प्रधान संपादक की कलम से
भारत उन्हें हिंदुस्तान एरोनॉटिक्स लिमिटेड (एचएएल) के बनाए स्वदेशी हल्के लड़ाकू विमानों से और बहुत हाल में तेजस एमके-II से, जिसका मूलरूप अपने उड़ान परीक्षण चरण के नजदीक है, बदलने की कोशिशें करता रहा है.

अरुण पुरी
ये दो ऐसे लोकतंत्र हैं जो अपने स्वाभाविक सगे-संबंधी होने के दर्जे पर कभी इतराते नहीं थकते. लेकिन भारत-अमेरिका संबंधों का इतिहास इतना उजला भी नहीं रहा है. गुटनिरपेक्षता के साथ भारत की अठखेलियों ने उसे ऐसी जगह लाकर खड़ा कर दिया था जहां वह भले अमेरिका के विरोध में न रहा हो तो भी उसकी धुरी से दूर तो था ही.
सोवियत और अमेरिकी गुटों से उसकी औपचारिक समान दूरी को अक्सर सोवियत संघ की तरफ झुकाव की सौम्य अभिव्यक्ति की तरह देखा गया. इंदिरा गांधी के दस्तखत से 1974 में पोकरण में किए गए एटमी परीक्षण ने भरोसे को गर्त में पहुंचा दिया. उसी के जवाब में साफ तौर पर भारत को एटमी ईंधन और टेक्नोलॉजी से वंचित रखने के लिए न्यूक्लियर सप्लायर्स ग्रुप का समूचा स्थापत्य खड़ा किया गया.
अगली चौथाई सदी नई दिल्ली की तरफ से रिश्तों की मरम्मत के प्रयासों में बीती. प्रयास सफल होने वाले ही थे कि तभी पोकरण-2 का धमाका हो गया. 1998 में अटल बिहारी वाजपेयी के दस्तखत और देखरेख में हुए ये परीक्षण उभरती सुलह-समझ के लिए झटका थे और जख्म भरने में फिर एक और दशक लगा. जख्म भरे और तकरीबन पूरी तरह भर गए.
2008 में मनमोहन सिंह के मातहत भारत-अमेरिका असैन्य समझौते ने दोस्ती पर जमी बर्फ पिघलाने में अग्रणी भूमिका निभाई. यह कूटनीतिक तख्तापलट था जिसमें भारत को जगह देने के लिए अमेरिका ने वैश्विक एटमी व्यवस्था और अपने घरेलू कानूनों को नए सिरे से तय किया. इससे रिश्तों की प्रगति में अड़चन बना बड़ा रोड़ा हट गया, खासकर रक्षा तथा व्यापार में सहयोग के नए दरवाजे खुल गए.
मई 2014 में नरेंद्र मोदी के प्रधानमंत्री बनने के बाद मेलजोल की वह राह और खिल उठी. जिन मोदी को पिछले पूरे दशक भर अमेरिका का वीजा देने से इनकार किया जाता रहा, उन्होंने ही हैरतअंगेज कायापलट को अंजाम देते हुए व्हाइट हाउस के तीन अलमबरदारों के साथ गर्मजोशी भरी घनिष्ठता कायम की, चाहे वे डेमोक्रैट रहे हों या रिपब्लिकन. राष्ट्रपति ओबामा 'माइ फ्रेंड बराक’ बन गए, तो ट्रंप का दौर हाउडी मोदी कार्यक्रमों का गवाह बना. और अब तो बाइडन ने उनके लिए लाल कालीन बिछाते हुए शिखर मुलाकात को राजकीय यात्रा के दुर्लभ सम्मान का ऊंचा दर्जा दे दिया.
एक और उससे भी दुर्लभ सम्मान उन्हें दिया गया और वह था अमेरिकी कांग्रेस के संयुक्त सत्र को दूसरी बार संबोधित करने का आमंत्रण. अंत में आए 58 पैरे के साझा वक्तव्य में महज ऊंचा प्रतीकवाद ही नहीं बल्कि ढेरों ठोस बातें भी थीं, तो यह प्रधानमंत्री के स्तर पर नौ साल की हुनरमंद कूटनीति का सुफल था. मोदी ने यह बड़ी हद तक भारत की भूराजनैतिक स्वायत्तता को कायम रखते हुए हासिल किया. इन सारे बरसों के दौरान अमेरिका भारत का सबसे बड़ा व्यापारिक साझेदार बनकर उभरा. रिश्तों का फलक अब साफ तौर पर गहरा और व्यापक हो गया है.
सबसे महंगे जेट इंजन की टेक्नोलॉजी के हस्तांतरण को लीजिए, जिसमें जीई एयरोस्पेस के एफ414 इंजनों का भारत में सह-उत्पादन शामिल है—यह हमारे लिए अमेरिका के गिफ्ट हैंपर की नायाब चीज है. पहली बार अमेरिका इन इंजनों के निर्माण में लगने वाली संवेदनशील टेक्नोलॉजी, जो वह घनिष्ठतम सहयोगियों को भी विरले ही देता है, खासी बड़ी हद तक भारत को हस्तांतरित करने को राजी हुआ है. फिलहाल भारतीय वायु सेना के ज्यादातर बुढ़ाते लड़ाकू विमान रूस में बने हैं.
भारत उन्हें हिंदुस्तान एरोनॉटिक्स लिमिटेड (एचएएल) के बनाए स्वदेशी हल्के लड़ाकू विमानों से और बहुत हाल में तेजस एमके-II से, जिसका मूलरूप अपने उड़ान परीक्षण चरण के नजदीक है, बदलने की कोशिशें करता रहा है. 'स्वदेशी’ यहां सापेक्ष शब्द है—तेजस एमके-I करीब 60 फीसद स्वदेशी था और एमके- II में यह 70 फीसद तक पहुंच रहा है. इंजन हमेशा तैयारशुदा खरीदे जाते थे. अब जीई एरोस्पेस ने 99 जेट इंजन भारत में बनाने के लिए एचएएल के साथ एमओयू पर दस्तखत किए हैं, और अहम यह कि इसमें 80 फीसद टेक्नोलॉजी का हस्तांतरण होगा. आइपीआर से जुड़े कई मुद्दों और इस अंदेशे को देखते हुए कि यह दुश्मन के हाथों में भी पड़ सकती है, यह भारत की बौद्धिक धारा में अमेरिका के भरोसे के बारे में बहुत कुछ कहता है.
दूसरी भावभंगिमाएं भी हैं जिनमें प्रतीकात्मकता भी है और ठोस अर्थ भी. एक संयुक्त अंतरिक्ष अभियान में भारतीय अंतरिक्ष यात्री इंटरनेशनल स्पेस स्टेशन की उड़ान भरेगा और इसकी आवाज आम नागरिक को सबसे तेज सुनाई दे सकती है. इसके अलावा, निजी क्षेत्र के साझा उद्यम में सेमीकंडक्टरों का सह-निर्माण वैश्विक आपूर्ति शृंखलाओं को सायास एक से दूसरी जगह ले जाने की शुरुआत है. साथ ही भारत का उन देशों के क्लब में शामिल होना भी, जहां अमेरिका को 'फ्रेंडशोरिंग’ करना अनुकूल लगता है.
आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस और क्वांटम कंप्यूटिंग में व्यावहारिक ज्ञान और हुनर की आवाजाही के वादे पर भी गौर कीजिए. इस आखिरी क्षेत्र में सहयोग की खास उपयोगिता है. इन सबका जोड़ भारत-अमेरिका के रिश्तों में लंबी छलांग से कम नहीं. यह कोई जन्म-जन्म के बंधन जैसा भले न हो पर भारत के लिए बेशक इसके बहुत अधिक मायने हैं. तो भारत-अमेरिका के रिश्ते नई ऊंचाइयां क्यों छू रहे हैं? इस नए भूराजनैतिक खेल पर इस बार की आवरण कथा ग्रुप एडिटोरियल डायरेक्टर राज चेंगप्पा ने लिखी है.
उनके मुताबिक, अमेरिका के लिए संचालक शक्ति यह है कि ज्यादा से ज्यादा आक्रामक और निरंकुश होते जा रहे चीन पर लगाम कैसे कसें? चीन ही उसके अकेले महाशक्ति होने के दर्जे को चुनौती दे रहा है. वैचारिक और रणनीतिक रूप से उसके नजदीक भारत स्वाभाविक उभरती शक्ति है, जिसे तेजी से विकसित होती एशियाई व्यूहरचना में अपने पाले में रखने की कोशिश की जाए. इस खेल में दांव ऊंचे हैं और खिलाड़ी कई. इसके आर्थिक, सैन्य और भूराजनैतिक आयाम भी हैं, जिसमें भारत को मजबूत संतुलनकारी शक्ति के रूप में देखा जाता है.
एक दूसरे स्तर पर अमेरिका भारत को सैन्य साजो-सामान के लिए रूस पर उसकी दशकों पुरानी निर्भरता से दूर ले जाना चाहता है. नई दिल्ली ने नाजुक संतुलन साधते हुए प्रतिबंधों की व्यवस्था के जरिए मॉस्को को अलग-थलग करने की कोशिश में जुटे अमेरिका के सामने उसके अपने आधिपत्य की सीमाओं का उदाहरण पेश किया है. उस समय जब रूस-यूक्रेन युद्ध में अनिश्चितताएं तारी हैं, तराजू को निर्णायक ढंग से झुकाने के लिए बड़ी रकम के सौदों से बेहतर कुछ नहीं.
खासकर जब यह अच्छा कारोबार है. साथ ही, भारत दुनिया की पांचवीं सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था होने के नाते अमेरिकी कारोबार को विशाल बाजार भी देता है. अमेरिका के साथ ज्यादा मजबूत रिश्ते भारत को नई टेक्नोलॉजी के क्षेत्र में बराबरी पर आने और वैश्विक मूल्य शृंखला से जुड़ने में मदद करेंगे. हमारी सरहद पर चीन को एक और सैन्य दुस्साहस के बारे में सोचने से रोकने के लिए यह आत्मरक्षा के साझा हित से जुड़ना भी है.
पर कुछ चेतावनियां हैं जिन्हें लेकर नई दिल्ली और वाशिंगटन दोनों सचेत और सावधान हैं. गलबहियों के अपने जोखिम हैं. भारत अपने को रूस से उतने निर्णायक ढंग से अलग नहीं कर सकता जितना अमेरिका चाहता है, न ही वह अमेरिका का साथी बनकर चीन के साथ एक सीमा से आगे दुश्मनी मोल ले सकता है. क्या होगा जब अमेरिका किसी नाजुक मोड़ पर बीजिंग के साथ रिश्ते सुधारने का विकल्प चुन ले? फिर समझौतों में किए गए वादों के मापने लायक नतीजों और निश्चित प्रगति तक पहुंचने की जरूरत भी है. भारत और अमेरिका को जरूरत में ही नहीं बल्कि वाकई हर मौके का दोस्त होना चाहिए.
(अरुण पुरी).