भारत@100 : एपीआइ की दौड़

एपीआइ के आयात पर निर्भरता कम करने और देश को इसका मैन्युफैक्चरिंग हब बनाने के लिए केंद्र की तरफ से हाल में उठाए गए कदम नया अध्याय लिख रहे हैं

इलस्ट्रेशन: नीलांजन दास/एआइ
इलस्ट्रेशन: नीलांजन दास/एआइ

एपीआई यानी ऐक्टिव फार्मास्युटिकल इंग्रीडिएंट

भारत को लंबे अरसे से दुनिया की फार्मेसी कहा जाता रहा है. और भला क्यों न कहा जाए, वह इतने किस्म की और इतनी सारी दवाएं जो बनाता और दुनिया को निर्यात करता है. पर इस खिताब के बावजूद वह एक बेहद अहम अभाव से जूझ रहा है: एपीआइ (ऐक्टिव फार्मास्युटिकल इंग्रीडिएंट यानी किसी भी दवा की प्रमुख सक्रिय सामग्री) भारत बड़ी तादाद में चीन से आयात करता है. यह निर्भरता उस वक्त खौफनाक मुकाम पर पहुंच गई जब कोविड-19 महामारी ने धावा बोला और दुनिया की सप्लाइ चेन को ध्वस्त कर दिया.

स्वाभाविक तौर पर भारत ने भी वह मुश्किल दौर झेला. इस तजुर्बे से सबक सीखकर अब केंद्र ने एपीआइ में न केवल आत्मनिर्भरता हासिल करने का बीड़ा उठाया है बल्कि वह देश को उत्पादन का केंद्र बनाने को भी लालायित है. नवाचार और उत्पादन दोनों को बढ़ावा देने वाली 10,000 करोड़ रुपए की योजनाओं के साथ भारत का एपीआइ बनाने का एजेंडा नए युग का प्रतीक है. मोर्डोर इंटेलिजेंस के मुताबिक, भारत के एपीआइ बाजार का 8.3 फीसद की दर से 2023 में 12.6 अरब डॉलर (1.05 लाख करोड़ रु.) से बढ़कर 2028 तक 18.8 अरब डॉलर(1.5 लाख करोड़ रु.) होने की उम्मीद है.

> यह गेमचेंजर क्यों है

कुछ मामलों में कंपनियां अंतिम एपीआइ बनाने के लिए 'इंटरमीडिएट' इंग्रीडिएंट (जिन्हें 'की स्टार्टिंग मटीरियल' या केएसएम कहा जाता है) खरीदती हैं, जबकि कई दूसरी कंपनियां केएसएम खुद बनाती हैं. एपीआइ हालांकि इस्तेमाल तो रत्ती भर ही किए जाते हैं पर वे किसी भी दवा का सारतत्व होते हैं. पीडब्ल्यूसी के मुताबिक, चीन से एपीआइ के आयात के प्रतिशत में तेज बढ़ोतरी हुई. यह 1991 में करीब 1 फीसद से बढ़कर 2019 में 70 फीसद पर पहुंच गया.

आत्मनिर्भरता की तरफ कदम बढ़ाते हुए भारत सरकार ने एपीआइ का घरेलू उत्पादन बढ़ाने को जून 2020 में कई योजनाएं लॉन्च कीं. इनमें स्टेरॉइड और ऐंटीबायोटिक दवाओं और डायबिटीज तथा टीबी की दवाओं में इस्तेमाल होने वाले एपीआइ के लिए जरूरी केएसएम की घरेलू मैन्युफैक्चरिंग में निवेश वाली कंपनियों को 6,490 करोड़ रु. के प्रोडक्शन लिंक्ड इन्सेंटिव शामिल हैं. सरकार ने 53 एपीआइ (जिन पर भारत की 90 फीसद निर्भरता है) से जुड़े 41 उत्पाद बनाने के योग्य पाए गए मैन्युफैक्चरर्स को 2019-20 के आधार वर्ष से छह साल के लिए वित्तीय प्रोत्साहन देने की भी पेशकश की है. स्वास्थ्य मंत्री मनसुख मांडविया कहते हैं, ''इस योजना के तहत एपीआइ के उत्पादन के लिए 32 नए कारखाने लगे हैं. 53 एपीआइ में से 35 का उत्पादन शुरू है.''

महारत हासिल करने के लिए भारत क्या करे

भारत के लिए सबसे बड़ी चुनौती है चीन पर निर्भरता कम करना. उथल-पुथल वाले हालात में कमी के जोखिम से बचने को निकट भविष्य में आयात कई देशों से करना  प्राथमिकता होनी चाहिए. नीति आयोग के सदस्य डॉ. वी.के. पॉल कहते हैं, ''महामारी ने दिखा दिया कि प्रमुख दवाइयां बनाने के लिए हम दूसरे देशों पर निर्भर नहीं रह सकते. इससे न केवल दवा महंगी हो जाती है बल्कि सप्लाइ चेन के मसले भी पैदा हो सकते हैं, जैसा कोविड महामारी के दौरान देखा गया.''

दूसरे, भारत को न केवल आरऐंडडी और मैन्युफैक्चरिंग में निवेश बढ़ाना होगा, बल्कि उत्पादन भी किफायती रखना होगा. टेक्नोलॉजी इन्फॉर्मेशन, फोरकास्टिंग ऐंड एसेसमेंट काउंसिल (टीआइएफएसी) की रिपोर्ट का अनुमान है कि अगर हम उत्पादन उस स्तर तक बढ़ाने की कोशिश करते हैं तो चीन में तैयार एपीआइ के मुकाबले भारत में बने एपीआइ की लागत करीब 20 फीसद ज्यादा होगी. ऐसे फासलों को पाटने के लिए सरकार की तरफ से नीतिगत दखल की जरूरत होगी. यह सब करते हुए नवाचार को बढ़ावा देने और सरकार और निजी कंपनियों के बीच तालमेल बनाने के लिए भारत को बौद्धिक संपदा अधिकार की मजबूत व्यवस्था लागू करनी होगी.
इस तरह भारत के लिए चुनौती अब पहल की नहीं बल्कि जोश और रफ्तार की है. आत्मनिर्भरता का सफर शुरू करने के बाद उसे इस राह पर पूरी मजबूती और प्रतिबद्धता से आगे बढ़ते रहना होगा.''

बदलाव के अगुआ

1. सिप्ला

भारत की पहली आधुनिक एपीआइ फैक्टरी सिप्ला ने 1984 में स्थापित की. तभी से कंपनी का पोर्टफोलियो बढ़ता रहा और आज वह 75 से ज्यादा अलग-अलग तरह के एपीआइ बनाती है

कुरुकुंभ, पुणे स्थित इसका संयंत्र बैच मैन्युफैक्चरिंग (एक ही खेप में निकाले गए उत्पाद) से कंटीन्युअस मैन्युफैक्चरिंग (लगातार निकाले जाने वाले उत्पाद) में बदल गया

मुंबई, बेंगलूरू और कुरुकुंभ, पुणे के एपीआइ संयंत्रों में करीब 8.99 करोड़ डॉलर (748 करोड़ रु.) का निवेश किया जाना है; सिप्ला ने कैंसर, हेपेटाइटिस सी, डायबिटीज, आदि के लिए भी एपीआइ विकसित करने की योजना बनाई है

2. डॉ. रेड्डीज

यह 170 से ज्यादा एपीआइ का उत्पादन और 80 से ज्यादा देशों को इन्हें निर्यात करती है

यह भारत की उन चार फार्मास्युटिकल फर्मों में से है जिन्हें एपीआइ की घरेलू मैन्युफैक्चरिंग के लिए पीएलआइ योजना के तहत पहला भुगतान मिल चुका है

इसके एपीआइ आठ संयंत्रों में मैन्युफैक्चर किए जाते हैं जिनका निरीक्षण यूएसएफडीए ने किया है और जिनमें से दो विदेश में हैं

''अहम जरूरतों के मामले में हम आयात पर निर्भर नहीं रहना चाहते. भारत में एपीआइ मैन्युफैक्चरिंग से दवाओं में इस्तेमाल होने वाले अन्य कच्चे माल पर निर्भरता कम होगी. इससे आत्मनिर्भर भारत के नजरिए को भी बढ़ावा मिलेगा''
—मनसुख मांडविया, केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्री

Read more!