बचना होगा. हमें जिन बुनियादी बातों का ध्यान रखने की जरूरत है, उनका एक और प्रमुख घटक है: हमारी विशाल भौतिक जगहों को डिजिटल यूनिवर्स से जैसे चहचहाते नेटवर्कों में बदलना. यहां शो-स्टॉपर तेज-रफ्तार ट्रेनें होंगी. वह जोश और चुस्ती रक्षा क्षेत्र में आ गई है, जहां मेक इन इंडिया टर्बो-चार्ज से लैस इंजन साबित हो रहा है. स्वदेशी लड़ाकू विमान तेजस जल्द हमारे अपने व्यावहारिक ज्ञान के बल पर उड़ान भरेगा.

आगे के पन्नों पर आप जो पढ़ेंगे, वह हमें अपनी जिंदगी के हर पहलू की नए सिरे से कल्पना करने की हिम्मत देता है. उम्मीद करनी चाहिए कि इस सदी का बाकी हिस्सा न केवल भव्य और शानदार होगा, बल्कि उस पर वह छाप भी होगी जो बिल्कुल हमारी अपनी होगी.

-अरुण पुरी, प्रधान संपादक

Read more!