बहुत कठिन है डगर दिल्ली की
केसीआर के संभावित साथी भी उनके लिए एक अन्य चुनौती खड़ी कर रहे हैं, क्योंकि उन सभी की भी राष्ट्रीय महत्वाकांक्षाएं कुछ कम नहीं हैं

आजकल हर कोई यात्रा पर है, तो तेलंगाना के मुख्यमंत्री के. चंद्रशेखर राव (केसीआर) भला क्यों पीछे रहें. उन्होंने दशहरे पर तेलंगाना राष्ट्र समिति (टीआरएस) का नाम बदलकर भारत राष्ट्र समिति (बीआरएस) करते हुए अपनी राष्ट्रीय महत्वाकांक्षाओं को स्पष्ट कर दिया था. अब वे महाराष्ट्र, मध्य प्रदेश, हरियाणा और अन्य राज्यों को कवर करते हुए दिल्ली तक की सड़क यात्रा की योजना बना रहे हैं. साल 2024 के लोकसभा चुनाव से पहले सत्तारूढ़ भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) का एक विकल्प तैयार करने की उनकी महत्वाकांक्षी योजना के लिए सबसे बड़ी चुनौती 'साथी यात्रियों' की तलाश है.
केसीआर 9 दिसंबर को राष्ट्रीय राजधानी में एक रैली को संबोधित करेंगे. यह मानवाधिकार दिवस की पूर्व संध्या है, और इसके पीछे उनका उद्देश्य—भाजपा के नेतृत्व वाली केंद्र सरकार के तहत कथित 'अधिकारों और स्वतंत्रता के दमन' के मुद्दे को जोर-शोर से उठाना है. वैसे, इस कार्यक्रम को उनके और उनकी पार्टी बीआरएस, (हालांकि नाम परिवर्तन को औपचारिक रूप दिया जाना अभी बाकी है) जिसका जल्द ही दिल्ली के वसंत विहार में एक पार्टी कार्यालय होगा, दोनों के लिए संभावित शक्ति प्रदर्शन के रूप में देखा जा रहा है. तारीख का चुनाव एक अन्य कारण से भी अहम है—9 दिसंबर, 2009 की रात को ही तत्कालीन संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन (यूपीए) सरकार ने अलग तेलंगाना राज्य की केसीआर की मांग स्वीकार कर ली थी, और इसके साथ ही 11 दिनों की उनकी भूख हड़ताल खत्म हो गई थी.
तेरह साल बाद, केसीआर खुद को भाजपा के नेतृत्व वाले राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (एनडीए) के खिलाफ प्रमुख प्रतिद्वंद्वी के रूप में स्थापित करने की कोशिश कर रहे हैं. इसके लिए वे पिछले दो साल में कई क्षेत्रीय दलों के नेताओं से बातचीत कर चुके हैं. वे अपने संभावित गठबंधन के लिए एजेंडा तैयार करने के लिए किसानों के निकायों, सेवानिवृत्त नौकरशाहों और सिविल सोसाइटी के कार्यकर्ताओं से भी विचार-विमर्श कर रहे हैं.
लेकिन दशहरे के दिन की उनकी घोषणा को वांछित प्रतिक्रिया नहीं मिल सकी. अब तक सीपीआइ और सीपीआइ (एम) के अलावा केवल पूर्व प्रधानमंत्री एच.डी. देवेगौड़ा के जनता दल (सेक्युलर) जो मुख्य रूप से कर्नाटक तक ही सीमित है और तमिलनाडु के सांसद थोल थिरुमावलवन के नेतृत्व वाले विदुथलाई चिरुथिगल काची ने ही केसीआर की 'भाजपा-मुक्त भारत' योजना का समर्थन किया है. उनकी रणनीति 2023 के मध्य तक और अधिक दलों को इस योजना में शामिल करने की है. स्थानीय स्तर पर भी, बीआरएस को केवल तेलंगाना की सीमा से लगे कर्नाटक और महाराष्ट्र के छिटपुट इलाकों में ही समर्थन मिल पा रहा है.
केसीआर ने 2019 के लोकसभा चुनाव से पहले भी गठबंधन बनाने के लिए इसी तरह के प्रयास किए थे. उन्होंने देशभर के प्रमुख विपक्षी नेताओं से मुलाकात की थी, लेकिन उनका 'गैर-भाजपा, गैर-कांग्रेसी' गठबंधन नहीं बन पाया. राजनीति, नीति और शासन जैसे मुद्दों पर काम करने वाले हैदराबाद विश्वविद्यालय के जी. किरण कुमार कहते हैं, ''2024 में एक वैकल्पिक सरकार के लिए गठबंधन की जो भी संभावनाएं हो सकती हैं, वे चुनाव के बाद ही संभव होंगी. लेकिन बीआरएस देश में एक वैकल्पिक नैरेटिव गढऩे में सक्रिय भूमिका निभा सकता है.'' केसीआर के 'वैकल्पिक नैरेटिव', जिस पर अभी भी काम चल ही रहा है, के दो प्रमुख पहलू हैं—राजनैतिक और आर्थिक. राजनैतिक स्तर पर, वे चाहते हैं कि सभी क्षेत्रीय दल 'देश की लोकतांत्रिक संघीय भावना की रक्षा' के लिए एक साथ आएं. इस बीच, उनका आर्थिक एजेंडा कल्याणकारी और लोकलुभावन उपायों का मिश्रण है, जो मुख्यत: किसानों और वंचित समूहों पर ध्यान केंद्रित कर रहा है, और इसे तेलंगाना में पहले आजमाया जा चुका है.
हैदराबाद की एनएएलएसएआर यूनिवर्सिटी ऑफ लॉ में राजनीति विज्ञान पढ़ाने वाले हरती वागीशन का मानना है, ''आंकड़ों को समझने और उसका निचोड़ निकालने की अपनी क्षमता, व्यापक जमीनी कार्य करने की प्रवृत्ति और वाक्पटुता से, केसीआर आज के अधिकांश मुख्यमंत्रियों से कुछ बेहतर नजर आते हैं.'' वे इसमें एक बात और जोड़ते हैं, ''राष्ट्रीय स्तर की स्वीकार्यता और अन्य दलों को एक साथ लाने के लिए, केसीआर को एक राष्ट्रीय दृष्टि विकसित करनी होगी. इसमें वे अधूरे और अपर्याप्त नजर आते हैं.''
नाम भर बदल देने से एक क्षेत्रीय पार्टी, राष्ट्रीय पार्टी नहीं बन जाती. तेलंगाना के मुख्यमंत्री को इसके लिए बहुत कुछ करने की जरूरत है. नाम बदलने से पार्टी की विशिष्ट क्षेत्रीय पहचान भी नेपथ्य में चली जाती है—यह वह मुद्दा है जिस पर टीआरएस खड़ी हुई और सत्ता में आई. लोकसभा चुनाव से छह महीने पहले 2023 में राज्य में विधानसभा चुनाव होने वाले हैं. लगातार दो कार्यकाल पा चुकी केसीआर सरकार सत्ता विरोधी चुनौतियों का भी सामना कर रही है. ऐसे में इसके नेता का राष्ट्रीय महत्वाकांक्षाओं पर बल देना एक ऐसा जुआ है जिसमें वे बड़े दांव खेलने का जोखिम उठाएंगे. राजनैतिक टिप्पणीकार के. नागेश्वर सावधान करते हैं, ''प्रतिद्वंद्वी कांग्रेस-भाजपा ने यह कहना शुरू कर दिया है कि केसीआर को अब खुद को तेलंगाना की पहचान से जोड़कर देखा जाना रास नहीं आ रहा. ऐसे में इस पहचान के लिए एक नए दावेदार के उभरने की संभावनाओं से इनकार नहीं किया जा सकता.''
केसीआर के संभावित साथी भी उनके लिए एक अन्य चुनौती खड़ी कर रहे हैं, क्योंकि उन सभी की भी राष्ट्रीय महत्वाकांक्षाएं कुछ कम नहीं हैं. बिहार के मुख्यमंत्री और जनता दल (यूनाइटेड) के नेता नीतीश कुमार ने केसीआर की पटना यात्रा के दौरान 31 अगस्त को, भाजपा विरोधी देशव्यापी महागठबंधन बनाने का जिक्र सबसे पहले छेड़ा था. पश्चिम बंगाल की सीएम ममता बनर्जी जैसी नेताओं ने भी पिछले आम चुनाव से पहले इसी तरह के प्रयास किए थे. गैर-भाजपा, गैर-कांग्रेस गठबंधन का नेतृत्व करने के कई दावेदार हैं. ऐसे में केसीआर को जल्द एहसास हो सकता है कि दिल्ली की राह लंबी और बहुत टेढ़ी-मेढ़ी है तथा भीड़भाड़ इतनी है कि लगातार आगे बढ़ते रहना इतना आसान नहीं है.