वापसी भी अचानक

पिछली बार नोटबंदी का मकसद कथित रूप से काले धन को निकालना और खत्म करना था. उसके विपरीत, इस बार 2000 के नोट पहले से ही खत्म हो रहे थे

2,000 रुपए का नोट
2,000 रुपए का नोट

नरेंद्र मोदी की अगुआई वाली भाजपा सरकार की नवंबर, 2016 में की गई नोटबंदी की याद दिलाने वाला कदम उठाते हुए भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआइ) ने 19 मई को कहा कि वह 2,000 रुपए के नोट को चलन से वापस लेने की योजना बना रहा है. उसने यह भी कहा कि जनता 30 सितंबर तक इन नोटों को बैंकों से बदलवा या जमा कर पाएगी. केंद्रीय बैंक ने बताया कि एक व्यक्ति एक बार में 20,000 रुपए तक के 2,000 के नोट किसी भी बैंक से बदलवा सकता है. इन नोटों को बदलने या जमा करने के लिए आरबीआइ ने जो चार महीने की लंबी मोहलत दी है, वह नोटबंदी के उस पिछले स्वरूप से बहुत अलग है जिसमें 500 रुपए और 1,000 रुपए के नोट रातोरात वापस ले लिए गए थे. अलबत्ता इस ऐलान और बाद में दी गई कैफियतों के इर्द-गिर्द मंडराती उलझनें 2016 की विकट नोटबंदी की याद दिलाती हैं. 

जाहिरा तौर पर 2,000 रुपए के नोटों की वापसी आरबीआइ की 'क्लीन नोट पॉलिसी' का हिस्सा है. मगर जिस तरह यह कदम इसी साल कई राज्यों में होने वाले विधानसभा चुनावों के पहले उठाया गया है, उसने इसके असली इरादों को लेकर सवाल खड़े कर दिए हैं. आरबीआइ ने अपनी ओर से सफाई दी कि 2,000 रुपए का नोट नवंबर, 2016 में 500 रुपए और 1,000 रुपए के नोटों की अचानक वापसी से पैदा तरलता की खाई को भरने के लिए लाया गया था. आरबीआइ ने कहा कि 2,000 रुपए के ज्यादातर मौद्रिक नोट (89 फीसद) मार्च 2017 से पहले जारी किए गए थे, जिसका मतलब है कि उनका अनुमानित चार या पांच साल का जीवनकाल अब खत्म होने को है.

इस बीच चलन में मौजूद इन नोटों का कुल मूल्य 31 मार्च, 2018 के अपने 6.67 लाख करोड़ रुपए के शिखर से घटकर इस साल 31 मार्च को 3.62 लाख करोड़ रुपए पर आ गया. 2,000 रुपए के कुल नोटों में से महज 10 फीसद फिलहाल चलन में हैं, जबकि नोटबंदी के फौरन बाद के हफ्तों में 50 फीसद चलन में थे. इसका मतलब है कि आम जनता इनका उतना इस्तेमाल नहीं कर रही है जितना पहले कर रही थी. आरबीआइ ने 2,000 रुपए के नोट 2018-19 में ही छापने बंद कर दिए थे और अब बैंकों से कहा है कि ये नोट एटीएम से भी न दिए जाएं. आरबीआइ के गवर्नर शक्तिकांत दास ने यह भी साफ कर दिया कि 1,000 रुपए के नोट लाने की कोई योजना नहीं है. उन्होंने कहा कि 2,000 रुपए के नोट वापस लेने के फैसले का अर्थव्यवस्था पर 'बहुत मामूली असर' पड़ेगा.

इस घोषणा के बाद भी आम जनता में डर खत्म नहीं हुआ. इस नोट से लोगों का भरोसा डिगने में जरा वक्त नहीं लगा. इसका मतलब यह था कि दुकानों और दूसरे प्रतिष्ठानों में लोग इन्हें स्वीकार करने के लिए तैयार नहीं थे. इस हद तक कि शक्तिकांत दास को आगे आकर सफाई देनी पड़ी कि यह नोट अब भी वैध मुद्रा है. क्या वह 30 सितंबर के बाद भी वैध मुद्रा बना रहेगा? इस पर दास ने कोई पक्का भरोसा नहीं दिया. उन्होंने कहा, ''30 सितंबर के करीब आने पर हम देखेंगे कि कितने नोट वापस आते हैं, और फिर उस स्थिति में तय करेंगे.''

ऑल इंडिया पेट्रोलियम डीलर्स एसोसिएशन ने आरबीआइ से कहा है कि वह ''बैंकों को खासकर पेट्रोल पंपों को पर्याप्त तादाद में छोटे नोट मुहैया करने का दिशार्निदेश दे...ताकि हम सुचारु ढंग से अपने ग्राहकों की सेवा कर सकें.'' आरबीआइ के ऐलान के बाद पंप कई सारे लेन-देन 2,000 के नोटों में होते देख रहे हैं. राष्ट्रीय राजधानी में ऐपल के पहले और देश के महज दूसरे आधिकारिक रिटेल स्टोर पर ग्राहकों को बड़ी तादाद में ऐपल मैकबुक प्रो लैपटॉप (कीमत 2 लाख रुपए से ऊपर) और आइफोन 14 प्रो (कीमत 1 लाख रुपए से ऊपर) सरीखे नवीनतम और सबसे महंगे उत्पाद खरीदते और उनकी कीमत 2,000 रुपए के नोटों से चुकाते देखा जा सकता था. बताया जाता है कि विदेशी मुद्रा के कई डीलर 2,000 रुपए के नोट स्वीकार करने में एहतियात बरतने लगे हैं. उनका कहना है कि ये नोट जमा करवाते वक्त बैंक उनका स्रोत पूछ रहे हैं. इस बीच देश के सबसे बड़े बैंक यानी भारतीय स्टेट बैंक ने कहा कि वह ग्राहकों को 20,000 रुपए तक के 2,000 के नोट मांग पर्ची के बगैर बदलने देगा. इससे नोट बदलवाने वाले की पहचान छिपाने में मदद मिलेगी. मगर आरबीआइ ने बैंकों से कहा है कि वे रोज बदली के लिए लाए गए नोटों की संख्या और उनके मूल्य का रिकॉर्ड रखें.

यह अब भी साफ नहीं है कि किस बात ने इस वक्त केंद्रीय बैंक को 2,000 के नोटों को चलन से वापस लेने तथा एक और उथल-पुथल पैदा करने के लिए प्रेरित किया. नोटबंदी के बाद 2,000 रुपए के नोट लाए जाते वक्त ही लोगों में बड़े पैमाने पर इनके इस्तेमाल को लेकर संदेह उत्पन्न हुआ था. बैंक ऑफ बड़ौदा के चीफ इकोनॉमिस्ट मदन सबनवीस का कहना है, ''जब 2,000 रुपए के नोट लाए गए थे, तभी यह असंगत प्रतीत होता था.'' यही नहीं, नोटबंदी के पीछे समूचा मकसद कथित तौर पर काले धन को निकालना और उसे खत्म करना था.

वे कहते हैं, ''ऐसा माना गया था कि काला धन 500 रुपए और 1,000 रुपए के नोटों में रखा जाता था.'' लेकिन, इस बार ऐसा नहीं लग रहा है. सबनवीस का कहना है, ''आरबीआइ ने 2018-19 के बाद इन्हें छापना बंद कर दिया, इसका मतलब है कि सामान्य स्थिति में भी 2,000 के नोट गायब होते जा रहे थे.'' जो लोग बड़ी तादाद में 2,000 रुपए के नोटों का इस्तेमाल कर रहे थे, वे जमीन या गहने-जेवर खरीदने या फिर शादियों सरीखे मकसदों के लिए इसका इस्तेमाल कर रहे थे. ऐसे मामलों में 2,000 रुपए के नोट बड़े मूल्य के लेन-देन के लिए आसान होते हैं, हालांकि कभी-कभी इस्तेमाल किए जा रहे धन का कोई हिसाब-किताब नहीं होता. अलबत्ता 2,000 रुपए के नोटों की वापसी की वजह से इन जरूरतों के पूरा नहीं हो पाने की कोई आशंका नहीं है. ऐसे में संभावना यही है कि लोग अपने कामों के लिए अब दूसरे मूल्य की मुद्रा का इस्तेमाल करेंगे.

कई विशेषज्ञ भी आशंकित हैं. मानना है कि मुद्राओं में बार-बार इस तरह के रद्दोबदल से उनकी उपलब्धता पर और वस्तुओं तथा सेवाओं के प्रचलन के लिए स्थिर माध्यम के रूप में मुद्रा की भूमिका प्रभावित हो सकती है. अलबत्ता, आरबीआइ को तत्काल यह स्पष्ट करना चाहिए कि 30 सितंबर के बाद 2,000 के नोट की स्थिति क्या होगी, ताकि लोगों को यह पता चले कि क्या होने वाला है और वे उसके हिसाब से काम कर सकें. वहीं, मौजूदा सीमा को बढ़ाकर इन नोटों को बैंकों में बदलने और जमा करना आसान बनाने से 2,000 रुपए के नोटों को वापस लेने की समूची प्रक्रिया को सरल करने में काफी मदद मिलेगी.

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