जालंधर की जोरदार जंग

अतीत के उलट, इस उपचुनाव में सीधा मुकाबला नहीं होगा बल्कि पंच-कोणीय लड़ाई होगी जिसमें हर पक्ष जोर लगा रहा है

मान का अभियान : आप उम्मीदवार सुशील कुमार रिंकू के नामांकन से पहले रोडशो के दौरान सीएम
मान का अभियान : आप उम्मीदवार सुशील कुमार रिंकू के नामांकन से पहले रोडशो के दौरान सीएम

आगामी 10 मई को जालंधर संसदीय सीट पर होने वाले उपचुनाव के लिए बीते 17 अप्रैल को आम आदमी पार्टी (आप) के उम्मीदवार सुशील कुमार रिंकू ने नामांकन पत्र दाखिल किया. इस दौरान ढोल-नगाड़ों के बीच क्रांतिकारी गीत गाते उत्तर भारत से आए हजारों कार्यकर्ताओं के बीच पंजाब के मुख्यमंत्री भगवंत मान इस काफिले का नेतृत्व कर रहे थे. मान के साथ राज्यसभा सांसद अशोक मित्तल, राज्य के वित्त मंत्री हरपाल चीमा, स्थानीय विधायक शीतल अंगराल, बलकार सिंह, इंद्रजीत मान और रमन अरोड़ा के साथ-साथ आप में भाजपा से आए मोहिंदर भगत और अकाली दल से आए जगबीर बराड़ भी थे. यह सारा तामझाम यह दिखाने के लिए था कि आप प्रत्याशी ही जीत का प्रमुख दावेदार है. आप और मान, दोनों ही, 2022 में मिली शानदार जीत की चमक कायम रखने के लिए बेताब हैं. उस जीत पर एक हद तक इस धारणा का असर पड़ा है कि पंजाब में अरविंद केजरीवाल प्रॉक्सी के जरिये शासन कर रहे हैं, और कि मान का शासन अप्रभावी है तथा वे राज्य में बढ़ती कट्टरता पर लगाम कसने में असमर्थ हैं. खासकर, अमृतपाल सिंह मामले के बाद प्रशासन की रंगत काफी उतर गई है. 

जालंधर दलितों के लिए आरक्षित निर्वाचन क्षेत्र है. यहां से दो बार के लोकसभा सदस्य चौधरी संतोख सिंह के जनवरी में निधन के कारण उपचुनाव होना है. परंपरागत रूप से कांग्रेस का गढ़ रहे इस क्षेत्र में पार्टी चार बार हारी है—दो बार अकाली दल के हाथों और दो बार जनता दल से. 2022 के चुनाव में, आप की लहर के बीच भी कांग्रेस इसे बचाए रखने में सफल रही. इस लोकसभा क्षेत्र के नौ विधानसभा क्षेत्रों में कांग्रेस के पांच और आप के चार विधायक हैं. कांग्रेस ने इस बार संतोख की पत्नी करमजीत कौर चौधरी को मैदान में उतारा है जो दिवंगत पति के प्रति सहानुभूति के आधार पर वोट मांग रही हैं. उन्हें पार्टी का भी पुरजोर समर्थन है जिसे सीट बचाने के साथ यह उम्मीद भी है कि इस जीत से राज्य में उसके पुनरुद्धार की नींव पड़ सकेगी. चौधरी के प्रचार अभियान का संचालन नेता प्रतिपक्ष प्रताप सिंह बाजवा कर रहे हैं.

वहीं, आप दलबदलुओं के आसरे है. उसके उम्मीदवार रिंकू पर्चा दाखिल करने से कुछ ही दिन पहले पार्टी में शामिल हुए थे. उन्होंने 2022 में कांग्रेस के टिकट पर जालंधर पश्चिम विधानसभा सीट से चुनाव लड़ा था. आप ने बराड़ (जालंधर कैंट) को साथ लाने के लिए अकाली दल में और मोहिंदर भगत (जालंधर पश्चिम) को लुभाकर भाजपा से दलबदल कराया. उसने संतोख चौधरी के भतीजे और करतारपुर विधानसभा क्षेत्र में कांग्रेस नेता सुरिंदर चौधरी को शामिल करके कांग्रेस की संभावनाओं में सेंध लगाने की कोशिश की, पर बाजवा के हस्तक्षेप से सुरिंदर पांच दिनों में ही कांग्रेस में वापस आ गए.

आप और कांग्रेस दोनों जानती हैं कि उनके सामने कठिन जंग है. इस बार यहां सीधा मुकाबला नहीं है बल्कि पंच-कोणीय लड़ाई होगी. अकाली दल ने जहां बंगा से अपने विधायक सुखविंदर कुमार को मैदान में उतारा है, वहीं भाजपा ने अकाली दल से आए इंदर इकबाल अटवाल पर दांव लगाया है. पिछले साल जून में संगरूर लोकसभा उपचुनाव में जीत के बाद सिमरनजीत सिंह मान के अकाली दल (अमृतसर) को भी हल्के में नहीं लिया जा सकता. उन्होंने अपने विश्वासपात्र गुरजंट सिंह कट्टू को प्रत्याशी बनाया है. 

मुख्यत: ग्रामीण निर्वाचकों वाले मालवा इलाके, जिसमें जट सिखों का वर्चस्व है, के विपरीत जालंधर में ग्रामीण-शहरी दोनों क्षेत्रों में दलितों की बड़ी आबादी है. यहां 2022 के चुनाव में 16,69,098 वोटरों में 42.7 फीसद दलित थे. ऐसे में यहां की चुनावी लड़ाई की दिशा दलित और ऊंची जाति के हिंदू तय करते हैं. दलित भावनाओं को भुनाने के लिए कांग्रेस ने राज्य के एकमात्र दलित मुख्यमंत्री रहे चरणजीत चन्नी को आगे किया है. चन्नी यह कहते हुए पीड़ित कार्ड खेल रहे हैं कि उन्हें सतर्कता ब्यूरो की जांच का निशाना बनाया गया. चन्नी रामदासी सिख हैं और उन्हें इस समुदाय के डेरों का करीबी माना जाता है.

भाजपा प्रत्याशी अटवाल मजहबी सिख हैं. उनके पिता चरणजीत अटवाल 2019 में अकाली-भाजपा के संयुक्त उम्मीदवार थे और चौधरी से करीब 19,000 मतों से हार गए थे. वाल्मीकि/मजहबी सिखों ने अतीत में जालंधर में रामदासी/रविदासी/आदि धर्मी समुदाय को चुनौती दी, और आप, शिरोमणि अकाली दल (शिअद), कांग्रेस और शिअद (अमृतसर) के उम्मीदवार इसी समुदाय से हैं. अटवाल अपने पिता की विरासत को हासिल करते हुए वाल्मीकि/मजहबी सिखों की चुनौती आगे बढ़ाने की उम्मीद कर रहे हैं. परंपरागत रूप से भाजपा के पास ग्रामीण पंजाब में काडर नहीं है. इसलिए उसने दलबदल जैसे साधनों का सहारा लिया है. नामांकन प्रक्रिया से कुछ ही दिन पहले अटवाल के भाजपा में प्रवेश से स्थानीय भाजपा कार्यकर्ताओं में काफी नाराजगी है.

वैसे, भाजपा को सबसे बड़ा झटका मोहिंदर भगत के पार्टी छोड़ने से लगा. जालंधर पश्चिम और जालंधर कैंट विधानसभा क्षेत्रों में भगत दलित समुदाय की अहम उपस्थिति है. भाजपा को डर है कि भगत के साथ उनका जनाधार भी पार्टी से दूर जा सकता है. भाजपा ने अपनी हैसियत बचाए रखने के लिए मोहिंदर भगत के पिता और पूर्व मंत्री चुन्नी लाल भगत से प्रेस कॉन्फ्रेंस करवाई जिसमें उन्होंने कहा कि वह अपने बेटे के साथ नहीं हैं. वैसे, पंजाब की ग्रामीण आबादी ने असल में भाजपा को माफ नहीं किया है—पहले 2020 में केंद्र सरकार के तीन कृषि कानूनों के लिए और हाल में विवादास्पद खालिस्तान प्रचारक अमृतपाल के खिलाफ कार्रवाई के कारण. अमृतपाल प्रकरण के कारण ही आप ने भी पंथिक वोटरों की सहानुभूति खो दी है, जिन्हें आकर्षित करने की कोशिश सुखबीर बादल का शिरोमणि अकाली दल कर रहा है. ऐसी ही कोशिश सिमरनजीत मान की भी है. मुख्यमंत्री मान को उम्मीद है कि मार्च में बेमौसम बारिश के कारण फसलों के नुक्सान से किसानों को राहत उपाय के तौर पर मुआवजा दिए जाने का उनके दल को लाभ होगा. संभावना है कि कांग्रेस और शिअद राज्य सरकार के इस दावे को चुनौती देंगे. उम्मीद है कि राजनीति की शानदार अनिश्चितताएं ही यहां अंतत: प्रबल होंगी.

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