दम दिखाने लगे मान

विवादास्पद विधेयकों को आगे बढ़ाकर मान ने खुद को एक आक्रामक नेता साबित करने की कोशिश की है

आगे की तैयारी: मुख्यमंत्री भगवंत मान 20 जून को विधानसभा सत्र के दौरान बोलते हुए
आगे की तैयारी: मुख्यमंत्री भगवंत मान 20 जून को विधानसभा सत्र के दौरान बोलते हुए

सिखों के धार्मिक मामलों का प्रबंधन संभालने वाली सर्वोच्च निर्वाचित संस्था शिरोमणि गुरुद्वारा प्रबंधक समिति (एसजीपीसी) के सदस्य 26 जून को अमृतसर में स्वर्ण मंदिर परिसर के तेजा सिंह समुंद्री हॉल स्थित अपने मुख्यालय में जुटे. मौका था एसजीपीसी की तरफ से बुलाया गया महासभा का विशेष सत्र. और इसका एकसूत्री एजेंडा था: पंजाब में भगवंत मान के नेतृत्व वाली आम आदमी पार्टी (आप) सरकार की तरफ से हाल ही में सिख गुरुद्वारा अधिनियम, 1925 में किए गए संशोधनों की निंदा करना.

इससे ठीक एक हफ्ते पहले राज्य विधानसभा ने एसजीपीसी के लिए एक विधेयक को मंजूरी दी थी. इसमें अनिवार्य किया गया था कि स्वर्ण मंदिर से गुरबानी का बिना विज्ञापन निर्बाध प्रसारण हो और इसे दुनियाभर के सभी मीडिया प्लेटफार्मों को मुफ्त उपलब्ध कराया जाए. मान ने यह कहते हुए इस कदम को उचित ठहराया कि यह गुरबानी के प्रसारण को 'आधुनिक मसंदों' के अनुचित नियंत्रण से मुक्त कर देगा. मसंदों को सिख धर्म के शुरुआती दौर में धार्मिक कार्यों के लिए लोगों से उनकी आय का दसवां हिस्सा एकत्र करने के लिए नियुक्त किया जाता था. आज के मसंद से उनका इशारा शिरोमणि अकाली दल (एसएडी) प्रमुख सुखबीर बादल और उनके विश्वासपात्रों की तरफ था. (2012 में एसजीपीसी ने स्वर्ण मंदिर से गुरबानी प्रसारित करने का विशेष अधिकार बादल के नियंत्रण वाले पीटीसी नेटवर्क को दे दिया था. यह समझौता जुलाई में समाप्त हो रहा है.)

हालांकि, एसजीपीसी में ही कई लोगों ने पहले भी और 26 जून को विशेष सत्र के दौरान भी गुरुद्वारा निकाय के कामकाज खासकर इस पर बादल परिवार के नियंत्रण को लेकर सवाल उठाए थे, लेकिन आप सरकार के इस कदम की सख्त आलोचना में सभी गुट एकजुट नजर आए. उन्होंने इसे सीधे तौर पर संस्था के कामकाज और ब्रिटिश काल से ही चले आ रहे कानून के प्रावधानों में दखलंदाजी करार दिया. 

बहरहाल, सिख गुरुद्वारा (संशोधन) विधेयक, 2023, 19-20 जून को संपन्न दो दिवसीय विशेष सत्र के दौरान पंजाब विधानसभा से पारित एकमात्र विवादास्पद कानून नहीं है. इसका मकसद तो खैर अकाली दल को और भी ठिकाने लगाना है, जो कि बादल परिवार की अगुआई में पहले ही अपने सबसे खराब दौर में जा पहुंचा है. पर दो अन्य विधेयक भाजपा के नेतृत्व वाली केंद्र सरकार और दूसरे संवैधानिक संस्थानों के साथ मान सरकार के सीधे टकराव के हालात पैदा करने वाले हैं. इनमें पहला तो है पंजाब पुलिस (संशोधन) विधेयक, 2023, जो संघ लोक सेवा आयोग (यूपीएससी) को दरकिनार कर पुलिस महानिदेशक (डीजीपी) के चयन और नियुक्ति संबंधी एक स्वतंत्र व्यवस्था बनाने से जुड़ा है. यह स्थिति तब है जब सुप्रीम कोर्ट ने 2018 में यूपीएससी की तरफ से अनुमोदित तीन अधिकारियों के पैनल से डीजीपी नियुक्त करने की प्रक्रिया निर्धारित की थी और 2019 के अपने फैसले में राज्यों से ऐसे 'स्थानीय' कानून बनाने से परहेज करने को कहा था.

दूसरा है पंजाब विश्वविद्यालय कानून (संशोधन) विधेयक, 2023, जो 12 राज्य संचालित विश्वविद्यालयों पर केंद्र की तरफ से नियुक्त राज्यपाल का नियंत्रण घटाने की राह खोलता है. अभी कुलपतियों की नियुक्ति पर पंजाब के राज्यपाल बनवारीलाल पुरोहित और मान सरकार के बीच तनातनी चल ही रही है. इस विधेयक में राज्यपाल की जगह मुख्यमंत्री को विश्वविद्यालय का चांसलर नियुक्त करने का प्रस्ताव रखा गया है. कानून बनने के लिए इन विधेयकों को न केवल राज्यपाल की सहमति मिलना जरूरी है, बल्कि इन्हें न्यायिक समीक्षा से भी गुजरना होगा.

आखिर क्या वजह है जिसने महज एक साल पहले ही सत्ता संभालने वाली आप सरकार को ऐसा टकरावपूर्ण रुख अख्तियार करने को प्रेरित किया? पंजाब में राजनीतिक जानकार इसे खुद को एक आक्रामक नेता के तौर पर स्थापित करने की मान की कोशिश का नतीजा मानते हैं. कहा जा रहा है कि मई में संपन्न लोकसभा उपचुनाव में जीत—जिसमें आप ने जालंधर सीट कांग्रेस से छीन ली—के बाद वे अगले साल आम चुनाव में अपनी पार्टी के बेहतरीन प्रदर्शन का नेतृत्व करना चाहते हैं.

आग से खेलना
मान ने इस बार शायद कुछ ज्यादा बड़ा दांव खेला है. पंजाब में सिख पंथिकों की नाराजगी मोल लेना राजनीतिक रूप से काफी जोखिम भरा हो सकता है, खास तौर पर ऐसे समय में जब लगभग कोई भी ऐसी सिख संस्था नहीं जो गुरुद्वारा कानून में संशोधन के पक्ष में हो. यही नहीं, बादल परिवार के कट्टर आलोचक भी मान के साथ नहीं दिख रहे. उनका तर्क है कि पंजाब विधानसभा को 1925 में बने कानून में संशोधन का अधिकार ही नहीं है. क्यों? क्योंकि 1966 में राज्य के पुनर्गठन के बाद एसजीपीसी ही संसद शासित एक 'इंटर-स्टेट बॉर्डी कॉर्पोरेट' बन गई है. इसके अलावा, उनका यह भी कहना है कि मान का एकतरफा कदम दो ऐतिहासिक समझौतों का उल्लंघन है. इसमें एक 1942 में पंजाब के तत्कालीन प्रधानमंत्री सिकंदर हयात खान और अकाली नेता बलदेव सिंह के बीच हुआ था और दूसरा बाद में भारत के पहले प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू और अकाली दिग्गज मास्टर तारा सिंह के बीच 1959 में किया गया. इसमें वादा किया गया था कि एसजीपीसी के कामकाज में किसी भी तरह का सरकारी दखल नहीं होगा और कानून में बदलाव से पहले इसकी राय ली जाएगी. 

कभी आप का ही हिस्सा रहे वरिष्ठ वकील और सिख मामलों के जानकार एच.एस. फुल्का अक्सर मान का समर्थन करते आए हैं. पर 1925 का कानून एक अंतर-राज्यीय कानून नहीं है, इसलिए आप सरकार को इसमें संशोधन करने का अधिकार है, मान के इस दावे से वे भी सहमत नहीं. उनकी राय में, पंजाब के लिए जरूरी है कि पहले हरियाणा की तर्ज पर राज्य में गुरुद्वारों के प्रबंधन के लिए अपना कानून लाए. हालांकि, वह भी कानूनी समीक्षा के दायरे में आ सकता है. नतीजा जो भी रहे, मान ने एसजीपीसी और सिख पंथिकों को सीधे चुनौती देकर मधुमक्खी के छत्ते में हाथ डाल दिया है. यह सीमावर्ती राज्य पहले से ही सिख युवाओं के बीच कट्टरपंथ के उभार से जूझ रहा है, और ऐसे में धार्मिक मामलों में किसी भी तरह के कथित हस्तक्षेप के नतीजे भारी पड़ सकते हैं.

यथास्थिति को चुनौती
पंजाब पुलिस (संशोधन) विधेयक की बात करें तो यह पहली बार नहीं है कि पंजाब या मान सरकार ने शीर्ष पुलिस अफसर की नियुक्ति के लिए राज्य के अपने कानून की मंशा जताई हो. जुलाई 2018 में सुप्रीम कोर्ट ने राज्य सरकारों को यूपीएससी के साथ सलाह के बिना डीजीपी की नियुक्ति करने से रोक दिया था. फिर भी मान ऐसा कर रहे हैं.

ताजा संशोधन में कहा गया है कि डीजीपी का चयन पंजाब और हरियाणा हाइकोर्ट के सेवानिवृत्त मुख्य न्यायाधीश/न्यायाधीश की अध्यक्षता वाली एक सात सदस्यीय मनोनयन समिति करेगी, जिसमें यूपीएससी और केंद्रीय गृह मंत्रालय से एक-एक नामित सदस्य शामिल होंगे. राज्य के पुलिस प्रमुख का कार्यकाल भी न्यूनतम दो वर्ष का होगा. विधेयक राज्य को समान रैंक के किसी अधिकारी को डीजीपी का अतिरिक्त प्रभार सौंपने का भी अधिकार देता है जबकि सुप्रीम कोर्ट वैसी व्यवस्था के पक्ष में नहीं.

इस संशोधन को आगे बढ़ाकर मान सरकार ने जहां सुप्रीम कोर्ट की फटकार खाने का जोखिम उठाया है, वहीं पंजाब विश्वविद्यालय कानून (संशोधन) विधेयक केंद्र और राज्यपाल को खुली चुनौती देने जैसा है. पंजाब में टकराव पिछले वर्ष अक्तूबर में शुरू हुआ जब राज्यपाल पुरोहित ने पंजाब कृषि विश्वविद्यालय, लुधियाना और बाबा फरीद यूनिवर्सिटी ऑफ हेल्थ साइंसेज, फरीदकोट के कुलपतियों (वीसी) की नियुक्तियों पर आप सरकार के फैसले को खारिज कर दिया. उन्होंने चयन प्रक्रिया में खामी बताते हुए फाइल लौटा दी. लेकिन ताजा टकराव आइ.के. गुजराल पंजाब टेक्निकल यूनिवर्सिटी, जालंधर के वीसी पद पर राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ से जुड़े सुशील मित्तल की नियुक्ति की वजह से उपजा. यही संशोधन विधेयक लाने की वजह भी है. विधानसभा के विशेष सत्र से कुछ ही दिन पहले 15 जून को पुरोहित ने मान सरकार की तरफ से आपत्तियां जताने के बावजूद मित्तल की नियुक्ति का आदेश जारी किया था.

यह जगजाहिर है कि मान और पुरोहित के बीच रिश्ते सौहार्दपूर्ण नहीं. ऐसे में इन तीनों संशोधन विधेयकों को राज्यपाल की मंजूरी की कोई गुंजाइश नजर नहीं आती. विधानसभा का विशेष सत्र बुलाए जाने से पहले राज्यपाल ने तो शिकायत की थी कि उन्हें अंधेरे में रखा गया. बचाव में आप सरकार ने इसे मार्च में संपन्न बजट सत्र का विस्तार बताया और इस चूक का फायदा उठाया कि राज्यपाल ने अभी तक इसका सत्रावसान नहीं किया है. पुरोहित ने चेताया है कि यदि यह साबित हो गया कि विशेष सत्र बुलाने में उचित प्रक्रिया का पालन नहीं किया गया, तो विधेयक अपने-आप खारिज हो जाएंगे. हो सकता है यही वह टकराव हो, जिसका मान को इंतजार है?

विवादास्पद विधेयक
पंजाब विधानसभा के 19-20 जून को आयोजित सत्र में कुछ अहम विधेयक पारित किए गए हैं

सिख गुरुद्वारा 
(संशोधन) विधेयक 2023
इसमें प्रावधान है कि स्वर्ण मंदिर से गुरबानी का बिना विज्ञापन निर्बाध प्रसारण हो और इसे दुनियाभर के सभी मीडिया प्लेटफॉर्मों को मुफ्त उपलब्ध कराया जाए

पंजाब पुलिस 
(संशोधन) विधेयक 2023
यह विधेयक संघ लोक सेवा आयोग (यूपीएससी) और सुप्रीम कोर्ट से तय प्रक्रिया को दरकिनार कर पुलिस महानिदेशक (डीजीपी) के चयन और नियुक्ति संबंधी एक स्वतंत्र तंत्र व्यवस्था बनाने से जुड़ा है

पंजाब विश्वविद्यालय कानून 
(संशोधन) विधेयक 2023
यह विधेयक पंजाब सरकार के 12 सरकारी विश्वविद्यालयों में 
राज्यपाल के बदले मुख्यमंत्री को चांसलर बनाने से जुड़ा है

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