इंडिया टुडे हेल्थ कॉन्क्लेव: बात देश की सेहत पर

इंडिया टुडे हेल्थ कॉन्क्लेव 2023 में देश के बुनियादी स्वास्थ्य ढांचे, मेडिकल साइंस की नई तकनीकों और पर्सनल हेल्थ जैसे मुद्दों पर बात करने के लिए देश के बेहतरीन डॉक्टर और नीति निर्माता जुटे एक मंच पर

इंडिया टुडे के संपादक सौरभ द्विवेदी के साथ बातचीत करते हुए सुधांश पंत
इंडिया टुडे के संपादक सौरभ द्विवेदी के साथ बातचीत करते हुए सुधांश पंत

जुलाई 2023 की 19 तारीख को केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्रालय ने कोविड-19 को लेकर एक अहम घोषणा करते हुए कहा कि अब फ्लाइट से भारत आने वाले विदेशी यात्रियों के लिए आरटी-पीसीआर टेस्ट की अनिवार्यता खत्म कर दी गई है. यह इस बात का संकेत था कि भारत सरकार कोरोना बीमारी के फैलाव को लेकर एक हद तक निश्चित हुई है. लेकिन कोरोना महामारी के भयावह दौर से इस निश्चिंतता तक, देश का स्वास्थ्य क्षेत्र एक बड़े बदलाव से गुजरा. दूसरी तरफ आम लोगों के सामने अपनी सेहत से जुड़ी चिंताओं का अंबार लगा रहा. इन बदलावों और चिंताओं का एक मंच से साझा होना जरूरी था. 4 अगस्त, 2023 को हुए 'इंडिया टुडे हेल्थ कॉन्क्लेव' ने देश को यह मंच मुहैया करवाया. इसमें भारतीय स्वास्थ्य क्षेत्र के सबसे बेहतरीन डॉक्टरों ने हिस्सा लिया.

देश की सेहत पर बात करने के लिए इस आयोजन में स्वास्थ्य सेवा के नीति निर्माता भी शामिल हुए. हेल्थ कॉन्क्लेव की शुरुआत केंद्रीय स्वास्थ्य सचिव सुधांश पंत के सत्र से हुई, जिसमें स्वास्थ्य सेवाओं के सरकारी आयाम और इससे जुड़े मुद्दों पर चर्चा हुई. इंडिया टुडे के एडिटर सौरभ द्विवेदी के साथ हुई बातचीत में पंत ने कहा कि भारत सरकार के लिए स्वास्थ्य एक सर्वोच्च प्राथमिकता है. और कोविड ने यह और स्थापित किया कि स्वास्थ्य सबसे महत्वपूर्ण विषय है. 

हेल्थ कॉन्क्लेव में इंडिया टुडे ग्रुप चेयरमैन और एडिटर-इन-चीफ अरुण पुरी, केंद्रीय स्वास्थ्य सचिव सुधांश पंत और मेदांता हॉस्पिटल के चेयरमैन और मैनेजिंग डायरेक्टर डॉक्टर नरेश त्रेहन ने इंडिया टुडे हिंदी मैगजीन की वेबसाइट को भी लॉन्च किया. अगले सत्र में भारत में स्वास्थ्य सेवाओं के भविष्य की चर्चा करते हुए डॉक्टर नरेश त्रेहन ने बताया, "भारत की स्वास्थ्य सेवाएं पिछले कुछ वर्षों में कितनी बेहतर हो चुकीं हैं इसका अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि दुनिया के 120 देशों से लोग इलाज के लिए भारत आते हैं."

इंडिया टुडे हिंदी मैगजीन की वेबसाइट लॉन्च करते (बाएं से) अरुण पुरी, डॉ. नरेश त्रेहन और सुधांश पंत

हेल्थ कॉन्क्लेव में चिकित्सा क्षेत्र से जुड़े महत्वपूर्ण मुद्दों पर 9 सत्र हुए जिनमें नई तकनीक, किफायती स्वास्थ्य सेवाओं का रोडमैप, पब्लिक प्राइवेट पार्टनरशिप, भारत की प्राचीन चिकित्सा पद्धति, राजस्थान सरकार के हेल्थ मॉडल, मानसिक स्वास्थ्य, सोशल मीडिया से पब्लिक मेडिकल एजुकेशन और पर्सनल हेल्थ पर चर्चा हुई. राजस्थान सरकार के चिकित्सा एवं स्वास्थ्य विभाग की अतिरिक्त मुख्य सचिव शुभ्रा सिंह ने किफायती स्वास्थ्य सेवा के मामले में राजस्थान के हेल्थ मॉडल को आदर्श बताया. 

कार्यक्रम में पब्लिक प्राइवेट पार्टनरशिप के नतीजों के बारे में बताते हुए मेदांता में मेडिकल एजुकेशन डायरेक्टर डॉक्टर रणदीप गुलेरिया ने भविष्य में इस पार्टनरशिप के और मजबूत होने की उम्मीद जताई. कॉन्क्लेव में एक शानदार सत्र भारत की प्राचीन चिकित्सा पद्धति पर भी हुआ. इंडियन साइकियाट्रिक सोसाइटी के प्रेसिडेंट डॉक्टर विनय कुमार ने बेहद सरल तरीके से मेंटल हेल्थ और चुनौतियों पर बात की. स्टेट स्पॉटलाइट सत्र राजस्थान सरकार के हेल्थ मॉडल को समझने में मददगार रहा. राजस्थान सरकार के आयुर्वेद एवं भारतीय औषधि (स्वतंत्र प्रभार) मंत्री डॉक्टर सुभाष गर्ग ने राजस्थान के हेल्थ मॉडल की कामयाबी और टिकाऊपन के बारे में चर्चा की. वहीं सोशल मीडिया से मेडिकल एजुकेशन और जागरूकता ला रहे डॉक्टर्स से भी बातचीत हुई. हेल्थ कॉन्क्लेव के अंत में इंस्टीट्यूट ऑफ लिवर ऐंड बिलियरी साइंसेज के डायरेक्टर डॉक्टर शिव कुमार सरीन ने बेहद रोचक तरीके से इनसानी सेहत के सबसे गंभीर मामले पर बात की. इस आखिरी सत्र में डॉक्टर सरीन की कही बात इस पूरे कॉन्क्लेव का निचोड़ मालूम पड़ती है कि 'अनदेखी नहीं, जानकारी ही असली आनंद है.'

देखें इंडिया टुडे हेल्थ कॉन्क्लेव 2023 की पूरी कवरेज: 

मेडिकल के क्षेत्र में नई तकनीक के इस्तेमाल से हुए बदलाव को लेकर हेल्थ कॉन्क्लेव में शामिल चिकित्सकों ने बातचीत की. इंद्रप्रस्थ अपोलो हॉस्पिटल, नई दिल्ली के पीडियाट्रिक यूरोलॉजिस्ट डॉ. सुजीत चौधरी कहते हैं, "नई तकनीक ने इलाज को बहुत बेहतर किया है. 10-15 साल पहले हम ज्यादातर सर्जरी के लिए चीर-फाड़ का पुराना तरीका अपनाते थे, लेकिन अब रोबोटिक सर्जरी का दौर है." महाजन इमेजिंग के फाउंडर और चेयरमैन, रेडियोलॉजिस्ट डॉ. हर्ष महाजन बताते हैं, "कोई भी बीमारी अगर जल्दी पकड़ में आ जाए तो उसका इलाज सस्ता भी होता है और अच्छा भी. इसलिए खतरे का अंदाजा जल्दी लगाना जरूरी है." मैक्स हॉस्पिटल भटिंडा के कार्डियोलॉजी विभाग के डायरेक्टर डॉ. रोहित मोदी मानते हैं, "हेल्थकेयर में जैसे-जैसे नई तकनीक आएगी प्रिवेंटिव तरीके और कारगर साबित होंगे. तकनीक भविष्य में जितनी उन्नत होगी उतनी ही दिल की बीमारियां रोकने में हमें आसानी होगी."

देश और देश के अलग-अलग राज्यों में किफायती स्वास्थ्य सेवाओं को लेकर राजस्थान सरकार के चिकित्सा एवं स्वास्थ्य विभाग की अतिरिक्त मुख्य सचिव शुभ्रा सिंह कहती हैं, "राजस्थान देश का पहला राज्य है जिसने राइट टू हेल्थ ऐक्ट लागू किया. राज्य के लोगों को नि:शुल्क जांच से लेकर दवाओं तक सब कुछ मुफ्त मुहैया कराया." तो वहीं फार्मा ऐंड मेडिकल डिवाइसेज ब्यूरो ऑफ इंडिया के सीईओ रवि दाधीच बताते हैं, "पिछले नौ साल में लोगों ने जेनेरिक दवाएं खरीदकर अपने 20,000 करोड़ रुपए बचाए हैं जो सस्ती और असरदार दवाओं की पहुंच के मामले में क्रांति से कम नहीं."

किफायती स्वास्थ्य सेवाओं के सत्र में शामिल (बाएं से) डॉ. सुभाष गर्ग, शुभ्रा सिंह और डॉ. सुधीर भंडारी

इंडिया टुडे हेल्थ कॉन्क्लेव के दौरान मेडिकल टूरिज्म को लेकर सत्र का आयोजन किया गया. इस सत्र में यशोदा सुपर स्पेशिएलिटी हॉस्पिटल्स के प्रेसिडेंट इंटरनेशनल मार्केटिंग ऐंड एमवीटी ज्योति कौर ने कहा कि "दुनिया भर को किफायती और बेहतर इलाज मुहैया करवाने के मामले में भारत ने पिछले सालों में बेजोड़ कामयाबी हासिल की है." मैन्न्स हेल्थकेयर के सीनियर डायरेक्टर ऐंड चीफ सेल्स मार्केटिंग ऑफिसर अनस अब्दुल वाजिद भी इस सत्र में मौजूद रहे. उन्होंने कहा, "दुनिया भर से लोग इलाज करवाने के लिए भारत आते हैं. इसकी तीन वजहें हैं. पहली, इलाज उपलब्ध न होना. दूसरी, लंबी वेटिंग लिस्ट और तीसरी वजह है इलाज का महंगा होना. भारत में इसका समाधान मौजूद है."

हेल्थकेयर में पब्लिक प्राइवेट पार्टनरशिप से जुड़े सत्र में मेडिकल क्षेत्र के कई विशेषज्ञों ने हिस्सा लिया. मेदांता में मेडिकल एजुकेशन के डायरेक्टर डॉक्टर रणदीप गुलेरिया कहते हैं कि "अगर हम मेडिकल रिसर्च में आगे जाना चाहते हैं, नई खोज करना चाहते हैं तो अकादमिक संस्थानों और इंडस्ट्री के बीच पार्टनरशिप बेहद जरूरी है." नारायणा ग्रुप के सीनियर वाइस प्रेसिडेंट नवनीत बाली ने कहा कि "ऐसी कोशिश करनी होगी कि प्राइवेट हेल्थ सेक्टर के सीमित मुनाफे में सरकारी योजनाएं प्राइवेट इन्फ्रास्ट्रक्चर के सहारे हर नागरिक तक पहुंचें."

पारंपरिक चिकित्सा पद्धति को लेकर आयोजित सत्र में सीसीआरयूएम के डायरेक्टर जनरल डॉक्टर एन. ज़हीर अहमद कहते हैं कि "भारत सरकार ने यूनानी मेडिसिन के बुनियादी ढांचे पर काफी काम किया है. कश्मीर से केरल तक हमारे 23 संस्थान हैं, 262 से ज्यादा अस्पताल और 50,000 से ज्यादा डॉक्टर हैं." तो वहीं सीसीआरआईएच के डायरेक्टर जनरल डॉक्टर सुभाष कौशिक बताते हैं, "होम्योपैथी और बाकी दवाओं में बुनियादी अंतर यह होता है कि होम्योपैथी में बीमारी को नहीं बल्कि बीमार को ठीक किया जाता है. इससे बेहतर इलाज और क्या हो सकता है." पारंपरिक चिकित्सा पद्धति को लेकर सीसीआरआईएएस के डायरेक्टर जनरल प्रोफेसर रबिनारायण आचार्य ने कहा कि "आयुर्वेद हजारों साल से चली आ रही चिकित्सा की परंपरा है. आयुर्वेद पूरी तरह से विज्ञान आधारित चिकित्सा परंपरा है जिसने कमाल के नतीजे दिए हैं."

हाल के दिनों में देशभर में मेंटल हेल्थ पर काफी चर्चा हुई है. इंडिया टुडे ने हेल्थ कॉन्क्लेव के दौरान इस विषय पर एक्सपर्ट्स को एक मंच पर बुलाया. जहां मेंटल हेल्थ पर गंभीरता से बातचीत हुई. साइकोलॉजिकल वेल बीईंग की फाउंडर डॉक्टर उपासना चड्ढा ने सुझाव दिया कि "मेंटल हेल्थ को लेकर हमें खुद के लिए तो सतर्क रहना ही है, साथ ही अपने आस-पास भी अगर किसी में डिप्रेशन और एंग्जायटी जैसी परेशानी दिखे तो उसे भी सतर्क करना है ताकि समय से सही इलाज शुरू किया जा सके." इंडियन साइकियाट्रिक सोसाइटी के प्रेसिडेंट डॉक्टर विनय कुमार ने बताया कि "अगर हम डायबिटीज और हाइ ब्लड प्रेशर जैसी बीमारियों के बारे में बात करने और इलाज में नहीं झिझकते तो डिप्रेशन और बाकी मानसिक स्वास्थ्य से जुड़ी बीमारियों पर बात करने में घबराते क्यों हैं?"

सोशल मीडिया और पब्लिक हेल्थ एजुकेशन पर आधारित सत्र में सेक्सुअल हेल्थ एजुकेटर और लेखक डॉ. तनया नरेंद्र कहती हैं, "भारत में पब्लिक हेल्थ और पब्लिक मेडिकल एजुकेशन की बेहद कमी है. जब मैंने सोशल मीडिया पर लोगों को जागरूक करना शुरू किया था तब लोगों को परेशानी हो रही थी कि मैं ऐसा क्यों कर रही हूं." हेल्थ इन्फ्लुएन्सर और ओर्थोपीडिक सर्जन मनन वोरा बताते हैं कि "हमारे परिचित डॉक्टर शुरू में कहते थे कि तुम पूरा समय रील्स बनाते हो तो मरीज कब देखते हो. लेकिन मैंने टाइम मैनेजमेंट से सोशल मीडिया और पर्सनल प्रैक्टिस दोनों को मुमकिन किया." हेल्थ इन्फ्लुएन्सर, फिजिशियन और लेखक डॉ. विशाखा शिवदासानी कहती हैं कि "जो डॉक्टर, सहकर्मी और दोस्त पहले सोशल मीडिया पर मेरी मौजूदगी को लेकर सहज नहीं थे, आज वही सब लोग मेरे पास आते हैं और पूछते हैं कि मैं एक ब्रांड कैसे बन गई."

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