महा खटपट

शिंदे-फडणवीस के बीच मनभेद तो सत्तारूढ़ गठबंधन की परीक्षा ले ही रहे हैं, उनके अपने-अपने दल भी महाराष्ट्र के सियासी मैदान में अपना दबदबा बनाए रखने की जंग में कोई कसर नहीं छोड़ रहे.

मनभेद : महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री एकनाथ ‌शिंदे और डिप्टी सीएम देवेंद्र फडणवीस (बाएं)
मनभेद : महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री एकनाथ ‌शिंदे और डिप्टी सीएम देवेंद्र फडणवीस (बाएं)

धवल कुलकर्णी

महाराष्ट्र में जिस तरह सत्ता हथियाने के लिए गठबंधन किया गया, उसमें खींचतान होना स्वाभाविक है. मुख्यमंत्री एकनाथ शिंदे जहां लगातार यह दिखाने के लिए परेशान हैं कि वे महज कठपुतली मुख्यमंत्री भर नहीं हैं, वहीं 'सहयोगी’ भाजपा उन्हें यह याद दिलाने का कोई मौका नहीं चूकना चाहती कि वे जो कुछ भी हैं, उसकी बदौलत हैं. और इसलिए सत्तारूढ़ गठबंधन के अंदर ही शह-मात का एक खेल लगातार जारी है.

ताजा टकराव कल्याण लोकसभा क्षेत्र को लेकर हो रहा है, जिसका प्रतिनिधित्व शिंदे के बेटे डॉ. श्रीकांत करते हैं. विवाद तब शुरू हुआ जब शिंदे के करीबी एक पुलिस निरीक्षक ने सार्वजनिक निर्माण विभाग (पीडब्ल्यूडी) मंत्री रवींद्र चव्हाण के एक सहयोगी के खिलाफ कथित छेड़छाड़ का केस दर्ज किया. भाजपा नेताओं ने इसे 'बदले की कार्रवाई’ बताया और निर्वाचन क्षेत्र में सेना के शिंदे गुट से सहयोग न करने की धमकी भी दे डाली.

इस पर श्रीकांत ने अपनी सीट छोड़ने की पेशकश तक कर दी. अविभाजित ठाणे लोकसभा सीट कभी भाजपा का गढ़ हुआ करती थी लेकिन 1990 के दशक में गठबंधन समझौते के तहत यह शिवसेना के कब्जे में आ गई थी. कहा जा रहा है कि शिंदे की खीज बढ़ाते हुए भाजपा अब कल्याण निर्वाचन क्षेत्र से अपना उम्मीदवार उतारने की उत्सुक है, जो 2008 में ठाणे सीट के विभाजन के बाद बना था.

बात यहीं तक सीमित नहीं है. गठबंधन के भीतर कई अन्य मोर्चों पर भी टकराव जारी है. बताया जा रहा है, भाजपा नेतृत्व चाहता है कि शिंदे मंत्रिमंडल में शिवसेना गुट के नौ मंत्रियों में से पांच—अब्दुल सत्तार, गुलाबराव पाटिल, संजय राठौड़, संदीपन भुमरे और तानाजी सावंत—को कैबिनेट फेरबदल से पहले बाहर का रास्ता दिखाया जाए. लेकिन सीएम शिंदे इस पर तैयार नहीं हैं. संभवत: यही वजह है कि पहले ही काफी समय से लटका मंत्रिमंडल विस्तार और टल गया है.

भाजपा की ओर से सभी 288 विधानसभा और 48 लोकसभा सीटों—जिसमें शिंदे गुट की जीती सीटें भी शामिल हैं—के लिए समन्वयक नियुक्त करने के फैसले ने सहयोगी दलों के बीच दरार और बढ़ा दी है. भाजपा की राज्य इकाई के प्रमुख चंद्रशेखर बावनकुले तो यह तक कह चुके हैं कि पार्टी 2024 में अधिकांश विधानसभा सीटों पर प्रत्याशी उतारेगी और शिंदे और उनकी पार्टी के लिए सिर्फ 50 सीटें छोड़ेगी.

फिर, एकनाथ शिंदे-देवेंद्र फडणवीस के बीच प्रतिद्वंद्विता भी है, जो समय-समय पर मजबूत मित्रता दिखाने की कोशिशों के बावजूद घटती नहीं दिख रही. हाल ही में शिंदे खेमे की तरफ से छेड़े गए विज्ञापन युद्ध से भी यह बात जाहिर होती है. दरअसल, यह बताने के लिए कि महाराष्ट्र में ज्यादा लोकप्रिय नेता कौन है, 13 जून की सुबह राज्य के कई स्थानीय अखबारों में पूरे पेज का विज्ञापन छपा.

इसमें दावा किया गया कि 26.1 फीसद जनता शिंदे को पसंद करती है और उनके डिप्टी फडणवीस केवल 23.2 फीसद लोगों के बीच लोकप्रिय हैं. यह रेटिंग एक सर्वेक्षण का नतीजा बताई गई लेकिन पूरे पन्ने के विज्ञापन में कहीं भी यह नहीं बताया गया कि यह सर्वे किसने करवाया और क्यों करवाया. यही नहीं, विज्ञापन में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और शिंदे की फोटो के साथ इस्तेमाल की गई टैगलाइन थी 'राष्ट्रमध्ये मोदी, महाराष्ट्रमध्ये शिंदे’ (देश में मोदी, महाराष्ट्र में शिंदे). विज्ञापन में फडणवीस की तस्वीर कहीं नहीं थी. निहितार्थ साफ है, शिंदे अगले साल विधानसभा चुनाव में मुख्यमंत्री पद के लिए फिर दावेदार हैं.

उसी दोपहर, फडणवीस ने कोल्हापुर में शिंदे के साथ एक सरकारी कार्यक्रम में शामिल होने की योजना रद्द कर दी. शिवसेना गुट से आने वाले शिक्षा मंत्री दीपक केसरकर ने कहा कि डिप्टी सीएम के कान में कुछ समस्या थी और डॉक्टरों ने उन्हें हवाई यात्रा न करने की सलाह दी. हालांकि, इससे उन अटकलों पर कोई असर नहीं पड़ा कि फडणवीस विज्ञापन से नाराज थे.

पूरे हंगामे के बाद अगले दिन एक नया विज्ञापन जारी हुआ. इस बार, इसमें मोदी, केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह, दिवंगत शिवसेना सुप्रीमो बाल ठाकरे, शिंदे के गुरु आनंद दिघे और शिंदे-फडणवीस की जोड़ी की तस्वीरें थीं. साथ में टैगलाइन थी, 'जनतेच्या चरणी माथा, गर्जा महाराष्ट्र माझा’ (जनता का आभार, महाराष्ट्र आगे बढ़ रहा है). इसमें एक निजी न्यूज चैनल के सर्वेक्षण के हवाले से बताया गया कि 46.4 फीसद लोग सत्तारूढ़ गठबंधन का समर्थन करते हैं. हालांकि, डैमेज कंट्रोल की यह कोशिश भी एक छोटी-सी वजह से बड़ा नुकसान ही साबित हुई. इस बार, विज्ञापन में सबसे नीचे शिवसेना कोटे के नौ मंत्रियों के छोटे चित्र थे, लेकिन भाजपा के मंत्रियों की तस्वीर नहीं थी.

बावनकुले ने यह कहते हुए पूरे मामले को थोड़ा टालने की कोशिश की कि दोनों नेताओं के बीच तुलना किया जाना 'आश्चर्यजनक’ है और इससे उनकी पार्टी के कार्यकर्ताओं के मन में अनावश्यक खटास पैदा होगी. हालांकि, भाजपा के राज्यसभा सदस्य और राज्य के पूर्व कृषि मंत्री डॉ. अनिल बोंडे ने शिंदे की तुलना एक मेंढक से कर डाली जो खुद को चाहे जितना भी फुला ले, कभी भी हाथी के बराबर नहीं हो सकता. तो शिवसेना विधायक संजय गायकवाड़ ने कोई समय गंवाए बिना पलटवार किया कि भाजपा ने महाराष्ट्र में खुद को बढ़ाने के लिए शिवसेना का सहारा लिया है. उन्होंने सवाल किया, ''नहीं तो आपकी औकात क्या थी?’’

दोनों पक्षों में तीखी नोकझोंक जारी रहने के बीच, 15 जून को शिंदे और फडणवीस मुंबई के बाहरी इलाके पालघर में आयोजित एक समारोह में साथ पहुंचे. हेलीकॉप्टर में साथ उड़ान भरने के बाद, शिंदे ने अपने भाषण में दावा किया कि वे दोनों घनिष्ठ मित्र हैं. उन्होंने एक विज्ञापन की टैगलाइन इस्तेमाल करते हुए कहा, ''हमारी जोड़ी मजबूत है. ये फेविकोल का जोड़ है, टूटेगा नहीं.’’

फडणवीस ने भी कहा कि सरकार इतनी नाजुक नहीं है कि किसी विज्ञापन या भ्रामक बयान से प्रभावित हो जाए. बताया जा रहा है कि मनभेद दूर करने के लिए फडणवीस ने शिंदे और डॉ. श्रीकांत के साथ बंद कमरे में बैठक भी की. हालांकि, उनके बीच सब कुछ ठीक होने की भावना अभी जमीनी स्तर तक नहीं पहुंच पाई है, और भाजपा कार्यकर्ताओं की तरफ से लगाए गए कुछ पोस्टरों में फडणवीस की सराहना की गई तो अन्य में शिंदे और उनके समर्थकों पर ताने कसे गए. यह सब तब हुआ जब गठबंधन सत्ता में अपनी पहली वर्षगांठ मनाने के करीब है.

गठबंधन में अंतर्निहित विरोधाभास ही विवाद की जड़ हैं. पिछले साल जून में जब शिंदे की बगावत से शिवसेना दोफाड़ हुई और उद्धव ठाकरे के नेतृत्व वाले महाराष्ट्र विकास अघाड़ी (एमवीए) गठबंधन की सरकार गिरी, तब विधानसभा में लगभग तिगुनी सीटों के बावजूद भाजपा ने शिंदे को राज्य सरकार के नेतृत्व के लिए चुना. हालांकि, भाजपा ने कई बार यह एहसास कराने की कोशिश की कि बड़ा भाई तो वही है. तो, शिंदे ने भी हावी होने और अधिकार क्षेत्रों का अतिक्रमण करने की भाजपा की कोशिशों को नाकाम करने के लिए लगातार दबाव बनाए रखा.

विज्ञापन युद्ध इसी प्रयास का एक हिस्सा था. हालांकि, शिंदे खेमे के नेताओं, मसलन मंत्री शंभूराज देसाई का दावा है कि पहले विज्ञापन से शिवसेना का कोई लेना-देना नहीं था और यह किसी 'शुभचिंतक’ ने जारी कराया था. वहीं, भाजपा के एक वरिष्ठ नेता का दावा है कि विज्ञापन के लिए शिंदे खेमे के वरिष्ठ नेताओं ने ही भुगतान किया था.

शिंदे खेमे के एक वरिष्ठ नेता भी मानते हैं कि ये विज्ञापन सत्तारूढ़ गठबंधन में बढ़ती फूट का संकेत हैं. शिवसेना सत्ता में समान भागीदारी की मांग कर रही है और भाजपा इसके खिलाफ है. महाराष्ट्र कैबिनेट में मुख्यमंत्री समेत 43 मंत्री हो सकते हैं. अभी, शिंदे और फडणवीस के अलावा दोनों दलों के नौ-नौ मंत्री हैं. शिवसेना के एक नेता के मुताबिक, उनकी मांग है कि विस्तार में उनकी पार्टी को 11 मंत्री पद मिलें और बाकी 12 भाजपा को दिए जाएं.

भाजपा के एक वरिष्ठ विधायक पूरे विवाद को 'अनावश्यक’ करार देते हैं और इसे गठबंधन के लिए आत्मघाती गोल जैसा बताते हैं. उनका कहना है कि विज्ञापन का उद्देश्य कुछ ऐसे सर्वे और जनमत सर्वेक्षणों के नतीजों को दरकिनार करना था जिसमें दावा किया गया था कि सरकार लोगों के बीच ज्यादा लोकप्रिय नहीं है. भाजपा विधायक कहते हैं, ''शिंदे भी अपनी (भाजपा से अलग) स्वतंत्र छवि बनाना चाहते हैं.’’ दोनों पार्टियों के बीच मतभेद के किसी गंभीर स्तर पर पहुंचने की संभावना नहीं है क्योंकि ''हम दोनों को एक-दूसरे की जरूरत है.’’

इंडिया टुडे ने जिन अन्य भाजपा नेताओं से बात की, उन्होंने भी मामले को ठीक से समझने की जरूरत पर जोर दिया, खासकर यह देखते हुए कि जब शिंदे को मुख्यमंत्री बनाया गया था तब इसके पीछे केंद्रीय नेतृत्व की रणनीति की अटकलें लगी थीं, जिसमें फडणवीस के पर कतरने जैसी बातें भी शामिल थीं. एक वरिष्ठ भाजपा नेता कहते हैं कि विज्ञापन पर प्रतिक्रिया की शुरुआत वरिष्ठ नेताओं ने नहीं, बल्कि फडणवीस समर्थकों और निचले क्रम के सदस्यों ने की थी. उन्होंने कहा, ''देवेंद्रजी भाजपा के सबसे लोकप्रिय नेता हैं और उनके समर्थकों का विज्ञापन पर चुप न बैठना स्वाभाविक है. लेकिन पार्टी की आधिकारिक राय यह नहीं है.’’

विश्लेषक अभय देशपांडे भी मानते हैं कि शिंदे ने भाजपा के केंद्रीय नेतृत्व से तो समीकरण साध रखे हैं लेकिन प्रदेश भाजपा नेतृत्व से उनका वैसा तालमेल नहीं है. देशपांडे कहते हैं, ''शुरुआत में ही जब शिंदे ने सीएम की कुर्सी संभाली तो भाजपा को लगा कि वह पीछे से कमान संभाले रहेगी. यही वजह थी कि उसने ऐसी हवा बनाई कि यह सीट उसकी तरफ से एक एहसान है. जवाब में शिंदे ने भी इस तरह का नैरेटिव आगे बढ़ाया कि निश्चित तौर पर मुख्यमंत्री पद के लिए वे भाजपा के आभारी हैं, लेकिन भाजपा को भी उनकी वजह से ही सत्ता में आने का मौका मिला है.’’

विधानसभा में ज्यादा संख्याबल के चलते भाजपा लगातार बड़े भाई की भूमिका में है जबकि शिंदे यह दिखाने का प्रयास करते हैं कि वे कठपुतली मुख्यमंत्री से कहीं अधिक हैं.

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