मुस्लिम समाज से बढ़ी उम्मीद
उग्र हिंदुत्व के कारण हिंदू समाज के फ्लोटिंग वोटर्स के एक वर्ग में भाजपा के प्रति नाराजगी बढ़ रही है. ये लोग आम तौर पर उदार हिंदुत्व की बात करते हैं

अखिल भारतीय इमाम संगठन के प्रमुख उमर अहमद इलियासी ने हाल ही में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सर संघचालक मोहन भागवत के बारे में कहा, ''मोहन भागवत राष्ट्रपिता और राष्ट्र ऋषि हैं. हमारा डीएनए एक ही है, केवल ईश्वर की पूजा करने का हमारा तरीका अलग है. हमें भारत और भारतीयता को मजबूत करना है.''
इलियासी ने ये विचार तब व्यक्त किए जब भागवत ने दिल्ली की एक मस्जिद का दौरा किया और वे एक मदरसे में भी गए. उन्होंने कुछ मुस्लिम बुद्धिजीवियों से करीब एक घंटे बातचीत की. इन मुलाकातों के बाद संघ प्रमुख ने कहा कि सभी हिंदुओं और मुसलमानों का डीएनए एक ही है. संघ प्रमुख ने इसके पहले भी हिंदू और मुस्लिम समाज के बीच आपसी समरसता की बात की है.
जुलाई की शुरुआत में भाजपा कार्यकारिणी में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भी कहा कि भाजपा का विस्तार हर वर्ग तक करते हुए पसमांदा मुसलमानों को अपने साथ जोड़ा जाना चाहिए. उन्होंने कहा कि यह वर्ग पिछड़ा हुआ है और इसे भी विकास की मुख्यधारा में लाया जाना चाहिए. उन्होंने इस वर्ग के लिए 'स्नेह यात्रा' निकालने का भी आह्वान किया. इसके बाद पार्टी स्तर पर पसमांदा मुसलमानों को जोड़ने की गतिविधियां भी हुईं. दिल्ली प्रदेश भाजपा अल्पसंख्यक मोर्चा ने 'पसमांदा मुस्लिम स्नेह मिलन और सम्मान समारोह' आयोजित किया.
भागवत से जो मुस्लिम बुद्धिजीवी मिलने गए थे, उनमें पूर्व मुख्य चुनाव आयुक्त एस.वाइ. कुरैशी भी थे. वे कहते हैं, ''मुस्लिम समाज में बने असुरक्षा के माहौल को लेकर हमने इस बातचीत की पहल की थी. इसमें मोहन भागवत ने साफ कहा कि हिंदुत्व एक समावेशी अवधारणा है और इसमें सभी समुदायों के लिए समान स्थान है.'' संघ प्रमुख की इस पहल को मोदी के उस 'आह्वान' से जोड़कर देखा जा रहा है. दरअसल, जिस तरह हिंदू समाज में सोशल इंजीनियरिंग करके भाजपा ने कुछ जातियों में अपनी मजबूत पकड़ बनाई, उसी तरह मुस्लिम समाज में जातिगत अंतर का फायदा उठाकर भाजपा इस समाज में सोशल इंजीनियरिंग करने की रणनीति पर काम कर रही है.
मोटे तौर पर देखें तो मुस्लिम समाज में अशराफ को अगड़ा माना जाता है. अनुमान के मुताबिक, कुल मुस्लिम आबादी में इनकी हिस्सेदारी करीब 15 फीसद है. राजनीति से लेकर हर प्रमुख क्षेत्र में इनका प्रतिनिधित्व अधिक है. बाकी 85 फीसद अजलाफ हैं और अब इन्हें ही आर्थिक—सामाजिक—राजनीतिक पिछड़ेपन की वजह से पसमांदा कहा जा रहा है. पसमांदा मुस्लिम मुखर होकर अब अपनी हिस्सेदारी मांग रहे हैं. भाजपा और संघ की नजर मुसलमानों की इसी आबादी पर है.
दरअसल, पहली बार मुस्लिम समाज में पिछड़ी जातियों की राजनीति की शुरुआत 1940 के दशक में देखी गई थी. उस समय मुस्लिम समाज की पिछड़ी जातियों के कुछ समूहों ने देश के विभाजन के साथ-साथ मुस्लिम लीग के मुद्दों का विरोध किया था. लेकिन आज पसमांदा राजनीति जिस स्वरूप में दिख रही है, उसकी शुरुआत 1990 के दशक में ऑल इंडिया पसमांदा मुस्लिम महाज के गठन के साथ हुई. इसकी शुरुआत अली अनवर ने की थी. अली अनवर ने पसमांदा के पिछड़ेपन का मुद्दा लगातार उठाया. वे बाद में जनता दल (यूनाइटेड) से राज्यसभा सांसद भी बने. बिहार में यह माना जाता है कि पसमांदा मुसलमानों के एक बड़े वर्ग ने नीतीश कुमार की पार्टी के पक्ष में मतदान किया. लेकिन इस तरह की कवायद का एक छोटा हिस्सा तक दूसरे राज्यों में नहीं आजमाया गया. इसकी वजह यह बताई जाती है कि सभी पार्टियों ने मुस्लिम समाज को एक धार्मिक इकाई के तौर पर देखा न कि इसे अलग-अलग जातियों में बंटे समुदाय के रूप में. इससे मुस्लिम समाज के विभिन्न वर्गों में व्याप्त आंतरिक भेदभाव को सियासी पार्टियों ने स्वीकार नहीं किया. फिर समाधान की कोई संभावना ही नहीं थी.
अब भाजपा और संघ इसी स्थिति का फायदा उठाने की कोशिश कर रहे हैं. भाजपा ने हिंदू समाज के अंदर सोशल इंजीनियरिंग करके अपने सामाजिक आधार को बढ़ाया है. अगड़ी जातियों की पार्टी माने जाने वाली भाजपा आज अन्य पिछड़ा वर्ग, दलितों और अनुसूचित जनजातियों में भी मजबूत पैठ बनाने में कामयाब हुई है. इसी तरह पसमांदा मुसलमानों को अपने साथ जोड़ने की सोशल इंजीनियरिंग करके भाजपा अपने वोटों में मुस्लिम वोटों की हिस्सेदारी बढ़ाने पर काम कर रही है.
सीएसडीएस में एसोसिएट प्रोफेसर हिलाल अहमद कहते हैं, ''जाति का सवाल हिंदू समाज में महत्वपूर्ण है और मुस्लिम समाज में भी. भाजपा खुद को और अधिक समावेशी बनाने की कोशिश कर रही और दिखा रही है कि वह समाज के हर वर्ग को साथ लेकर चलना चाहती है. नरेंद्र मोदी की पहचान सिर्फ हिंदुत्व के नेता की नहीं है. सही कानून व्यवस्था और विकास भी उनकी छवि से जुड़ा है. इसका फायदा उठाकर वे मुस्लिम समाज में अपनी पार्टी को ले जाना चाहते हैं.''
इस प्रक्रिया में वे मोदी की दो चुनौतियों का उल्लेख करते हैं, ''पहली चुनौती उनकी पार्टी, सहयोगी संगठनों और समर्थकों के कट्टर खेमे से है जो मुस्लिम समुदाय के खिलाफ और अधिक आक्रामक रुख की वकालत करता है. वहीं दूसरी चुनौती पार्टी, सहयोगी संगठनों और समर्थकों के उदार हिंदुत्व वाले खेमे से है. मुस्लिम समुदाय से मेलजोल बढ़ाने का काम इसी खेमे के दबाव में किया जा रहा है.''
भाजपा के एक राष्ट्रीय पदाधिकारी नाम नहीं छापने की शर्त पर इन कोशिशों के बारे में बताते हैं, ''आपको क्या लगता है कि हम चुनाव जीतने के लिए ऐसा कर रहे हैं? 2014 और 2019 का चुनाव हम पसमांदा मुसलमानों के समर्थन से नहीं जीते. 2024 भी हम इनके समर्थन के बिना निकाल लेंगे. इसलिए पसमांदा को लेकर पार्टी शॉर्ट टर्म में नहीं सोच रही. हम पसमांदा मुसलमानों को अपने साथ स्थायी तौर पर जोड़ना चाहते हैं. जिस तरह से हिंदू राजनीति में सवर्णों पर पिछड़ों की राजनीति भारी पड़ रही है, उसी तरह की स्थिति मुस्लिम राजनीति को लेकर पैदा करने की जरूरत है. जाहिर है, पार्टी को लॉंग टर्म में इसका चुनावी लाभ भी मिलेगा.''
पिछले 20 वर्षों से मुस्लिम राष्ट्रीय मंच के जरिये संघ मुस्लिम समाज को अपने साथ जोडऩे के लिए काम कर रहा है. सरसंघचालक रहे के.एस. सुदर्शन की पहल पर यह शुरुआत हुई थी. इस संगठन के संरक्षक इंद्रेश कुमार कहते हैं, ''सुदर्शन जी के पास बड़ी संख्या में मुस्लिम समाज के लोगों के पत्र आते थे. ये सभी संघ से सीधा संवाद करना चाहते थे, क्योंकि उनके मन में नेताओं के बयानों और इससे पैदा होने वाले मजहबी भेदभाव को लेकर भ्रम था. इसे दूर करने के लिए हमने सीधा संवाद शुरू किया. इस दौरान लाखों मुसलमानों से कश्मीर से लेकर कन्याकुमारी और गुजरात से लेकर असम तक संवाद हुआ है. 20-25 वर्षों से यह प्रवाह निरंतर बढ़ता आ रहा है. इसके कारण वोट बैंक की राजनीति करने वाले चिंतित हैं.''
भाजपा अल्पसंख्यक मोर्चा के अध्यक्ष जमाल सिद्दीकी इसी बात को आगे बढ़ाते हैं, ''मोदी सरकार की योजनाओं के लाभार्थियों में बड़ी संख्या गरीब मुसलमानों की है. ऐसे में स्वाभाविक है कि यह तबका भी भाजपा का साथ देगा.'' वहीं, कांग्रेस महासचिव तारिक अनवर संघ और भाजपा की इन कोशिशों के बारे में कहते हैं, ''मुस्लिम समाज से इनकी हमदर्दी दिखावे से अधिक कुछ नहीं है. मुस्लिम समाज को अपने साथ जोड़ने की बात कहकर ये दरअसल उन्हें अंदर से अलग—अलग वर्ग में तोड़ना चाहते हैं. भाजपा इसमें कामयाब नहीं होगी.'' ऐसी ही प्रतिक्रिया अली अनवर ने भी प्रधानमंत्री के 'स्नेह यात्रा' के प्रस्ताव पर दी. उन्होंने प्रधानमंत्री को पत्र लिखकर कहा, ''पसमांदा मुसलमानों को स्नेह नहीं बल्कि सम्मान चाहिए. पसमांदा मुसलमान कुछ विशेष नहीं चाहते, सरकारों ने जो भेदभाव उनके साथ किया है, बस वह खत्म कर दीजिए.''
क्या भाजपा को इन कोशिशों का चुनावी लाभ मिल सकता है? हिलाल अहमद कहते हैं, ''संभव है कि पसमांदा समाज में पार्टी अपनी पैठ थोड़ी और बढ़ा ले. पर भाजपा को सबसे बड़ा लाभ हो सकता है फ्लोटिंग वोटर्स को साथ बनाए रखने या लाने में. कोई भी पार्टी इन वोटर्स से ही चुनाव जीतती है. उग्र हिंदुत्व के कारण हिंदू समाज के फ्लोटिंग वोटर्स के एक वर्ग में भाजपा के प्रति नाराजगी बढ़ रही है. ये लोग आम तौर पर उदार हिंदुत्व की बात करते हैं. हिंदू-मुस्लिम समरसता की बात करके भाजपा इन फ्लोटिंग वोटर्स को साथ जोड़े रखने में कामयाब हो सकती है.''
भाजपा को कितने मुस्लिम वोट
सेंटर फॉर स्टडी ऑफ डेवलपिंग सोसाइटीज (सीएसडीएस) के अध्ययन के मुताबिक, 2014 के लोकसभा चुनाव के पहले भाजपा को कुल मुस्लिम वोटों का तकरीबन छह फीसद मिलता था
2014 के लोकसभा चुनाव में यह आंकड़ा बढ़कर 9 फीसद हो गया
2019 में भी भाजपा को तकरीबन 9 फीसद मुस्लिम वोट मिले
2022 में हुए यूपी विधानसभा चुनाव में भाजपा को पसमांदा मुसलमानों के करीब 8 फीसद वोट मिले
हालिया कोशिशों को देखते हुए भाजपा को यह उम्मीद है कि 2024 के लोकसभा चुनाव में मुस्लिम समाज में उसके वोटों की हिस्सेदारी और बढ़ेगी