प्रधान संपादक की कलम से

विधानसभा चुनाव में भाजपा की भारी जीत के बाद 2017 में जब योगी आदित्यनाथ मुख्यमंत्री के पद के लिए अप्रत्याशित पसंद के तौर पर उभरे, उनका एक प्रमुख काम उस वक्त तारी अव्यवस्था में कानून का राज स्थापित करना था.

25 अप्रैल, 2018
25 अप्रैल, 2018

अरुण पुरी

उत्तर प्रदेश दशकों से ऐसी अवस्था में जीता रहा, जहां अपराध, राजनीति और भ्रष्ट अफसरशाही के गठजोड़ पर बनी विशाल इमारत ने उसकी आकांक्षाओं का गला घोंट दिया. शिखर पर विराजमान नेता जाति और धर्म के नारों पर लड़ाइयां छेड़ते रहे, तो कानून के दोनों तरफ काम करने वाले ताकतवर सरगनाओं ने खूब चांदी काटी.

सत्ता के साथ आपराधिक सरगनाओं के मेलजोल की शुरुआत कांग्रेस से हुई और भाजपा दशकों तक उसी व्यवस्था में धंसी रही. यूपी के शुरुआती डॉन हरिशंकर तिवारी का राज्य मंत्रिमंडल में करियर संगठित अपराध के विचारधारा-मुक्त स्वरूप और राजनीति से उसके जुड़ाव का पर्याप्त सबूत है. तिवारी ने कल्याण सिंह, मुलायम सिंह यादव, राजनाथ सिंह और मायावती के मातहत काम किया. 

पुलिस की एक टुकड़ी से घिरे होने के बावजूद पिस्तौल ताने तीन युवाओं के हाथों 15 अप्रैल को लाइव टेलीविजन पर अतीक अहमद की हत्या से यूपी के माफिया की कहानी के एक सबसे बड़े अध्याय का अंत हो गया. अतीक का करियर समानांतर पटरियों पर दौड़ा. ज्यों-ज्यों उसने अपराध जगत में दबदबा कायम किया, उसका राजनैतिक करियर भी परवान चढ़ता रहा.

इलाहाबाद पश्चिम की विधानसभा सीट उसने 1989, 1991, और 1993 में निर्दलीय के तौर पर जीती, तो 1996 में समाजवादी पार्टी (सपा) के उम्मीदवार के तौर पर इसे कायम रखा. जल्द ही वह पाला बदलकर अपना दल में आ गया और 2002 में फिर जीता. फिर वह सपा में लौटा और 2004 में फूलपुर की लोकसभा सीट जीती. अगले साल उस पर बसपा के विधायक राजू पाल की हत्या का आरोप लगा. तब तक वह उत्तर प्रदेश का शीर्ष आपराधिक सरगना बन चुका था. 

विधानसभा चुनाव में भाजपा की भारी जीत के बाद 2017 में जब योगी आदित्यनाथ मुख्यमंत्री के पद के लिए अप्रत्याशित पसंद के तौर पर उभरे, उनका एक प्रमुख काम उस वक्त तारी अव्यवस्था में कानून का राज स्थापित करना था. उन्होंने साफ कर दिया कि अपराध के प्रति उनमें 'शून्य सहिष्णुता’ है.

पुलिस को खुली छूट दी गई और इंसाफ की खातिर उसने विवादास्पद तौर-तरीके अपनाए. इनमें से कई कार्रवाइयों के लिए योगी को आलोचना झेलनी पड़ी, तो कड़े उपायों की बदौलत कानून-व्यवस्था की स्थिति में महसूस किए गए सुधार के लिए उनकी पीठ भी थपथपाई गई. 2022 के विधानसभा चुनाव में यह उनके और उनकी पार्टी के सत्ता में लौटने की मुख्य वजहों में से एक था.

अपने दूसरे कार्यकाल में योगी ने अर्थव्यवस्था में नई जान फूंकने और निवेश आकर्षित करने पर ज्यादा जोर दिया, जिसकी पूर्वशर्त थी अमन-चैन कायम रखना. अपने आप में कानून बन चुके माफिया सरगनाओं पर कड़ी कार्रवाई करना यूपी के पेरेस्त्रोइका या पुनर्निर्माण की उनकी योजना का अभिन्न अंग था.

मटमैले आपराधिक दृश्य का अध्ययन करने के बाद 66 माफिया सरगनाओं की पहचान की गई, उनके अपराधों पर विस्तृत डोसियर तैयार किए गए और कमजोर कड़ियों का अध्ययन किया गया. राज्य की कृशकाय अभियोजन शाखा में नई ऊर्जा फूंकी गई—घुटने टेक चुके प्यादों को हटा दिया गया, मामलों को कामयाब नतीजों पर पहुंचाने के लिए तैयार नए सरकारी वकील लाए गए.

कानून की पकड़ से बच निकले अपराधियों का पूरी बेरहमी से पीछा किया गया, और अगर हीला-हवाला किया तो उन्हें मार गिराया गया. योगी इस आलोचना के प्रति सतर्क हैं कि कार्रवाई के जरिए मुसलमानों को निशाना बनाया गया. उनके अफसरान बताते हैं कि राज्य की मोस्ट वॉन्टेड सूची के 66 डॉन में महज 13 मुसलमान हैं. और 183 पुलिस एनकाउंटरों में मुसलमानों की हिस्सेदारी 32 फीसद है.

कड़ी कार्रवाई के फायदे भी मिलने लगे, जब कानून का मजबूत कोड़ा माफिया डॉनों की पीठ पर पड़ा. इतने वर्षों में पहली बार अतीक अहमद पर अदालत में जुर्म साबित हुआ और राजू पाल की हत्या के मुख्य गवाह उमेश पाल को डराने-धमकाने के मामले में उसे ताउम्र कैद की सजा हुई.

फरवरी में कथित तौर पर अतीक के तीसरे बेटे असद की अगुआई में आए एक जत्थे के हाथों दिन-दहाड़े गोलियों से छलनी करके उमेश पाल की हत्या के बाद ही योगी सरकार बेहद सख्त हो गई. असद ने सरेंडर नहीं किया तो पुलिस टुकड़ी पीछा करते हुए 13 अप्रैल को उस तक पहुंच गई और उसने कथित तौर पर गोली चलाई तो अपराध में उसके साझेदार के साथ उसे मार गिराया. दो दिन बात अतीक और उसका छोटा भाई हमलवारों की गोलियों से मारे गए.

ठीक यहीं पटकथा गड़बड़ा गई. माफिया पर कड़ी कार्रवाई को वैसे तो जनता का व्यापक समर्थन हासिल था, पर अतीक की हत्या ऐसा भटकाव है जिससे बगैर योगी का काम चल सकता था. अतीक को उन्होंने कानूनी तौर पर बेबस और निहत्था कर दिया था और पुलिस की निगहबानी में जिस तरह हत्या हुई, उसने यूपी के पुलिस बल की विश्वसनीयता में पलीता लगा दिया.

स्थिति इस बात से और बदतर हो गई कि आत्मसमर्पण करते वक्त तीनों हत्यारे 'जय श्री राम’ का नारा लगा रहे थे. विपक्षी नेताओं ने योगी की कार्रवाई के सही-गलत, नैतिक और कानूनी-संवैधानिक सवालों और इसके भीतर निहित धर्म व जाति आधारित पक्षपात की तरफ इशारा किया है.

अतीक की घटना से जुड़ी परिस्थितियां इन सवालों को इस तरह चर्चा के केंद्र में ले आई हैं कि मुख्यमंत्री के पास उनका जवाब देने के सिवा कोई चारा नहीं है. इस हफ्ते हमारी आवरण कथा में हमारे लखनऊ स्थित एसोसिएट एडिटर आशीष मिश्र ने माफिया के साथ योगी की सीधी लड़ाई, उसकी कामयाबियों और खतरों का तानाबाना बुना है.

जिस तरीके से अतीक की हत्या हुई, वह बिला शक निंदनीय है, और कई परेशान करने वाले सवाल उठाता है. जब तक इस हत्या का काम सौंपने वालों को न्यायिक प्रणाली के जरिए कानून के कठघरे में नहीं लाया जाता, इसका अर्थ यही होगा कि शिखर के नीचे का पहाड़ अब भी जस का तस कायम है.

हत्या के तीन दिन बाद सार्वजनिक आयोजन में बोलते हुए योगी ने कहा कि माफिया और पेशेवर अपराधी अब नागरिकों को धमका नहीं सकते और ऐसा करके बच नहीं सकते, और यह भी कि यूपी में अब कानून का राज है. राज्य के आपराधिक सरगनाओं के खिलाफ अपना अभियान जारी रखते हुए यह पक्का करने की जिम्मेदारी अब उनकी और उत्तर प्रदेश प्रशासन की है कि सचमुच कानून का राज हो.

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