पहचान और जमीन की खातिर पदयात्रा

महिला प्रदर्शनकारी इसी धरती की बेटी राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू तक पहुंचना चाहती हैं. प्रदर्शनकारियों को उम्मीद है कि वे उनकी बात सुनेंगी

आजीविका के लिए मार्च :भूमि अधिग्रहण के खिलाफ सुंदरगढ़ जाते आदिवासी
आजीविका के लिए मार्च :भूमि अधिग्रहण के खिलाफ सुंदरगढ़ जाते आदिवासी

न जोर-शोर से लगते नारे, न राजनैतिक प्रतिद्वंद्वियों पर आक्षेप करते बड़े-बड़े बैनर, न ही पदयात्रा कवर करने में जुटे मुख्यधारा के संचार माध्यम. फिर भी, ओरांव, किसान और खारिया समुदाय के लगभग 4,000 आदिवासियों, जिनमें ज्यादातर महिलाएं हैं, की यह पदयात्रा ओडिशा के सुंदरगढ़ जिले के शांत और सुंदर गांवों से गुजरी तो आसमान में धूल ही धूल छा गई. ये पदयात्री लगभग 80 किलोमीटर की पदयात्रा करके सुंदरगढ़ के जिलाधिकारी कार्यालय पहुंचे थे.

यह पदयात्रा सुंदरगढ़ जिले के कुतरा और राजगंगपुर विकास खंडों की पांच ग्राम पंचायतों में डालमिया सीमेंट भारत लिमिटेड (डीसीबीएल) की चूना पत्थर खनन इकाई के विस्तार के लिए 2,150 एकड़ कृषि भूमि के अधिग्रहण की ओडिशा सरकार की प्रस्तावित योजना के विरोध में सबसे हालिया गतिविधि थी. इसके कारण लोगों की रोजी-रोटी खत्म होने के खतरे के अलावा हजारों आदिवासियों के विस्थापन का खतरा भी मंडरा रहा है. इससे कुल मिलाकर 57 गांवों के 60,000 लोगों के प्रभावित होने का अंदेशा है. 

चार दिनों तक सड़कों पर गर्मी और गंदगी से जूझते रहे पदयात्री 48 घंटे तक जिला प्रशासनिक भवन के सामने धरने पर बैठे रहे. धरना उप-जिलाधिकारी के इस लिखित आश्वासन पर खत्म हुआ कि प्रशासन उनकी समस्या से भारत के राष्ट्रपति को अवगत कराएगा, उनके आरोपों की जांच करेगा और मामला सुलझने तक सभी अधिग्रहणों को रोक देगा. पदयात्रियों को विदा करते हुए प्रशासन ने उन्हें उनके घर पहुंचाने के लिए 25 ट्रकों की व्यवस्था की. जाहिर है कि प्रशासन जनविद्रोह का जोखिम नहीं उठाना चाहता था. डीसीबीएल के लिए भूमि अधिग्रहण के विरोध में अब तक 20 पंचायतें एकजुट हो चुकी हैं.

डीसीबीएल की लांजीबर्ना खानों के विस्तार का प्रस्ताव 2017 में स्वीकार किया गया था. समझा जाता है कि ओडिशा सीमेंट लिमिटेड और डीसीबीएल के संयुक्त संचालन में गुपचुप तरीके से 2018 से ही अधिग्रहण चल रहा था. मामले को निबटाने के लिए अक्तूबर 2018 में सार्वजनिक सुनवाई जैसा एक आयोजन हुआ था जो बेनतीजा रहा था. लगभग 25 लोगों के हस्ताक्षर भी लिए गए थे, लेकिन भूस्वामियों का आरोप है कि प्रशासन ने उन्हें धोखा दिया.

26 जनवरी, 2020 को, दोनों विकास खंडों के ग्रामीणों ने विरोध दर्ज कराने के लिए ग्राम सभाओं की बैठक बुलाकर धान, मसूर, मूंगफली और फूल जैसी फसलें पैदा करने वाली उपजाऊ, बहु-फसली भूमि का एक इंच भी न देने का संकल्प पारित करने का निर्णय लिया. कुकुड़ा पंचायत की सरपंच और 14 एकड़ जमीन की मालकिन लीला सुशीला टोप्पो से जब कहा गया कि सरकार मुआवजा देगी, तो वे आग बबूला हो गईं. उनका कहना था, ''पैसे में मेरी दिलचस्पी नहीं है. मैं पुश्तैनी जमीन नहीं दूंगी. यह मेरी पहचान है. और, सरकारी अधिसूचनाएं (फरवरी 2020 और फरवरी 2021 में) अवैध हैं. जब ग्रामसभा ने जमीनें देने से इनकार किया है, तो सरकार आदेश कैसे जारी कर सकती है?''

भूमि अधिग्रहण, पुनर्वास और पुनर्स्थापन में उचित मुआवजा और पारदर्शिता का अधिकार (एफसीटीएलएआरआर) अधिनियम, 2013 के अनुसार, ग्रामसभाओं से पारित प्रस्तावों के माध्यम से निजी प्रोजेक्ट के लिए 80 प्रतिशत और सार्वजनिक-निजी भागीदारी के प्रोजेक्ट के लिए 70 प्रतिशत भूमि मालिकों की सहमति लेना अनिवार्य है. भूमि अधिग्रहण प्राधिकरण के रूप में ओडिशा सरकार ने ग्रामसभाओं के सर्वसम्मत प्रस्तावों की अनदेखी की.

ग्रामसभा अध्यक्ष बिबोल टोप्पो और महिमा टोप्पो, अजित लाकड़ा और ललित लाकड़ा तथा अन्य सदस्य कहते हैं कि आंदोलन तब तक जारी रहेगा जब तक सरकार से अधिग्रहण की योजना छोड़ने का आश्वासन नहीं मिल जाता. इसमें शामिल महिला प्रदर्शनकारी इसी धरती की बेटी राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू तक पहुंचना चाहती हैं. प्रदर्शनकारियों को उम्मीद है कि वे उनकी बात सुनेंगी.

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