इस पीड़ा की सीमा नहीं

2001 के संविधान संशोधन के मुताबिक, साल 2026 तक सीटों की संख्या में बदलाव करने पर रोक है, ऐसे में चुनाव आयोग ने विधानसभा और लोकसभा सीटों को क्रमश: 126 और 14 पर ही बरकरार रखा है

हमारी कौन सुनेगा असम में अपने वोटर आइडी कार्ड के साथ मुस्लिम महिलाएं (फाइल फोटो)
हमारी कौन सुनेगा असम में अपने वोटर आइडी कार्ड के साथ मुस्लिम महिलाएं (फाइल फोटो)

भारतीय निर्वाचन आयोग ने 20 जून को असम में विधानसभा और संसदीय निर्वाचन क्षेत्रों के परिसीमन का मसौदा प्रस्ताव प्रकाशित किया. उसी दिन मुख्यमंत्री हेमंत बिस्व सरमा ने ट्वीट करके 'दुख' जाहिर किया कि 2001 से उनके निर्वाचन क्षेत्र रहे जालुकबाड़ी का नया नक्शा खींचकर उसके दो अहम इलाकों को दूसरे निर्वाचन क्षेत्रों में मिला दिया गया, जबकि अन्य को कहीं और जोड़ दिया गया. सरमा मानते हैं कि राज्य में 2026 के चुनाव के वक्त उनके 70 फीसद मतदाता नए होंगे. फिर भी उन्होंने मसौदे का यह कहकर स्वागत किया, ''इसमें असम की भावनाओं की सटीक झलक है.''

लेकिन उनके विरोधियों को उनके इस 'नुक्सान' से कोई हमदर्दी नहीं. उनका कहना है कि परिसीमन की पूरी कवायद का एकमात्र मकसद सत्तारूढ़ भाजपा को चुनाव जीतने में मदद करना है. निर्वाचन क्षेत्रों की सीमा को कुछ इस तरह तय करके कि 126 विधानसभा क्षेत्रों में से मुसलमान मतदाताओं का प्रभाव 45 से घटकर महज 22 निर्वाचन क्षेत्रों तक सीमित हो जाए. 2011 की जनगणना के मुताबिक, असम की करीब 35 फीसद आबादी मुसलमान है. समुदाय के करीब 65 फीसद लोग बांग्लाभाषी हैं जिन पर अक्सर 'अवैध बांग्लादेशी प्रवासी' होने का आरोप लगता है.

ज्यादातर विरोधी दलों का कहना है कि परिसीमन का अभियान केवल बांग्लाभाषी मुसलमानों के प्रभाव को हाशिये पर धकेलने के लिए है, जिन्होंने पारंपरिक रूप से राज्य में कांग्रेस और ऑल इंडिया यूनाइटेड डेमोक्रेटिक फ्रंट (एआइयूडीएफ) का समर्थन किया है. असम के 26 कांग्रेस विधायकों में से 22 इन्हीं 45 सीटों से चुने गए हैं. एआइयूडीएफ के तो सभी 16 विधायक इन्हीं सीटों से आए हैं. परिसीमन के मसौदे के मुताबिक, इन 45 में से 10 सीटें सीमाओं का पुनर्गठन करके खत्म कर दी गई हैं, जबकि चार को दो में मिला दिया गया है. इनमें से दो—बोको और ग्वालपाड़ा—एसटी के लिए आरक्षित कर दी गई हैं, जबकि अन्य दो—बरपेटा और होजाई—एससी के लिए निर्धारित हैं. इससे मुसलमानों के लिए इन निर्वाचन क्षेत्रों से चुनाव लड़ना तक मुश्किल हो गया है.

इतना ही नहीं, चुनाव आयोग ने परिसीमन के लिए 2001 की जनगणना के आंकड़ों का भी इस्तेमाल किया, जबकि 2011 की जनगणना के आंकड़े मौजूद हैं. कई आलोचकों को शक है कि ऐसा इसलिए किया गया क्योंकि कई आरक्षित निर्वाचन क्षेत्र अपना दर्जा गंवा सकते थे. वजह? 2011 की जनगणना के आंकड़े दिखाते हैं कि इन सीटों पर अब मुसलमानों का दबदबा है. वैसे आयोग का कहना है कि मौजूदा परिसीमन 2002 के परिसीमन अधिनियम के तहत किया जा रहा है, जिसमें 2001 की जनगणना के आंकड़ों को आधार बनाना अनिवार्य है.

एआइयूडीएफ के मुखिया और लोकसभा सांसद बदरुद्दीन अजमल कहते हैं, ''यह मुसलमान वोटों की हिस्सेदारी कम करने की साजिश है. भाजपा एआइयूडीएफ को असम की राजनीति से मिटाना चाहती है.'' मुख्यमंत्री सरमा इस आरोप का जवाब देने तक की जहमत नहीं उठाते. वे कहते हैं, ''अगर मसौदे को मंजूरी मिल जाती है और यह हकीकत बन जाता है तो 102 निर्वाचन क्षेत्रों में असम के स्वदेशी लोगों का दबदबा होगा. कांग्रेस और एआइयूडीएफ बेशक परेशान हैं, लेकिन मुझे अच्छी नींद आती है क्योंकि परिसीमन से असम का भविष्य सुरक्षित होगा.'' सब जानते हैं कि 2021 के विधानसभा चुनाव से पहले सरमा ने बांग्लाभाषी मुसलमानों का जिक्र करते हुए कहा था कि उन्हें ''मियां वोटों'' की जरूरत नहीं है. दिलचस्प यह है कि असमिया भाषी मुसलमानों ने परिसीमन के मसौदे का विरोध नहीं किया है.

कांग्रेस विधायक दल के नेता देवब्रत सैकिया का कहना है कि उनकी पार्टी परिसीमन के खिलाफ नहीं है पर यह कवायद उस राष्ट्रीय नागरिकता रजिस्टर (एनआरसी) को सुचारु बनाने के बाद की जानी चाहिए थी, जिसने करीब 20 लाख लोगों को अवैध घोषित किया था. कांग्रेस की राज्य इकाई के प्रमुख भूपेन कुमार बोरा मामले के न्यायाधीन होते हुए मसौदा प्रकाशित करने में चुनाव आयोग की हड़बड़ी के पीछे साजिश देखते हैं. बोरा कहते हैं, ''शीर्ष अदालत ने परिसीमन योजना पर अंतिम सुनवाई के लिए 25 जुलाई की तारीख तय की है. हैरानी कि आयोग ने सुप्रीम कोर्ट के फैसले का इंतजार तक नहीं किया.'' हड़बड़ी शायद 2024 के आम चुनाव की वजह से है. सरमा ने 7 जून को केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह से मुलाकात की और इस बात को लेकर चिंता जाहिर की कि मसौदा 15 अगस्त से पहले तैयार न हुआ तो लोकसभा चुनाव से पहले इस कवायद को पूरा करना चुनौती होगी. 

वहीं 2001 के संविधान संशोधन के मुताबिक, साल 2026 तक सीटों की संख्या में बदलाव करने पर रोक है, ऐसे में चुनाव आयोग ने विधानसभा और लोकसभा सीटों को क्रमश: 126 और 14 पर ही बरकरार रखा है. लेकिन नए परिसीमन से 23 मौजूदा विधानसभा सीटों को खत्म कर दिया गया है, जबकि 26 नई सीटें बनाई गई हैं. अन्य छह सीटें विलय की वजह से घटकर तीन रह गई हैं.

सिमटती सीटें अल्पसंख्यकों की
कुल 126 विधानसभा सीटों में से फिलहाल 45 पर मुसलमान वोटर निर्णायक भूमिका अदा करते हैं. अगर परिसीमन मसौदा मंजूर हुआ तो यह संख्या कम होकर 22 हो जाएगी

परिसीमन मसौदे में नया क्या है?

26 नए निर्वाचन क्षेत्रों का गठन

23 निर्वाचन क्षेत्र खत्म कर दिए गए हैं, छह अन्य का तीन में विलय

एसटी सीट आठ से नौ और एसटी 16 से 19 हुईं

14 में से चार निर्वाचन क्षेत्रों का पुनर्गठन और नया नाम

करीमगंज का एससी दर्जा खत्म, सिल्चर को यह दर्जा मिला

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