प्रधान संपादक की कलम से

हैरत की बात है कि दस-बीस लाख रुपए के कर्ज की 2-4 किस्तें रुकते ही खरीदार की गर्दन पकड़ने आ पहुंचने वाले बैंक के बंदे बिल्डरों के उन प्रोजेक्ट्स की तहकीकात तक नहीं करते जिन्हें हजारों करोड़ रुपए फाइनेंस किए गए हैं

17 दिसंबर, 2014
17 दिसंबर, 2014

अरुण पुरी

साल भर पहले नोएडा के ट्विन टावर मामले की सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट के जस्टिस डी.वाइ. चंद्रचूड़ ने कितनी बेबाक टिप्पणी की थी: ''नोएडा (न्यू ओखला इंडस्ट्रियल डेवलपमेंट अथॉरिटी) एक भ्रष्ट निकाय है. इसकी आंख, कान, नाक और यहां तक कि चेहरे से भी भ्रष्टाचार टपकता है.'' इन टावरों के डेवलपर सुपरटेक के साथ अथॉरिटी के बाबुओं की मिलीभगत को शीर्ष अदालत ने दोटूक रेखांकित किया था. पिछले हफ्ते जब 103 मीटर तक की ऊंचाई वाले इन्हीं टावरों को ध्वस्त किया गया तो इसे भ्रष्टाचार पर एक बड़ी चोट के रूप में देखा गया. हालांकि इससे पहले मराडू (केरल) और जयपुर (राजस्थान) में अवैध बहुमंजिला इमारतें गिराई गई हैं लेकिन सामाजिक-प्रशासनिक-राजनैतिक हलकों में पैदा होने वाली धमक के लिहाज से यह दुर्लभ वाकया था.

और इन प्रतीक इमारतों को जमींदोज किए जाने तक के सफर की मुश्किलों ने यह भी साबित किया कि इस मुल्क में बिल्डर-बाबू-(पॉलिटिकल) बॉस की बेहद खतरनाक हो चुकी गिरोहबंदी से निबट पाना कितना दुश्वार है और महंगा भी. इस लड़ाई से जुड़े रहे लोगों की बातों पर भरोसा करें तो सुपरटेक से दस साल तक चले कानूनी संघर्ष पर 90 लाख रु. का खर्च आया जो कि खरीदारों ने ही दिया. असल में दिल्ली-एनसीआर और मुंबई-एमएमआर (मुंबई मेट्रोपोलिटन रीजन) देश के दो सबसे बड़े प्रॉपर्टी बाजार बन गए हैं. पूरे भारत के दो-तिहाई बिल्डिंग प्रोजेक्ट इन्हीं दो जगहों पर लॉन्च होते हैं. दोनों ही बाजारों में अथाह पैसा लगा हुआ है.

और जानकारों का मानना है कि मकानों की कीमत की 20 से 25 फीसद रकम रिश्वत में जाती है. सुप्रीम कोर्ट में आम्रपाली, यूनिटेक, जेपी, रहेजा, लोढ़ा, पार्श्वनाथ, बीपीटी, डीएलएफ सरीखे डेवलपर्स-बिल्डर्स के पीड़ित खरीदारों के केस लड़ रहे सुप्रीम कोर्ट के वकील एम.एल. लाहौटी इससे जुड़े सच का एक पहलू खोलते हैं. उनके मुताबिक, ''एनसीआर में जितनी धांधली है, उतनी कहीं नहीं. किसी भी प्रोजेक्ट को उठाकर देख लीजिए, उसमें बिल्डर-अफसर-नेता की मिलीभगत साफ दिख जाएगी. फर्क इतना ही है कि कोई डकैत है, कोई लुटेरा तो कोई उठाईगीर.'' ज्यादातर प्रोजेक्ट्स में फ्लैट तीन साल में देने का वादा किया जाता है लेकिन यहां हजारों केस ऐसे मिल जाएंगे जिनमें 8-12 साल की देरी चल रही है. आंकड़ों के मुताबिक, देश के सात प्रमुख शहरों में करीब 4.5 लाख फ्लैट अटके हुए हैं. इनमें से 1.65 लाख तो अकेले नोएडा और ग्रेटर नोएडा के हैं. और नोएडा तो जैसे रियल एस्टेट में घपलेबाजी का गढ़ बन चुका है.

आम्रपाली में 11,000 करोड़ रु. और यूनिटेक में करीब 4,000 करोड़ रु. का गबन बताया जा रहा है. एक फोरेंसिक ऑडिट में पता चला कि आम्रपाली ने खरीदारों से मिली रकम वित्तीय सेवा कंपनी जेपी मॉर्गन के जरिए विदेश में पहुंचा दी और देश में भी उससे प्रॉपर्टी खरीदीं. अब तो बिल्डरों ने पैसा दबाने का एक नया तरीका निकाल लिया है: खरीदारों से पैसे बटोरने के बाद दिवालिया होने की अपील कर देना. देश के दूसरे शहरों की कहानी भी ज्यादा अलग नहीं है. लखनऊ में नजूल की जमीन पर बने यजदान अपार्टमेंट को विस्फोट से उड़ाने की योजना बने पांच महीने हो गए हैं लेकिन अभी तक उस पर अमल नहीं हुआ. 12,000 से ज्यादा बिल्डिंग्स के अवैध निर्माण की शिकायत लखनऊ विकास प्राधिकरण को मिल चुकी है.

हैरत की बात है कि दस-बीस लाख रुपए के कर्ज की 2-4 किस्तें रुकते ही खरीदार की गर्दन पकड़ने आ पहुंचने वाले बैंक के बंदे बिल्डरों के उन प्रोजेक्ट्स की तहकीकात तक नहीं करते जिन्हें हजारों करोड़ रुपए फाइनेंस किए गए हैं. केस लड़ने में अगर 10 साल का समय और लाखों रुपए लगेंगे तो कितने खरीदार कोर्ट जा पाएंगे. इस गिरोहबंदी में शामिल बिल्डरों-बाबुओं को कहीं ज्यादा सख्त सजा की दरकार है. बिल्डर के तो आगे के किसी भी प्रोजेक्ट पर पूरी तरह से पाबंदी लगा दी जानी चाहिए. बाबुओं के मामले में निलंबन और बरखास्तगी बिल्कुल नाकाफी है. पूरे मुकदमे के दौरान उन्हें जेल की सलाखों के पीछे रखा जाना चाहिए. इसके अलावा ऐसी कुछ इमारतों के इस्तेमाल और अवैध हिस्से को आंशिक रूप से ध्वस्त करने के विकल्प भी टटोले जाने चाहिए. भारत में शहरी नियोजन को अब नए नजरिए से देखने की जरूरत है.

इस हफ्ते की आवरण कथा बाबू-बिल्डर गठजोड़: भ्रष्टाचार का गुबार असिस्टेंट एडिटर मनीष दीक्षित ने लिखी-बुनी है, जिसमें वे इस गिरोहबंदी की कुछ परतें उघाड़ते हैं. इसके अलावा इस हफ्ते की एक दूसरी बड़ी स्टोरी ई-कचरे पर है. आपको कभी यह जानने की उत्सुकता हुई कि जब आप अपना मोबाइल फोन त्याग देते हैं तब उसका क्या होता है? उनकी तादाद इतनी ज्यादा है कि इसे फौरन एक जरूरी सवाल बना देती है. भारत में इस वक्त एक अरब से ज्यादा उपकरण इस्तेमाल किए जा रहे हैं. एक मोबाइल अमूमन 3-5 साल चलता है, जिसका मतलब है कि कहीं न कहीं इनके कूड़े का अंबार लग रहा है. अगर फोन का औसत वजन 200 ग्राम मान लें, तो अगले दो से चार साल में दो लाख टन ई-कचरा पैदा होना पहले ही शुरू हो गया है. इसमें हर साल 30 करोड़ से ज्यादा मोबाइल फोन का उत्पादन और जोड़ लीजिए. सो ई-कचरा कई गुना बढ़ने जा रहा है, साथ ही उसके सुरक्षित निस्तारण की चुनौती भी.

फोन ही क्यों, रेफ्रिजरेटर, वॉशिंग मशीन, एयरकंडिशनर, कंप्यूटर, लैपटॉप, टीवी और कैमरे वगैरह भी ई-कचरा पैदा करते हैं. इन उत्पादों की बनावट कुछ इस तरह होती है: आधा लोहा और इस्पात, 21 फीसद प्लास्टिक और 13 फीसद तांबा, एल्यूमिनियम और कीमती धातुएं. इसके अलावा पारा, लीथियम, सीसा, जस्ता और कैडमियम सरीखे खतरनाक पदार्थ भी होते हैं, जिन्हें अगर सावधानी से संभाला न जाए तो गंभीर बीमारियां पैदा करते हैं. भारत आज ई-कचरे का दुनिया में तीसरा सबसे बड़ा उत्पादक देश है—32 लाख टन ई-कचरे के साथ यह केवल चीन (1 करोड़ टन) और अमेरिका (69 लाख टन) से ही पीछे है. ई-कचरे को नियम-कायदों के दायरे में लाने की संगठित कोशिशें सरकार के इरादों की गंभीरता दिखाती हैं.

भारत ने पिछले साल करीब 12 लाख टन ई-कचरा प्रोसेस किया. कुल मिलाकर प्रगति हुई है, पर अभी हमें बहुत लंबा रास्ता तय करना है, क्योंकि मैन्युफैक्चरर नित नए-नए मॉडल बनाते रहते हैं और ई-कचरे का पहाड़ ऊंचे से ऊंचा होता जाता है.

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