प्रधान संपादक की कलम से
बायजूज ने पिछले अक्तूबर से मार्च तक 5 फीसद या 2,500 कर्मचारियों को हटाने का सिलसिला शुरू किया. जून में उसने और 1,000 को निकाल दिया.

अरुण पुरी
महज दो साल पहले कोविड से उत्पन्न आर्थिक विनाश के काले बादलों के बीच आशा की एक उजली किरण भी आई थी, और वह थी: स्टार्ट-अप. दुनिया ने कई सौ 'यूनिकॉर्न’ यानी 1 अरब डॉलर (8,200 करोड़ रु.) या ज्यादा की स्टार्ट-अप कंपनियों को अंगड़ाई लेते देखा. भारत में भी इस क्षेत्र में अभूतपूर्व उछाल देखा गया, जब नई टेक्नोलॉजी की अगुआई में बढ़ते कारोबार उसकी ग्रोथ स्टोरी की शब्दावली का हिस्सा बन गए.
हमारे यहां 31 मार्च, 2023 को कुल 84,000 स्टार्ट-अप में से 108 ऐसे थे जो यूनिकॉर्न क्लब की देहरी चढ़ गए. दोनों ही मामलों में यह दुनिया में तीसरे स्थान पर है. उन्होंने पिछले तीन साल में देश में 8,60,000 नौकरियों का सृजन किया. केंद्र सरकार ने हाल तक सिर्फ यूनिकॉर्न कंपनियों का मूल्य 340.80 अरब डॉलर या 28 लाख करोड़ रुपए आंका. यह 35 खरब डॉलर (287 लाख करोड़ रु.) की अर्थव्यवस्था का करीब 10 फीसद है. थोड़े-से वक्त में ऐसी संपदा का सृजन करते नौसिखुओं के समूह ने बरबस सभी का ध्यान खींचा.
बदकिस्मती से अच्छी खबर ज्यादा टिकी नहीं. अब हम इसे तार-तार होते देख रहे हैं. ज्यादातर यूनिकॉर्न भारी घाटे में हैं और कुछ शेयर बाजारों में लहूलुहान हैं. 2021 में सूचीबद्ध हुए पेटीएम, पॉलिसी बाजार और नायका के शेयरों की कीमतें सूचीबद्ध कीमत से काफी नीचे आ गईं. भारतीय स्टार्ट-अप ने कैलेंडर वर्ष 2023 की पहली छमाही में महज 3.80 अरब डॉलर (31,200 करोड़ रु.) उगाहे और साल के अंत तक उन्हें 2022 के 24 अरब डॉलर (2 लाख करोड़ रुपए) से आधे भर मिलने का अनुमान है.
इन कारोबार को प्राणवायु देने वाले स्रोत घट गए या सूख गए हैं. कई स्टार्ट-अप में कर्मचारियों को वेतन देने के लाले पड़े हैं. उद्योग के जानकारों का कहना है कि 2023 के पहले तीन महीनों में 25,000 से ज्यादा कर्मचारियों की छंटनी की गई. कई कंपनियों में पिंक स्लिप थमाना जारी है, जिनमें बायजूज, कार्स24, डुंजो, ओला, ओयो, मीशो, अनएकेडमी और वेदांतु सरीखे स्टार्ट-अप हैं.
सबसे ज्यादा छंटनी एडुटेक क्षेत्र में हुई, जहां 19 स्टार्ट-अप ने 9,000 से ज्यादा को निकाला. ढलान बायजूज में सबसे तीखी है. उसने अपना 'डेकाकॉर्न’ दर्जा गंवा दिया जब सबसे बड़े निवेशक प्रोसस ने एक साल के भीतर उसका वैल्युएशन तीन-चौथाई घटाकर 22 अरब डॉलर (1.6 लाख करोड़ रु.) से 5.1 अरब डॉलर (41,838 करोड़ रु.) कर दिया. बायजूज ने पिछले अक्तूबर से मार्च तक 5 फीसद या 2,500 कर्मचारियों को हटाने का सिलसिला शुरू किया. जून में उसने और 1,000 को निकाल दिया.
इस उदीयमान क्षेत्र में अचानक बर्बादी और मायूसी के माहौल की क्या वजह है? इनमें से कई कंपनियां कोविड महामारी की अचानक उपजी असामान्य स्थिति से जन्मीं और/या फूलीं-फलीं. जब घरों से बाहर निकलना महीनों दूभर हो गया तो ऑनलाइन सेवाओं की मांग में उछाल आया.
ये शिक्षा, खाने और स्वास्थ्य तथा साफ-सफाई सरीखी बुनियादी जरूरतों से लेकर मनोरंजन सरीखी जरूरी लग्जरी और जीवनशैली की दूसरी जरूरतों तक फैली थीं. भारत में ऑनलाइन सेवाएं शैशवकाल से अब फायदेमंद ढंग से घर की चारदीवारी के भीतर प्रवेश पा रही थीं. ऑनलाइन ग्राहकों की संख्या में उछाल आ गया. जोमैटो और स्विगी सरीखे फूड डिलिवरी ऐप के हाथों सोना लगा. यही एडुटेक क्षेत्र के साथ हुआ क्योंकि स्कूल बंद होने से हताश माता-पिता अपने बच्चों की ऑनलाइन पढ़ाई को मजबूर हो गए.
धन तो फिर ऐसे बह निकला मानो बांध टूट गया हो. महामारी से पैदा अवसर ज्यों-ज्यों साफ होते गए, भारतीय स्टार्ट-अप की फंडिंग 2021 में लंबी छलांग भरकर 35.2 अरब डॉलर (2.9 लाख करोड़ रु.) के शिखर पर पहुंच गई, जबकि 2020 में मामूली गिरावट के साथ 10.9 अरब डॉलर (89,500 करोड़ रु.) की फंडिंग दर्ज करने से पहले 2019 में 13.2 अरब डॉलर (1 लाख करोड़ रु.) हासिल किए थे. मगर इसमें बाहरी कारकों का बड़ा हाथ था.
विकसित देशों ने महामारी की सार-संभाल का फिजूलखर्च मॉडल अपनाया और अपनी अर्थव्यवस्थाओं को मंदी से बचाने के लिए प्रोत्साहन पैकेजों में खूब धन झोंका. अमेरिका ने 50 खरब डॉलर से ज्यादा रकम झोंकी तो यूरोप ने भी 875 अरब डॉलर झोंक दिए. इससे बाजारों में नकदी का प्रवाह बढ़ गया और उसके सैलाब का काफी पानी उभरते बाजारों में आ गया.
क्रिप्टोकरेंसी के साथ जैसा हुआ, भेड़चाल से ऊंचे मुनाफों की तलाश में भटकती पूंजी को रास्ता मिल गया. यही नहीं, वेंचर फंड आपस में ही मूल्य निर्धारण बढ़ाते रहते हैं. नतीजा प्राप्तकर्ता के सिरे पर घटने वाला था. यूट्रेड सॉल्यूशन के सह-संस्थापक और सीईओ कुणाल नंदवानी इंडिया टुडे को बताते हैं, ''जब आपको आसान धन मिलता है, तो आप उसे बर्बाद करने पर उतर आते हैं. मगर आखिरकार आपके बिजनेस मॉडल को कारगर होना होगा.’’ अक्सर ऐसा हुआ नहीं.
अपने अक्खड़पन से बर्बाद होने की यह कहानी, इसकी वजहें और मुक्ति के संभावित रास्ते इस हफ्ते की आवरण कथा के विषय हैं, जिसे एग्जीक्यूटिव एडिटर एम.जी. अरुण ने लिखा है. एक वजह यह है कि स्टार्ट-अप को सही बिजनेस मॉडल से निकले वास्तविक प्रदर्शन के बजाए मार्क-टु-मार्केट मूल्य निर्धारण के आधार पर धन मिला.
एकाउंटिंग की यह पद्धति अस्थिर वक्तों में अनिश्चितता से भरी होती है. उछाल संभव बनाने वाले दो कारकों के मंद पड़ते ही सब बैठ गया. एक, महामारी खत्म हुई और देश में सामान्य कामकाज शुरू हुआ तो ऑनलाइन कारोबारों में गिरावट आई. उपभोक्ता तो अमीर हुआ पर कंपनियां नहीं. दो, पश्चिम में प्रोत्साहन पैकेजों से आई बहार से मुद्रास्फीति बढ़ी, और अमेरिका में जून 2022 में 9 फीसद पर पहुंच गई, जहां ब्याज दरों में बढ़ोतरी का सिलसिला शुरू करना पड़ा. इसने सारी सरप्लस मनी को सोख लिया—अमेरिका अब ज्यादा लाभप्रद था और वेंचर कैपिटलिस्ट्स ने स्टार्ट-अप के धन के नल बंद कर दिए.
इस सबकी एक सीख है. जो बलबलाती महत्वाकांक्षा के फेर में पड़े, उन्होंने तकलीफ झेली. सयाने स्टार्ट-अप अपने बुनियादी आधार को मजबूत बनाने पर गौर करते हैं. इन्फोसिस के सहसंस्थापक और एक्सीलॉर वेंचर्स के चेयरमैन क्रिस गोपालकृष्णन मानते हैं कि यह दौर अस्थायी है. वे कहते हैं, ''यह वैश्विक सुस्ती से उपजे आर्थिक चक्र का हिस्सा है.
मगर मध्यम और लंबे वक्त में भारत के स्टार्ट-अप इकोसिस्टम को लेकर मैं बहुत आशावादी हूं.’’ उनकी सलाह यह है: स्टार्ट-अप को चाहिए कि अपना दायरा बढ़ाएं, प्रासंगिक बने रहें, टेक्नोलॉजी में आ रहे बदलावों के बीच ग्राहकों के लिए समाधान तलाशें, और लंबे वक्त के लिए मूल्यवान संस्थाओं का निर्माण करें.
संक्षेप में भारतीय स्टार्ट-अप को जिंदा रहने और फलने-फूलने के लिए 100 मीटर की फर्राटा दौड़ के बजाए मैराथन धावकों का दम-खम पैदा करना चाहिए. साथ ही कारोबार का प्रमुख बुनियादी सिद्धांत भी न भूलें: मुनाफा कमाना.