यहां एक नया मूर्ति विवाद
भाजपा विधायक की टिप्पणी के बाद राज्य में सियासी उबाल पहले ही आ चुका था. गणेश मूर्तियों के विसर्जन के विवाद ने इसे और बढ़ा दिया है

राजनीति के एक विडंबनापूर्ण मोड़ में, तेलंगाना एक देवता की मूर्तियों और एक मूर्तिविहीन आस्था दोनों को लेकर भावनाओं का उबाल देख रहा है. टी. राजा सिंह के मामले ने दूसरे हफ्ते तक माहौल को तनावपूर्ण बनाए रखा. भाजपा से निलंबित गोशामहल के विधायक के विवादास्पद वीडियो, जिसमें पैगंबर मोहम्मद को लेकर आपत्तिजनक टिप्पणी है, ने ऐसे प्रकरणों की सारी चीजें ला दीं: गिरफ्तारी, जमानत, विरोध, सार्वजनिक रूप से और सोशल मीडिया पर सिर काटने की मांग, फिर राजा के वकील की ओर से सुरक्षा की मांग और एक कानूनी ड्रामा जो सुप्रीम कोर्ट तक पहुंच गया है. दूसरी ओर, भाजपा ने 31 अगस्त को पर्यावरण के अनुकूल गणेश चतुर्थी मनाने के अनुरोध को सत्तारूढ़ तेलंगाना राष्ट्र समिति (टीआरएस) के साथ टकराव के एक अन्य अवसर में बदल दिया है.
पर्यावरण अनुकूल या ग्रीन गणेश चतुर्थी की कहानी दो चीजों के इर्द-गिर्द बुनी गई है. पहली कि पांच फीट से ज्यादा ऊंची करीब 1,00,000 बड़ी गणेश मूर्तियों में से कम से कम आधी में सिंथेटिक रंगों और प्लास्टर ऑफ पेरिस (पीओपी) की जगह मिट्टी का इस्तेमाल हुआ है. खैरताबाद में बनी सबसे ऊंची 50 फीट की गणेश मूर्ति जिसकी कीमत 1 करोड़ रुपए से अधिक है, मिट्टी से बनी है. तेलंगाना सरकार ने पर्यावरण के अनुकूल विकल्प की खोज में मिट्टी की 6,00,000 छोटी मूर्तियां तैयार करने और उन्हें मुफ्त वितरित करने के लिए 1.5 करोड़ रुपए से अधिक खर्च किए. गणेश उत्सव 9 सितंबर को मूर्तियों के विसर्जन के साथ खत्म होगा, जहां से योजना का दूसरा भाग आता है. 2021 के सुप्रीम कोर्ट के आदेश के अनुसार, शहर के बीचो-बीच स्थित ऐतिहासिक 5.7 वर्ग किमी में फैली झील हुसैन सागर में पीओपी की मूर्तियों का विसर्जन, इस साल से प्रतिबंधित है.
सियासी विवाद भी इसी के इर्द-गिर्द घूम रहा है. मूर्तियों के निर्माण में पीओपी और सिंथेटिक सामग्री के उपयोग पर अभी कोई प्रतिबंध नहीं है. लेकिन टीआरएस सरकार को यह बात परेशान कर रही है कि पंडालों की देखरेख करने वाली भाग्यनगर गणेश उत्सव समिति (बीजीयूएस) हुसैन सागर में ही पीओपी की मूर्तियों के विसर्जन पर जोर दे रही है. बीजीयूएस में भाजपा का दबदबा है.
भाजपा इसे आस्था का विषय बताते हुए 16वीं शताब्दी की झील में मूर्तियों का सामूहिक विसर्जन चाहती है जैसा कि पिछले 43 वर्षों से होता आ रहा है. वहां 1,500 मूर्तियां पहली बार सामूहिक विसर्जन के लिए लाई गई थीं. ग्रेटर हैदराबाद नगर निगम (जीएचएमसी) ने इस साल अस्थायी तालाबों में पीओपी की मूर्तियों को विसर्जित करने के लिए 5 करोड़ रुपए से अधिक खर्च करते हुए विस्तृत वैकल्पिक व्यवस्था की है. मुंबई से लाए गए 24 फाइबरग्लास प्रीफैब्रिकेटेड तालाबों के अलावा, इसने शहर भर में 50 कृत्रिम तालाब बनाए हैं जहां छह फीट से लंबी मूर्तियों को विसर्जित किया जा सकता है. इससे विसर्जन स्थलों की संख्या पिछले वर्ष के 28 से बढ़कर 74 हो गई, और हुसैन सागर पर दबाव को कम करने के लिए पर्याप्त माना गया.
झील में विसर्जन पिछले साल से ही प्रतिबंधित होना था, पर उसे तब टाल दिया गया जब सुप्रीम कोर्ट ने जीएचएमसी की याचिका को स्वीकार कर लिया और तेलंगाना हाइकोर्ट के सितंबर 2021 के आदेश पर रोक लगाते हुए अधिकारियों को 'एक आखिरी मौका' दिया. मुख्य न्यायाधीश एन.वी. रमन्ना की अगुआई वाली तीन-न्यायाधीशों की पीठ ने राज्य सरकार के इस वचन के आधार पर यह आदेश पारित किया था कि 2022 से पीओपी की मूर्तियों का विसर्जन नहीं होगा. लेकिन बीजीयूएस एक विशाल जुलूस निकालकर अधिकांश मूर्तियों को इसी में विसर्जित करने को इच्छुक है. इसकी दो मुख्य वजहें बताई जा रही हैं. पहला यह कि आंशिक रूप से महामारी के कारण पिछले दो साल तक यह आयोजन फीका रहा. दूसरी यह कि मुनुगोड़े में एक अहम उपचुनाव होना है जिससे पहले धार्मिक भावनाओं को हवा देने की कोशिश हो रही है.
इस तरह से झीलों और जल निकायों की रक्षा के पारिस्थितिकी से जुड़ा प्रश्न सियासी मुद्दे में बदल गया है. टीआरएस इस बात से आशंकित है कि भाजपा इस मौके का इस्तेमाल सांप्रदायिक भावनाओं को भड़काने के लिए कर रही है. पुलिस ने पंडाल आयोजकों से कहा है कि वे यह बताएं कि वे पीओपी की मूर्तियां स्थापित कर रहे हैं या मिट्टी की मूर्तियां ताकि उनके अनुसार विसर्जन के स्थान आवंटित किए जाएं. उम्मीद है, कि सियासी दल इस सामूहिक अनुष्ठान में एक अहम और पारिस्थितिक अनुकूल बदलाव लाने के इस प्रयास के बीच शहर को उबलने नहीं देंगे.