भारत@100 : दलहनी खेती ने अब दिखाया दम

भारत दालों का आयात घटाने और दलहनी खेती को बढ़ावा देने को लेकर प्रतिबद्ध रहा है. अब इस कवायद के असरदार नतीजे सामने आ रहे

आत्मनिर्भरता का रंग दिल्ली के बवाना इंडस्ट्रियल एरिया में एक दाल प्रोसेसिंग प्लांट
आत्मनिर्भरता का रंग दिल्ली के बवाना इंडस्ट्रियल एरिया में एक दाल प्रोसेसिंग प्लांट

भारत को आजाद होते ही अनाज के संकट का सामना करना पड़ा था. हालांकि, उसके बाद से कृषि क्षेत्र खासकर दलहन की पैदावार में काफी बदलाव देखने को मिला है. ठोस प्रयासों से देश दलहन के मामले में आत्मनिर्भर बनता गया है, और मौन रूप से ही सही पर यह एक क्रांति की तरह हुआ है. दलहन की खेती को बढ़ावा देने और आयात पर निर्भरता कम करने के सरकार के सक्रिय उपायों के खासे असरकारी नतीजे मिले हैं. 2017-18 और 2022-23 के बीच देश दाल आयात को पूरे 60 फीसद तक कम करने में कामयाब रहा है.

इसका श्रेय घरेलू पैदावार में 9 फीसद की वृद्धि को जाता है. इन उपलब्धियों से उत्साहित सरकार ने अगले तीन वर्षों के भीतर दलहन पैदावार में पूरी तरह आत्मनिर्भर बनने की महत्वाकांक्षी योजना बनाई है. इसके तहत पैदावार बढ़ाने के साथ प्रमुख दालों, खासकर अरहर, उड़द और मसूर की पैदावार में इजाफा लाने पर जोर है. पिछले सात वर्षों में देश में दाल की उपज 41 फीसद बढ़ी है, जो 655 किलोग्राम/हेक्टेयर से बढ़कर 924 किलोग्राम/हेक्टेयर हो गई है.

देश दलहन की पैदावार के मामले में अहम मुकाम पर है. दलहन पैदावार 2010-11 के दौरान 1.82 करोड़ टन थी जो 2021-22 में बढ़कर 2.69 करोड़ टन के रिकॉर्ड स्तर पर पहुंच गई. यह लगभग 48 फीसद की छलांग है. यह उछाल केवल पैदावार तक ही सीमित नहीं है; व्यवस्थित पहल की वजह से खेती के रकबे और उपज दोनों में तेजी से वृद्धि देखी गई है. वर्ष 2015-16 में 2.491 करोड़ हेक्टेयर में दालों की खेती की गई, जिसमें औसतन 656 किलोग्राम/हेक्टेयर उपज हुई. इसके विपरीत, 2021-22 में 3.03 करोड़ हेक्टेयर में दलहन की खेती हुई, जिससे औसतन 888 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर उपज प्राप्त हुई.

यह गेमचेंजर क्यों है 

इस तरह के सकारात्मक तथ्यों के बावजूद एक कड़वी सचाई भी है. पिछले साल प्रकाशित द्विवार्षिक राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण-5 के आंकड़ों से पता चला कि 16.6 फीसद पुरुषों और 29.4 फीसद महिलाओं ने कभी भी मांसाहारी भोजन का सेवन नहीं किया है. इससे देश में मजबूत शाकाहारी संस्कृति का अंदाजा लगता है. देश वैश्विक दलहन पैदावार में एक-चौथाई का योगदान देता है लेकिन वैश्विक उपज के लगभग 27 फीसद का यह उपभोग करता है. इससे भारतीय आहार में दालों की अहमियत का पता चलता है, जो आबादी के एक बड़े हिस्से के लिए प्रोटीन का महत्वपूर्ण स्रोत हैं.दालों के प्रमुख उत्पादक और महत्वपूर्ण उपभोक्ता दोनों के रूप में भारत की यह दोहरी भूमिका है और इसी वजह से दलहन की खेती को और बढ़ाने की जरूरत है.

दलहन की पैदावार बढ़ने का असर दूरगामी रहने वाला है. नीति आयोग के अनुमान के अनुसार, 2029-30 तक 3.26 करोड़ टन दालों की मांग होगी, जिससे खेती में तकनीकी तरक्की की आवश्यकता होगी. इस मांग के बावजूद, खाद्य फसलों के लिए विवादास्पद आनुवंशिक रूप से संशोधित (जीएम) फसलों पर देश का रुख अभी भी अनसुलझा है.

अभी इसका प्रयोग जीएम कपास तक ही सीमित है. राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा मिशन-दलहन (एनएफएसएम-दलहन) की स्थापना दलहन पैदावार बढ़ाने, गुणवत्तापूर्ण बीजों की खेती, कृषि टेक्नोलॉजी के प्रसार और सर्वोत्तम तौर-तरीकों को बढ़ावा देने पर ध्यान केंद्रित करने के लिए की गई थी. पिछले पांच वर्षों में देश में दालों के लिए न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) बढ़ाया गया है. हालांकि, चुनौतियां अब भी बरकरार हैं क्योंकि सरकारी एजेंसियां मूल्य स्थिरता के लिए सीमित स्टॉक खरीदती हैं. इस प्रकार दालों की कीमतों को बढ़ाने या किसानों को अलग-अलग तरह की फसलें लगाने के लिए प्रोत्साहित करने में नाकामी हाथ लगती है.

महारत हासिल करने के लिए भारत क्या करे

भविष्य का रास्ता ज्यादा उपज देने वाली किस्मों से कहीं आगे जाने का है. देश को दलहन की खेती बढ़ाने के लिए किसानों में विश्वास पैदा करने के वास्ते एक सतत नीतिगत ढांचे की आवश्यकता है. पिछले छह वर्षों में कई नीतिगत बदलाव देखे गए हैं, जो आंशिक रूप से 2015-16 में हर मौसम में लगातार सूखे के हालात की वजह से थे. इस वजह से कीमतें बढ़ीं. पूर्व कृषि सचिव सिराज हुसैन जैसे विशेषज्ञों का सुझाव है कि अगले सात वर्षों में दालों की उपज में 50 लाख टन की बढ़त हासिल करने के लिए धान की खेती का रकबा घटाया जाना चाहिए. हालांकि इसके लिए मजबूत नीति जरूरी है, जो दलहनी फसलों, खासकर सिंचित क्षेत्रों के लिए लाभदायक मूल्य की गारंटी दे सके.

दलहन की खेती मौसम पर आश्रित है, इसलिए लगातार सरकारी खरीद आवश्यक है. हालांकि, किसान न्यूनतम समर्थन मूल्य पर सरकारी एजेंसियों की ओर से दालों की सीमित खरीद और छिटपुट तौर पर बनाई जाने वाली व्यापार नीतियों से दुखी हैं. इससे खेती में इजाफे पर रुकावट पैदा होती है. इसलिए सरकार ने मूल्य समर्थन योजना के तहत आवंटन बढ़ाया और दाल खरीद के लिए मूल्य स्थिरीकरण कोष की स्थापना की. 2018-19 में खरीद 41.83 लाख टन के उच्च स्तर पर पहुंच गई लेकिन 2021-22 में यह घटकर 12.49 लाख टन रह गई. फिर, 2023-24 के लिए दोनों योजनाओं के आवंटन में भारी कटौती की गई है.

दलहन पैदावार में लगातार बढ़ोतरी के लिए नीतिगत स्थिरता, प्रोत्साहन और तकनीकी प्रगति के एक समग्र दृष्टिकोण की दरकार होगी, जो अंतत: देश की खाद्य सुरक्षा और इस मायने में आत्मनिर्भर बनने के लक्ष्यों में योगदान देगी.

बदलाव के अगुआ

1.भारतीय राष्ट्रीय कृषि सहकारी विपणन महासंघ (नैफेड)

• 1958 में स्थापित नैफेड 16 अधिसूचित फसलों की खरीद, भंडारण और उनका वितरण करता है. इनमें चना, अरहर, मूंग, सोयाबीन और मसूर जैसी दालें शामिल हैं
• सरकारी पहल पर स्थापित यह एजेंसी फसलों की खेती और उनके मूल्य निर्धारण में स्थिरता लाने के लिहाज से निर्णायक भूमिका में रही है

2. भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद(आइसीएआर)

• यह इस प्रमुख अनुसंधान संस्थान के ही प्रयासों का नतीजा है जिसके चलते पिछले दशक में ज्यादा उपज देने वाली दालों की 300 से ज्यादा किस्मों को व्यावसायिक खेती के लिए अधिसूचित किया गया.

Read more!