किले पर कब्जे की लड़ाई
लगभग 25 साल सत्ता में रहने के बाद भाजपा को अब गुजरात में त्रिकोणीय लड़ाई का सामना करना पड़ रहा है. क्या इससे पार्टी को मदद मिलेगी या नुक्सान होगा, या यह चुनाव हैरान करने वाला साबित हो सकता है

अक्तूबर महीने की 10 तारीख को, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अपने गृह राज्य गुजरात में एक चेतावनी की घंटी बजाई जिसमें उन्होंने भाजपा कार्यकर्ताओं को गांवों में प्रतिद्वंद्वी कांग्रेस की ''गुपचुप'' तैयारियों को लेकर आगाह किया था. कांग्रेस की तैयारियों से सावधान करते हुए मोदी ने अहमदाबाद में कार्यकर्ताओं से कहा, ''आने वाले चुनावों में आपको सतर्क रहने की जरूरत है. उन्होंने (कांग्रेस) एक नई रणनीति अपनाई है. वे बोलते नहीं हैं, लेकिन गांवों में पहुंच रहे हैं, बैठकें कर रहे हैं.'' कुछ दिनों बाद, दिल्ली में भाजपा नेताओं के साथ एक बैठक में, केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल के नेतृत्व वाली आम आदमी पार्टी (आप) से मिलने वाली चुनावी चुनौती का मुकाबला करने की तत्काल आवश्यकता के बारे में बात की. उन्होंने माना कि आप पार्टी जल्द ही न केवल गुजरात में बल्कि अन्य राज्यों में भी मुख्य विपक्षी पार्टी बन सकती है. मोदी-शाह की जोड़ी की तरफ से दिखाए गए दो लाल झंडे गुजरात में विधानसभा चुनावों में भगवा पार्टी के लिए उस राज्य में सामने आने वाली चुनौतियों के संकेत देते हैं जहां लगभग 25 वर्षों तक उसने निर्बाध रूप से शासन किया है.
भाजपा सूत्रों का कहना है कि पार्टी इस बार कांग्रेस के 1985 में बनाए गए 149 सीटों के रिकॉर्ड (कुल 182 में से) को तोड़ने की महत्वाकांक्षा लेकर चल रही है, लेकिन जमीनी सच्चाई उसकाकगणित बिगाड़ रही है. दो दशकों से अधिक की सत्ता विरोधी लहर, राज्य के नेताओं के बीच अंदरूनी कलह और एक ऐसे करिश्माई नेता का अभाव जो मोदी के जाने से पैदा शून्य भर सकता, भाजपा आलाकमान के लिए परेशानी का सबब बनेगा. 2017 में, मोदी के प्रधानमंत्री बनने के बाद भाजपा ने पहला चुनाव लड़ा और भगवा पार्टी को नुक्सान हुआ था. कांग्रेस ने 77 सीटें जीतीं, जो तीन दशकों में सबसे अधिक थीं. अधिकांश विशेषज्ञ भाजपा की जीत की ही भविष्यवाणी कर रहे हैं, लेकिन प्रधानमंत्री ऐसी जीत से कम कुछ भी नहीं चाहेंगे जो उनकी लोकप्रियता पर एक आधिकारिक मुहर लगाए. गुजरात में, मोदी ऐसी किसी भी स्थिति को रोकने के लिए सख्त कदम उठाने से नहीं हिचकिचाते, जिससे उनकी विरासत को खतरा दिखता हो. सितंबर 2021 में एक बदलाव में, पार्टी ने एक नया मुख्यमंत्री बनाया और मंत्रिमंडल बदल दिया. 2014 के बाद से यह तीसरा परिवर्तन था.
पहले की तरह, भाजपा केंद्र में मोदी और राज्य में सीएम भूपेंद्रभाई पटेल के नेतृत्व में विकास के एजेंडे पर भरोसा कर रही है. पार्टी के आख्यान में, यह डबल इंजन वाली सरकार गुजराती अस्मिता के लिए भी महत्वपूर्ण है, क्योंकि यही इंजन भारत को दुनिया में महाशक्ति बना सकता है. 145 गैर-शहरी सीटों को कवर करते हुए पांच मार्गों पर 10 दिवसीय गौरव यात्रा दीवाली से ठीक पहले 24 अक्तूबर को संपन्न हुई.
इसके साथ एक और अस्मिता भी जुड़ गई है, भले ही वह फिलहाल खो गई हो और वह है हिंदुत्व गौरव. गुजरात सरकार के फैसलों से 2002 के दंगों की भयानक यादें फिर से ताजा हो गई हैं. केंद्रीय गृह मंत्रालय के अनुमोदन के बाद पीडि़ता बिलकिस बानो के मामले में 11 दोषियों को रिहा कर दिया गया. 2002 में बिलकिस बानो के साथ सामूहिक बलात्कार किया गया था और उनके परिवार के 14 सदस्यों की हत्या हुई थी. चुनावी विमर्श में इसका कोई जिक्र नहीं है, लेकिन विश्लेषकों का मानना है कि भाजपा ने हिंदुत्व वोटों को ध्यान में रखकर ऐसा किया. विपक्षी आप ने इस मुद्दे से किनारा कर लिया है. आप के एक सूत्र का कहना है, ''हम सांप्रदायिक मुद्दों से दूर रहना चाहते हैं... यहां मतदाताओं में बहुत ध्रुवीकरण है और हम किसी का पक्ष नहीं लेना चाहते हैं.''
इस तरह के दावे बेमानी नहीं लगते. कांग्रेस के दलबदलू नेता सी.के. राउलजी जो दोषियों की रिहाई के समय विवादों के केंद्र में रहे, पिछली बार गोधरा से भाजपा के टिकट पर महज 258 वोटों के अंतर से जीते थे. हालांकि, अतीत के विपरीत, भाजपा का अभियान केवल गुजरात या हिंदुओं के लिए उपलब्धियों तक सीमित नहीं है. अगर 2017 में, कांग्रेस ने 'विकास पागल हो गया' नामक अपने डिजिटल अभियान के साथ एजेंडा सेट किया, तो इस बार आप ने राज्य में चुनावी वादों की बाढ़ ला दी है जिसके बाद मोदी ने ''रेवड़ी'' संस्कृति को निशाने पर लिया.
लेकिन फिर पीएम अक्तूबर में चार बार गुजरात दौरे पर गए और उज्ज्वला योजना के लाभार्थियों के लिए दो मुफ्त एलपीजी सिलेंडर जैसी परियोजनाओं और सरकारी अनुदानों की एक शृंखला की घोषणा की. भाजपा मतदाताओं के लिए एक चुनावी बोनस की भी पेशकश कर रही है. इसमें कनिष्ठ या जूनियर पुलिसकर्मियों के वेतन में संशोधन के लिए 550 करोड़ रुपए, आंगनवाड़ी और परिवहन कार्यकर्ताओं और तलातियों (राजस्व क्लर्कों) के भत्ते में वृद्धि, गुजरात के सैनिकों के शहीद होने पर मुआवजे में वृद्धि के साथ साबरमती रिवरफ्रंट पर एक शहीद स्मारक बनाने की योजना जैसे लोकलुभावन प्रस्ताव हैं.
कृषि संकट भी चिंता का एक विषय है. 2017 में, विशेष रूप से सौराष्ट्र में पार्टी के खराब प्रदर्शन के पीछे इसे ही एक प्रमुख कारण माना गया था. इस साल की शुरुआत में, किसानों ने अपर्याप्त बिजली आपूर्ति, कुछ फसलों के लिए कम मुआवजे का विरोध किया था और नमक के लिए न्यूनतम समर्थन मूल्य की भी मांग की थी. मवेशियों में लम्पी रोग के कारण डेयरी क्षेत्र को व्यापक नुक्सान हुआ है. गुजरात ने इस प्रकोप में लगभग 6,000 मवेशियों को खो दिया है और इसने पार्टी की चिंताओं को और बढ़ा दिया है. राज्य और केंद्र की योजनाओं के लाभों के बारे में किसानों में जागरूकता पैदा करने के लिए, राज्य भर में ऑडियो-विजुअल स्क्रीन लगाई गई हैं, जिसमें उनका विवरण दिखाया जा रहा है.
इस बीच, राज्य के कर्मचारी पुरानी पेंशन योजना को फिर से बहाल करने की मांग कर रहे हैं क्योंकि नई प्रणाली सुरक्षित मासिक आय की गारंटी नहीं देती. कांग्रेस इस मुद्दे पर भाजपा को घेरने की कोशिश कर रही है. पार्टी प्रवक्ता मनीष दोशी कहते हैं, ''हम यूनियनों के संपर्क में हैं और पुरानी पेंशन योजना को वापस लाने का वादा किया है, जैसा कि हमने राजस्थान और छत्तीसगढ़ में किया है.'' इसके अलावा, गुटबाजी जैसी छोटी-मोटी परेशानियां भी हैं जिसमें सीएम पटेल और प्रदेश भाजपा अध्यक्ष सी.आर. पाटिल के बीच शीत युद्ध छिड़ गया है.
इन आंतरिक तनावों से वाकिफ मोदी ने खुद चुनाव प्रचार की कमान संभाली है. यह अब एकमात्र राज्य है जहां भाजपा के पास राजनैतिक मामलों के लिए या चुनावी तैयारियों की निगरानी के लिए कोई पर्यवेक्षक नहीं है. संगठनात्मक कार्य और चुनावी प्रबंधन की अगुआई कर रही मंत्रियों और सांसदों के नेतृत्व वाली प्रवासी टीम सीधे पीएम को रिपोर्ट करती है. यहां तक कि शाह भी राज्य के अन्य केंद्रीय मंत्रियों पुरुषोत्तम रूपाला और मनसुख मांडविया की तरह द्वितीय स्तर पर भूमिका निभा रहे हैं. फिर भी, शाह सप्ताह में कम से कम तीन दिन गुजरात पहुंचकर, स्थानीय समुदायों में असंतोष और मतभेद दूर करते हैं.
आरएसएस की राज्य इकाई भी सीधे पीएम के साथ काम कर रही है. पिछले दो वर्षों से, संघ के सहयोगियों ने आदिवासी और दलित समूहों को लुभाने के लिए कई संपर्क कार्यक्रम किए हैं. दरअसल, गौरव यात्रा के दो मार्ग आदिवासी सीटों को समर्पित थे. हाल ही में, आंदोलनकारी आदिवासी समूहों के दबाव में, सीएम पटेल ने उस पार तापी नर्मदा लिंक परियोजना को खत्म करने की घोषणा की जिसमें पश्चिमी घाट के अधिशेष क्षेत्रों से गुजरात के सौराष्ट्र और कच्छ में पानी भेजने का प्रस्ताव था. हालांकि, कांग्रेस ने सरकार पर हमला करते हुए कहा कि यह एक झूठा वादा है क्योंकि राज्य के पास केंद्रीय बजट में घोषित योजना को वापस लेने का अधिकार नहीं है.
पटेल को सीएम बनाकर भगवा पार्टी को उम्मीद है कि उसे राज्य के प्रभावशाली पाटीदार समुदाय का समर्थन फिर से मिलेगा. 2017 में ओबीसी आरक्षण की मांग पर हुए पाटीदार आंदोलन ने भाजपा को झटका दिया था, लेकिन इस बार विरोध के चेहरे हार्दिक पटेल उनके खेमे में हैं. इस बीच, लेउवा पटेलों के बीच बेहद प्रभावशाली व्यक्तित्व नरेश पटेल कथित तौर पर केंद्रीय मंत्री रूपाला और सी.आर. पाटिल के जरिए मोदी के संपर्क में हैं.
आप पार्टी की चुनौती
इस चुनाव में भाजपा और कांग्रेस के नेताओं ने आप को जितना खारिज किया है, उसके देखते हुए माना जा रहा है कि केजरीवाल के नेतृत्व वाली पार्टी बड़ी बाधा साबित हो सकती है. पिछले चुनाव में निराशाजनक प्रदर्शन के बाद, आप को ग्रामीण सीटों पर कांग्रेस का खेल खराब करने की उम्मीद है, जबकि 55 शहरी सीटों पर वह भाजपा को नुक्सान पहुंचा सकती है. शायद यही कारण है कि कांग्रेस ग्रामीण क्षेत्रों पर इस विश्वास के साथ अधिक ध्यान केंद्रित कर रही है कि शहरी क्षेत्रों में आप-भाजपा के बीच कांटे की टक्कर से उन्हें परोक्ष रूप से मदद मिलेगी.
मध्य और निम्न मध्यम वर्ग के वोटों पर नजर रखते हुए, आप ने मुफ्त बिजली, शिक्षा और स्वास्थ्य के अपने ट्रेडमार्क वादों के साथ एजेंडा तय किया है. हर घर को 300 यूनिट तक मुफ्त बिजली के वादे पर गुजरात में खूब चर्चा हो रही है. रिक्त सरकारी पदों पर भर्ती और बेरोजगारी लाभ अन्य मुद्दे हैं जो लोगों का ध्यान खींच रहे हैं. अगस्त में राजकोट में, केजरीवाल ने समझाया कि कैसे आप सरकार राज्य में दस लाख पदों पर भर्ती करेगी: ''तलाती परीक्षा फरवरी 2023 में आयोजित की जाएगी, अप्रैल में परिणाम और उसी महीने पोस्टिंग. मई में शिक्षकों के लिए टीईटी परीक्षा, जुलाई में परिणाम और अगस्त में पोस्टिंग. नवंबर में पीएसआइ और एएसआइ की परीक्षाएं आदि.'' ऐसा करते हुए आप संयोजक ने पेपर लीक के मुद्दे पर राज्य सरकार पर हमला बोला, जिससे हाल के वर्षों में कई बार सरकारी भर्ती प्रक्रिया में देर हुई है.
केजरीवाल अन्य पार्टियों की ओर से की गई घोषणाओं से भी अपने हित साधने की कोशिश कर रहे हैं. 19 अक्तूबर को जब मोदी ने एक मॉडल क्लासरूम का निरीक्षण किया और राज्य में स्मार्ट पब्लिक स्कूल क्लासरूम बनाने के लिए 4,260 करोड़ रुपए की परियोजना—मिशन स्कूल ऑफ एक्सीलेंस—की घोषणा की, तो दिल्ली के मुख्यमंत्री ने तुरंत टिप्पणी की कि यह उनके प्रयासों का परिणाम है कि आज सरकारी स्कूलों में शिक्षा की गुणवत्ता को राजनीति की मुख्यधारा में जगह मिलने लगी है और यह उनकी सबसे बड़ी उपलब्धि है. उन्होंने अपनी हिंदू पहचान का दावा करने का कोई मौका नहीं गंवाया, यहां तक कह गए कि उन्हें भगवान कृष्ण के नाम के आह्वान का स्वाभाविक अधिकार है क्योंकि उनका जन्म कृष्ण जन्माष्टमी पर हुआ था. हाल में, उन्होंने भारत में समृद्धि लाने के लिए नोटों पर हिंदू देवी-देवता लक्ष्मी और गणेश के चित्र छापने की केंद्र से अपील करके एक नया चुनावी शिगूफा छेड़ा है.
आप के वादे शिक्षा और स्वास्थ्य सेवा तक ही सीमित नहीं हैं. पुलिसकर्मियों, राज्य सरकार के कर्मचारियों, आंगनवाड़ी कार्यकर्ताओं और तलातियों के वेतन/भत्ते में बढ़ोतरी से लेकर वरिष्ठ नागरिकों की तीर्थयात्राओं के लिए भुगतान करने से लेकर व्यापारियों के लिए कर माफी की शुरुआत तक, केजरीवाल के चुनावी पिटारे में हर सामाजिक वर्ग के लिए कुछ न कुछ है. इस चुनावी समर की भविष्यवाणी मुश्किल बताते हुए समाजशास्त्री और राजनैतिक विश्लेषक घनश्याम शाह कहते हैं, ''आप पर सबका ध्यान गया है. देखा जा सकता है कि मोदी और शाह गुजरात में क्यों खासा समय बिता रहे हैं... यह उनकी घबराहट दर्शाता है. मुझे लगता है कि मध्यम वर्ग के बीच असंतोष है, लेकिन इसे कैसे दूर किया जाता है यह देखा जाना बाकी है.''
जो बात आप के खिलाफ जाती है, वह है इसका कमजोर संगठनात्मक ढांचा. पार्टी ने लगभग 80 सीटों के लिए उम्मीदवारों की घोषणा की है और जैसा कि अपेक्षित था, उनमें से अधिकांश नौसिखुए और कुछ कांग्रेस के दलबदलू हैं. इसके राज्य संयोजक 33 वर्षीय गोपाल इटालिया गुजरात में आप का सबसे प्रमुख चेहरा हैं. एक पूर्व कांस्टेबल, इटालिया 2017 के पाटीदार आंदोलन के दौरान चर्चा में आए और एक बार तत्कालीन गृह मंत्री प्रदीप सिंह जडेजा पर जूता फेंकने के लिए खबरों में रहे. इटालिया 2020 में आप में शामिल हुए थे. वे पाटीदार युवाओं के लिए एक आकर्षण बन सकते हैं. तुनकमिजाज इटालिया की हरकतों का अक्सर उल्टा असर होता है, जैसा कि हाल ही में हुआ जब उन्होंने पीएम मोदी की मां के लिए ''असंसदीय भाषा'' का इस्तेमाल किया था.
एक अन्य जाना माना चेहरा, महासचिव इसुदान गढ़वी हैं. इस ओबीसी नेता और पूर्व-टीवी ऐंकर जो अपनी भाषण कला के लिए जाने जाते हैं, की परीक्षा होनी बाकी है. गुजरात प्रभारी और पंजाब के राज्यसभा सांसद राघव चड्ढा सप्ताह में तीन दिन राज्य के हर कोने में बिताते हैं. भाजपा ने दिल्ली के 'शराब घोटाले' में मनीष सिसोदिया की कथित संलिप्तता को लेकर आप पर हमला किया है, हालांकि आप ने इसे भगवा पार्टी की गुजरात में हार के डर से पैदा झुंझलाहट का नतीजा बताकर खारिज कर दिया.
कांग्रेस का 'गुपचुप' खेल
गुजरात में कांग्रेस का अभियान अब तक खामोशी से चल रहा है. 2017 में, इसका नेतृत्व राहुल गांधी ने किया था और वह नरम हिंदुत्व और भाजपा के विकास के दावों को उजागर करने पर आधारित था. इस बार राहुल भारत जोड़ो यात्रा में व्यस्त हैं, जिसमें आश्चर्यजनक रूप से गुजरात को कवर नहीं किया जा रहा है. हालांकि, राजस्थान के सीएम अशोक गहलोत, जिन्होंने 2017 में पार्टी के प्रदर्शन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई, पर्यवेक्षक के रूप में वापस आए हैं. अन्य राज्यों के वरिष्ठ नेताओं को भी स्थानीय मुद्दों को सुलझाने के लिए सीटवार जिम्मेदारी सौंपी गई है. कांग्रेस को दिग्गज नेता अहमद पटेल की कमी खलेगी जो सोनिया गांधी के राजनैतिक सचिव हुआ करते थे.
पार्टी ने राज्य में एक मजबूत संगठन बनाए रखा है. यह पार्टी कार्यकर्ताओं के बीच आशा पैदा कर रहा है और यह उसके टिकट के अभिलाषियों की लंबी-चौड़ी संख्या से समझा जा सकता है. हालांकि उम्मीदवारों चयन चुनाव परिणाम में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएगा. आलाकमान की मर्जी से प्रत्याशियों के चयन की केंद्रीयकृत प्रक्रिया से अक्सर खेल बिगड़ता है जिससे बड़ी संख्या में दलबदल होता है. लगता है कि पार्टी इसको गंभीरता से ले रही है क्योंकि नवनिर्वाचित कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खडग़े का पहला एजेंडा उम्मीदवारों की सूची को अंतिम रूप देना है. उन्हें शंकरसिंह वाघेला जैसे पुराने साथियों पर भी फैसला लेना होगा, जो कांग्रेस में लौटना चाहते हैं.
कांग्रेस केंद्र और राज्य में भाजपा सरकारों के होने से बेलगाम महंगाई, बेरोजगारी और भ्रष्टाचार के इर्द-गिर्द अपना चुनावी अभियान बुन रही है और ''राष्ट्र की संपत्ति की नीलामी करके अडानी-अंबानी'' का खजाना भरने जैसी बातें भी जोर-शोर से उठा रही है. आम आदमी पार्टी की तरह इसने भी कई बड़े वादे किए हैं, जैसे कि तीन लाख रुपए तक के कृषि ऋण की माफी और अनुबंध पर काम करने वाले या सरकारी संस्थाओं और विभागों में आउटसोर्स कर्मचारियों के रूप में काम करने वाले लगभग 15 लाख युवाओं को सरकारी नौकरी का वादा. इसे गुजरात के अपने नेतृत्व के लिए सामुदायिक समर्थन का भी भरोसा है. प्रदेश अध्यक्ष जगदीश ठाकोर, राज्य के प्रमुख ओबीसी समुदाय ठाकोर से हैं, विधानसभा में विपक्ष के नेता सुखराम राठवा आदिवासी नेता हैं (राज्य में 15 प्रतिशत आदिवासी मतदाता हैं) और जिग्नेश मेवाणी सबसे प्रमुख दलित नेता के रूप में उभरे हैं. (हालांकि आलोचकों का कहना है कि उनके लिए अपनी वडगाम सीट बचाना भी चुनौती है.)
हार्दिक के कांग्रेस छोड़ने के बाद, विपक्ष के पूर्व नेता परेश धनानी उनका सबसे अच्छा पाटीदार दांव होंगे. हालांकि पूरे राज्य में भले ही न सही, पर सौराष्ट्र में लेउवा पटेलों के बीच उनका अच्छा खासा प्रभाव है. पूर्व सीएम चिमनभाई पटेल के बेटे और पार्टी के पुराने नेता सिद्धार्थ पटेल अभी भी सक्रिय हैं, लेकिन उनकी पूरे राज्य में पकड़ नहीं है. पाटीदार वोटों को पक्ष में करने के लिए कांग्रेस का सबसे अच्छा दांव असाधारण रूप से लोकप्रिय नरेश पटेल थे, जो इस साल की शुरुआत में पार्टी में लगभग शामिल हो ही गए थे. लेकिन भाजपा के साथ उनकी हालिया कथित नजदीकी कांग्रेस के लिए चिंता का कारण है.
हालांकि, पार्टी को मुस्लिम वोटों का भरोसा है, और बिलकिस बानो मामले में दोषियों की रिहाई पर वह पहले से ही शोर मचा रही है. कांग्रेस के एक सूत्र का कहना है, ''हम इसे किसी धर्म से जुड़े मामले के रूप में नहीं देख रहे हैं, बल्कि एक महिला की गरिमा और सुरक्षा के विषय के रूप में देख रहे हैं. भाजपा इसे सांप्रदायिक रंग देने की कोशिशें कर रही है और हमें इसके परिणाम भी झेलने पड़ सकते हैं, लेकिन हम इस बात को उठाने से कतराएंगे नहीं.'' हालांकि कांग्रेस की यह कोशिश महिला मतदाताओं को कुछ आकर्षित कर पाती है या नहीं यह तो बाद में पता चलेगा लेकिन फिलहाल एआइएमआइएम जैसे खिलाडिय़ों के उभरने से मुस्लिम बहुल सीटों पर कांग्रेस की संभावनाओं पर असर पडऩे की पूरी आशंका है, खासकर उन सीटों पर जहां जीत का अंतर कम था.
हर पार्टी के प्रचारित बयानों और वादों से परे, इस तरह की जमीनी स्थिति अंतत: गुजरात विधानसभा चुनाव के परिणाम को निर्धारित करेगी. 1990 के बाद पहली बार, जब जनता दल कांग्रेस और भाजपा के खिलाफ खड़ा हुआ था, राज्य में एक गंभीर त्रिकोणीय मुकाबला देखने को मिलेगा. भाजपा 1998 से द्विध्रुवीय मुकाबले में विजेता रही है. क्या तीसरा खिलाड़ी उसका विजय रथ रोक देगा या फिर इससे भगवा पार्टी के लिए सत्ता में वापसी और आसान हो जाएगी? इस सवाल का जवाब जानने की बेताबी तो तीनों दलों में एक जैसी रहेगी.
चुनावी मुद्दे
बेरोजगारी: आप और कांग्रेस ने गुजरात में एक लाख सरकारी नौकरियों का वादा किया है. आप ने गुजरात के मूल निवासियों के लिए निजी नौकरियों में 80 प्रतिशत आरक्षण का वादा भी किया है.
महंगाई: आप और कांग्रेस दोनों ही बढ़ती महंगाई पर भाजपा को घेर रही हैं. भाजपा ने इसकी काट में उज्ज्वला योजना के लाभार्थियों के लिए दो मुफ्त एलपीजी सिलेंडर की घोषणा की है
रेवड़ियां: जैसे ही आप ने मुक्रत बिजली, शिक्षा और स्वास्थ्य सेवाएं देने के वादे किए, पीएम मोदी ने इस रेवड़ी संस्कृति पर एक राष्ट्रीय बहस छेड़ दी. लेकिन भाजपा ने भी अपना 'चुनावी बोनस' घोषित किया है. यही नहीं, कांग्रेस भी कृषि ऋण माफी का वादा कर रही है
पानी: गुजरात पानी की किल्लत वाला राज्य है, लेकिन नर्मदा बांध परियोजना से उसे राहत मिली है. बांध के स्तर को बढ़ाने की अनुमति नहीं देने के लिए भाजपा पूर्व की कांग्रेस सरकारों को बार-बार निशाने पर लेती रही है, और बड़े बांधों की विरोधी सामाजिक कार्यकर्ता मेधा पाटकर आप के साथ जुड़ी हुई थीं. लेकिन हाल ही में, भाजपा को पार तापी नर्मदा लिंक परियोजना को रद्द करना पड़ा, जब आदिवासियों ने इस डर से विरोध किया कि इसके कारण वे विस्थापित हो जाएंगे. परियोजना के जरिए पश्चिमी घाट के जल-अधिशेष क्षेत्रों से अतिरिक्त पानी गुजरात के सौराष्ट्र और कच्छ के पानी की तंगी वाले क्षेत्रों में भेजा जाना था
गुजराती अस्मिता: भाजपा गुजराती गौरव के नाम पर वोट मांगती है, जिसका अर्थ है मोदी के नेतृत्व वाली भाजपा को राज्य और केंद्र में सुचारू रूप से चलने का मौका देते जाना. मोदी इस आख्यान के शुभंकर हैं, जो विपक्षी दलों को भी बैकफुट पर ला देते हैं
हिंदू राष्ट्रवाद: मोदी के नेतृत्व वाली भाजपा को हमेशा से हिंदुओं के रक्षक के रूप में पेश किया जाता रहा है. वास्तव में, गुजरात ने इस आख्यान का पहला प्रयोग देखा. गुजरात दंगों के दोषियों की हालिया रिहाई इस आख्यान का एक अन्य चरम विस्तार है. यह इतना मजबूत है कि आप ने भी इस कदम की आलोचना से परहेज किया
जिनके वोट मायने रखते हैं
जिन समुदायों के पास चुनावों के नतीजे बदलने की ताकत है
पाटीदार: इनके करीब 18-19 प्रतिशत वोट हैं और 40 सीटों पर प्रभाव रखते हैं. मोटे तौर पर एक कृषक समुदाय, पाटीदारों की उपस्थिति शहरी मध्य वर्ग और शक्तिशाली अप्रवासी गुजरातियों के बीच भी है. हालांकि, वे किसी एक दल को एकमुश्त वोट नहीं करते हैं. 2017 के पाटीदार आंदोलन का खामियाजा भाजपा को भुगतना पड़ा, लेकिन उस आंदोलन के मुख्य चेहरा रहे हार्दिक पटेल अब भाजपा के साथ हैं. सीएम भूपेंद्रभाई पटेल भी पाटीदार हैं. आप के राज्य संयोजक गोपाल इटालिया 2017 के पाटीदार आंदोलन में सक्रिय रूप से शामिल थे.
ओबीसी: 140 से अधिक समुदायों को मिलाकर, गुजरात की आबादी का 52 प्रतिशत ओबीसी हैं. कोली और ठाकोर दो प्रमुख समुदाय हैं जो क्रमश: सौराष्ट्र और उत्तरी गुजरात में सीटों को प्रभावित करते हैं. कांग्रेस अध्यक्ष जगदीश ठाकोर और आप महासचिव इसुदान गढ़वी ओबीसी हैं. भाजपा को ओबीसी के एक वर्ग के बीच असंतोष का सामना करना पड़ रहा है क्योंकि उनके दो नेताओं—कांग्रेस छोड़कर भाजपा में आए कुंवरजी बावलिया और जवाहर चावड़ा—को मंत्री बनाया गया था लेकिन पिछले साल उन्हें मंत्रिमंडल से बाहर कर दिया गया था.
दलित: इनकी आबादी लगभग 8 प्रतिशत हैं; 13 सीटें एससी के लिए आरक्षित हैं और वे अन्य 12-15 सीटों पर परिणाम को प्रभावित कर सकते हैं. कांग्रेस के प्रभावशाली दलित नेता प्रवीण मारू के 2020 में भाजपा में चले जाने के बाद अब वह जिग्नेश मेवाणी पर दांव लगा रही है. आप आंबेडकर का नाम लेकर दलित मतदाताओं से अपील कर रही है.
मुसलमान: राज्य की आबादी में लगभग 9-10 प्रतिशत का हिस्सा रखने वाले मुस्लिम वोट 35-38 सीटों को प्रभावित कर सकते हैं, लेकिन अभी तक कांग्रेस और निर्दलीय उम्मीदवारों के बीच बंटे हुए हैं. इस साल भाजपा भी पसमांदा मुसलमानों तक पहुंची है और इसके कारण कांग्रेस को कुछ परेशानी होने की संभावना है. एआइएमआइएम अब मुस्लिम बहुल दो सीटों पर जीत की प्रबल दावेदार है जो फिलहाल कांग्रेस के पास हैं. वह अन्य सीटों पर कांग्रेस के वोटों में सेंध लगा सकती है. आप मुसलमानों को लुभाने के लिए खुलकर कोई प्रयास नहीं कर रही है.
आदिवासी: सत्ताईस सीटें एसटी के लिए आरक्षित हैं, जो राज्य की आबादी का 15 प्रतिशत हिस्सा हैं. जहां एक आदिवासी द्रौपदी मुर्मू को राष्ट्रपति बनाना आदिवासी वोटों को लुभाने के लिए भाजपा के तुरुप के पत्तों में से एक होगा. वहीं पार्टी पार तापी नर्मदा लिंक परियोजना के खिलाफ आदिवासियों के आंदोलन के कारण बैकफुट पर है. यही कारण है कि भाजपा की गौरव यात्रा के पांच मार्गों में से दो मार्ग आदिवासी बहुल सीटों के लिए समर्पित थे. छोटू वसावा के नेतृत्व वाली भारतीय ट्राइबल पार्टी (बीटीपी) जिसके दो विधायक हैं, ने हाल ही में आप के साथ अपना कुछ समय पुराना गठबंधन समाप्त कर दिया और उसके कांग्रेस के साथ जाने की सबसे अधिक संभावना है.
बाहर रहने वालों के हाथ बागडोर
भाजपा, कांग्रेस और आप तीनों पार्टियों के चुनाव अभियान की बागडोर ऐसे लोगों के हाथ में है जो फिलहाल गुजरात में रहते नहीं हैं
नरेंद्र मोदी
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी न सिर्फ अपने गृह राज्य में बल्कि पूरे भारत में भाजपा का चेहरा हैं. वे चुनावों का सूक्ष्म प्रबंधन कर रहे हैं और सारी टीमें उन्हें ही रिपोर्ट कर रही हैं. हालांकि मुख्यमंत्री भूपेंद्रभाई पटेल सीएम पद का चेहरा बने रहेंगे
अरविंद केजरीवाल
राज्य स्तर पर कोई प्रमुख नेता न होने से दिल्ली के सीएम अरविंद केजरीवाल ही आप का चेहरा हैं और उन्हें डिप्टी सीएम मनीष सिसोदिया का सहयोग मिल रहा है. गुजरात में आप का नारा है 'एक मौको केजरीवाल ने' यानी एक मौका केजरीवाल को दें
अशोक गहलोत
राजस्थान के मुख्यमंत्री को 2017 में कांग्रेस के शानदार प्रदर्शन का श्रेय दिया जाता है. इस बार फिर वे चुनाव पर्यवेक्षक हैं. लेकिन मोदी और केजरीवाल की तरह वे चुनाव अभियान का चेहरा नहीं हैं और ये काम स्थानीय नेताओं और गांधी परिवार के हवाले है
प्रमुख खिलाड़ी
भूपेंद्रभाई पटेल, 60 वर्ष (भाजपा): अगर पार्टी जीतती है तो निवर्तमान सीएम को दूसरा कार्यकाल मिलने के आसार. पाटीदार, ऊर्जावान और अहमदाबाद का शहरी चेहरा. 2021 में पदभार संभालने के बाद से पीएमओ के साथ करीब से काम किया
सी.आर. पाटिल, 67 वर्ष (भाजपा): दक्षिण गुजरात के कद्दावर नेता प्रदेश भाजपा के अध्यक्ष और लोकसभा सांसद हैं. अगर पार्टी 125 से ज्यादा सीटें जीतती है तो सीएम पद के तगड़े दावेदार होंगे
इसुदान गढ़वी, 40 वर्ष (आप): पार्टी के राष्ट्रीय संयुक्त महासचिव पहले टीवी ऐंकर रह चुके हैं. भाषण कला के लिए प्रसिद्ध हैं और उन्हें जमीन से जुड़े नेता के रूप में पेश किया जा रहा है
गोपाल इटालिया, 33 वर्ष (आप): पार्टी के राज्य संयोजक 2017 के पाटीदार आंदोलन से चर्चा में आए. तेजतर्रार हैं लेकिन बेसब्र और बोलने पर नियंत्रण नहीं
जगदीश ठाकोर, 65 वर्ष (कांग्रेस): पार्टी के प्रदेश अध्यक्ष और पुराने योद्धा. जमीनी नेता हैं पर लोकप्रियता की कमी. ठाकोर सबसे बड़ा ओबीसी समुदाय है जिसका उत्तर गुजरात की 30 सीटों पर असर है
जिग्नेश मेवाणी, 41 वर्ष (कांग्रेस): दलित नेता को उत्तर गुजरात में वडगाम सीट पर कड़ी चुनौती का सामना करना पड़ेगा. पार्टी के लिए दलित और मुस्लिम वोट बटोरने की उम्मीद