राज्य में अब नहीं होंगे पारा टीचर, मगर...

अगर नियोजन नीति असरदार होती तो इस बदलाव की जरूरत नहीं पड़ती. उस नीति का काफी दुरुपयोग हुआ

शिक्षा का दारोमदार: एक सरकारी स्कूल में पढ़ाई करते छात्र
शिक्षा का दारोमदार: एक सरकारी स्कूल में पढ़ाई करते छात्र

वह दोनों शिक्षक पात्रता परीक्षा (टीईटी) पास कर चुके थे. नाम न उजागर करने की शर्त पर उन्होंने बताया, ''बिहार सरकार की पुरानी शिक्षक नियमावली के अनुसार यह तय था कि हम दोनों को नौकरी मिल जाएगी. हम दोनों हमपेशा भी होने वाले थे, इसी वजह से हमने एक-दूसरे से शादी भी कर ली और आगे की जिंदगी की योजना बनाने लगे. बस सातवें चरण की शिक्षक नियुक्ति की घोषणा होने की देर थी. मगर तभी हमारी योजनाओं पर वज्रपात हो गया. राज्य सरकार ने नियोजन पर शिक्षकों की प्रक्रिया को पूरी तरह बंद करने का फैसला ले लिया. अब राज्य में शिक्षकों की जो भी भर्ती होगी वह सरकार के स्थायी कर्मी के रूप में होगी. उसके लिए अलग से परीक्षा होगी. यानी हमें एक बार फिर से नौकरी पाने के लिए परीक्षा देनी होगी.''

दरअसल, बिहार सरकार ने 10 अप्रैल को नियोजन पर शिक्षकों की नियुक्ति की 20 साल पुरानी परंपरा को बंद करने का फैसला लिया. उसने अब यह स्वीकार कर लिया कि पंचायतों की ओर से नियोजित अस्थायी शिक्षक राज्य की शिक्षा व्यवस्था को बेहतर नहीं बना पा रहे. इसलिए शिक्षकों की नियुक्ति और उनकी सेवा की निगरानी का काम पंचायतों से लेकर फिर से सरकार के शिक्षा विभाग को सौंपने का फैसला लिया गया. अब तक राज्य में 9,222 शिक्षक नियोजन इकाइयां होती थीं, ये सभी पंचायत और स्थानीय निकायों की इकाइयां थीं. अब नई नियमावली के तहत राज्य में 38 जिलों के हिसाब से सिर्फ 38 नियोजन इकाइयां होंगी. और, भर्ती राज्य सरकार द्वारा गठित नया आयोग करेगा. इस नियमावली में यह भी कहा गया है कि अगर नियोजित शिक्षक राज्यकर्मी बनना चाहते हैं तो उन्हें भी अभ्यर्थियों के साथ इस परीक्षा में शामिल होना पड़ेगा.

बिहार में शिक्षा के मसले पर लगातार सक्रिय रहने वाले नवेंदु प्रियदर्शी कहते हैं, ''2003 में जब पूरे देश में सर्व शिक्षा अभियान शुरू हुआ तो बिहार में भी ग्रामीण इलाकों में शिक्षकों की कमी को देखते हुए पंचायत शिक्षामित्र की योजना शुरू की गई. इसके तहत ग्रामीण इलाकों में दसवीं की मार्कशीट दिखाने पर पंचायतें स्थानीय बेरोजगार युवाओं की इस पद पर नियुक्त कर सकती थीं. उस वक्त इन्हें 1,500 रुपये प्रतिमाह के मानदेय पर रखा जाता था.'' 2005 में जब नीतीश कुमार की सरकार बनी तो 2006 में तत्कालीन शिक्षा सचिव मदन मोहन झा की अगुआई में प्रक्रिया में थोड़ा बदलाव कर इन्हें नियोजित शिक्षक का नाम दिया गया. तब भी डिग्री देखकर ही नौकरी दी जाती थी. हां, नौकरी में आने के बाद उन्हें प्रशिक्षित होने के लिए कहा जाता था. 

नवेंदु कहते हैं, ''उस वक्त पंचायत शिक्षामित्रों की बहाली का मकसद राज्य की शिक्षा व्यवस्था में आये गैप को तात्कालिक तौर पर भरना था.'' मगर यह योजना आर्थिक रूप से कमजोर बिहार के शिक्षा विभाग को इतनी पसंद आई कि सरकार ने स्थायी शिक्षकों की नियुक्ति ही बंद कर दी. सरकारी स्कूल पूरी तरह इन नियोजित शिक्षकों पर आश्रित हो गये. विभाग के पास स्थायी शिक्षक गिनती के रह गए, जबकि नियोजित शिक्षकों की संख्या तीन लाख से अधिक हो गई है. अब अंतत: सरकार ने अपनी उस नीति को पूरी तरह से उलट देने का फैसला किया.

कई लोग इस फैसले से खुश हैं. उनका मानना है कि शिक्षामित्र और नियोजित शिक्षकों की योजना ने शिक्षा व्यवस्था का भट्ठा बिठा दिया था. पंचायतों से होने वाली इस नियुक्ति में बहुत भ्रष्टाचार हुआ और अयोग्य शिक्षक आ गए. इससे सरकारी स्कूलों में शिक्षा की गुणवत्ता खराब हुई. राज्य के शिक्षा मंत्री चंद्रशेखर कहते हैं, ''वह नियोजन नीति अगर प्रभावी होती तो इस बदलाव की जरूरत नहीं होती. आज भी बिहार के सरकारी स्कूल 1993 और 1996 के दौर में बिहार लोक सेवा आयोग की ओर से बहाल शिक्षकों के भरोसे चल रहे हैं, ऐसा लोगों का मानना है. जब यह व्यवस्था शुरू हुई तब मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने गांधी जी का सपना मानी जाने वाली पंचायतों पर भरोसा किया था. मगर इसका काफी दुरुपयोग हुआ.'' उन्होंने बताया कि अगले एक हफ्ते में नई नियमावली के तहत शिक्षकों की नियुक्ति का नोटिफिकेशन जारी हो जाएगा. इसके तहत लगभग सवा दो लाख शिक्षकों और 30 से 40 हजार शिक्षकेतर पदों पर नियुक्ति होगी. ये सभी स्थायी कर्मी होंगे. इन्हें सम्मानित वेतनमान और सरकारी नौकरी की अन्य सुविधाएं भी मिलेंगी.

भाजपा इस फैसले का विरोध कर रही है. भाजपा नेता और पूर्व डिप्टी सीएम सुशील कुमार मोदी ने कहा, ''इस फैसले के बाद एक लाख से ज्यादा प्रतीक्षारत अभ्यर्थियों और 4 लाख नियोजित शिक्षकों को नये संवर्ग वाला सरकारी शिक्षक बनने के लिए बीपीएससी की परीक्षा देनी पड़ेगी. यह नई नियमावली पात्रता सिद्ध कर चुके युवाओं के मनोबल पर बड़ा वज्रपात है.''

महागठबंधन में शामिल भाकपा (माले) भी इस फैसले से पूरी तरह सहमत नहीं है. 15 अप्रैल को पार्टी के विधायक संदीप सौरभ ने शिक्षक संगठनों और शिक्षक अभ्यर्थियों के साथ बैठक के बाद कहा, ''सरकार भले नये आयोग के जरिये परीक्षा ले, मगर नियोजित शिक्षकों को सीधे राज्यकर्मी का दर्जा दे. उनसे परीक्षा न ले.'' दरअसल, नियोजित शिक्षकों और सातवें चरण के शिक्षक अभ्यर्थियों के लिए यह फैसला बहुत सकारात्मक नहीं है. टीईटी-एसटीईटी उत्तीर्ण नियोजित शिक्षक संघ(गोप गुट) के प्रदेश प्रवक्ता अश्विनी पांडेय कहते हैं, ''हमारे लिए विभागीय परीक्षा लें और उस परीक्षा में पास होने वालों को राज्यकर्मी का दर्जा दे दें. हमें अगर सामान्य परीक्षा देकर उस सिस्टम में लाएंगे तो हमारी उम्र अब प्रतियोगिता परीक्षा वाली रही नहीं.'' वे कहते हैं कि 2010 के बाद नियोजित शिक्षकों की जितनी भर्तियां हुई हैं वे टीईटी और एसटीईटी जैसी पात्रता परीक्षा के जरिये हुई हैं. ऐसे में सभी शिक्षकों की गुणवत्ता को खारिज कर देना सही नहीं है.

नवेंदु का भी मानना है कि नियोजित शिक्षकों की गुणवत्ता को खराब बताकर सरकार अपनी जिम्मेदारी से मुक्ति नहीं पा सकती. वे कहते हैं, ''सरकार ने कब इनके प्रशिक्षण की योजना पर काम किया? राज्य के शिक्षकों को कई तरह के गैर-शैक्षणिक काम में फंसाये रखा जाता है. इस वक्त बिहार के शिक्षक जाति गणना में लगे हैं. स्कूलों में उनकी प्राथमिक जिम्मेदारी मिड डे मील जैसी योजना को ठीक से लागू कराना समझी जाती है. ऐसे में सरकार कैसे इन शिक्षकों की गुणवत्ता पर सवाल उठा सकती है?''

जाहिर है, नए फैसले को लेकर राज्य के शिक्षक संगठनों में काफी नाराजगी है और वे आंदोलनरत हैं. इस विरोध से सरकार भी अवगत है. शिक्षा मंत्री चंद्रशेखर कहते हैं, ''अगर नियोजित शिक्षकों को कुछ आपत्ति है तो उन्हें हमसे बात करनी चाहिए. उनकी आशंकाओं का समाधान होना चाहिए. आंदोलन करने से क्या लाभ?'' 

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