पकी उम्र की पनडुब्बियां

भारतीय नौसेना की पुरानी पड़ चुकी पनडुब्बियों के बेड़े को दशक भर में पाकिस्तान तक के खिलाफ नुक्सान उठाना पड़ सकता है. सरकार को पानी के भीतर की अपनी युद्धक क्षमताओं पर नए सिरे से विचार करने की जरूरत

गौरवशाली विदाई : रूसी मूल की पनडुब्बी आइएनएस सिंधुध्वज को 35 सालों की सेवा के बाद हाल ही में बेड़े से हटाया गया है
गौरवशाली विदाई : रूसी मूल की पनडुब्बी आइएनएस सिंधुध्वज को 35 सालों की सेवा के बाद हाल ही में बेड़े से हटाया गया है

प्रदीप आर. सागर

यह 1973 की गर्मियों की बात है. वाइस एडमिरल अरुण कुमार सिंह (सेवानिवृत्त), जो उस वक्त युवा लेफ्टिनेंट थे, फॉक्सत्रॉट वर्ग की पनडुब्बी आइएनएस वेला पर तैनात होने वाले क्रू का हिस्सा थे. उस वक्त मॉस्को में भारत के राजदूत के.एस. शेल्वंकर की स्कॉटिश पत्नी मैरी शेल्वंकर ने 31 अगस्त को तब सोवियत संघ के अंग लातविया की राजधानी रिगा में कमिशन का अनुष्ठान पूरा किया था. यह दिन इसलिए अहम हो गया क्योंकि इसके साथ ही भारत ने पनडुब्बियों की क्षमता में कट्टर दुश्मन पाकिस्तान की नौसेना को पीछे छोड़ दिया था. बाल्टिक सागर में परीक्षणों के बाद आइएनएस वेला भारत की जलयात्रा पर निकली. मगर तब तक मिस्र और इज्राएल के बीच यौम किप्पुर युद्ध शुरू हो गया. लिहाजा स्वेज नहर के रास्ते आने के बजाए क्रू को दक्षिण अफ्रीका होते हुए आना पड़ा—45 दिनों की यात्रा 87 दिन लंबी हो गई.

1965 की जंग में पाकिस्तान के पास एक पनडुब्बी पीएनएस गाजी थी, जबकि भारत के पास एक भी नहीं थी. 1971 की लड़ाई आते-आते भारत और पाकिस्तान दोनों के पास चार-चार पनडुब्बियां थीं. 1973 तक भारत रूस से चार और पनडुब्बियां हासिल करके पाकिस्तान से आगे निकल गया. मगर अब करीब पांच दशक बाद अंतर्जलीय यानी पानी के भीतर की युद्धक क्षमताओं में भारत की बढ़त खत्म हो सकती है क्योंकि 2030 तक पाकिस्तान के पास भारत के मुकाबले ज्यादा जवान और बेहतर पनडुब्बियां हो सकती हैं. दरअसल, हमारे बेड़े का काफी कुछ हिस्सा आखिरी सांसें गिन रहा है और ऐसे में तब तक पाकिस्तान के पास समुद्र में ज्यादा पनडुब्बियां हो सकती हैं. पाकिस्तान के पास तीन अगोस्टा 90-बी पनडुब्बियां हैं, जो अब चालू हालत में हैं, और उसने युआन वर्ग (टाइप 039-ए) की पारंपरिक एयर-इंडिपेंडेंट प्रोपल्शन (एआइपी)-सक्षम आठ पनडुब्बियों के लिए चीन के साथ 5 अरब डॉलर का करार (2015 में) किया है, जिसकी पहली पनडुब्बी उसे 2023 में मिलेगी.

भारतीय नौसेना के पास 1980 के दशक में 21 पनडुब्बियों का फुफकारता बेड़ा था, जो अब घटते-घटते 16 पर आ गया है. इनमें 15 पारंपरिक डीजल-इलेक्ट्रिक पनडुब्बियां (7 किलो वर्ग, 4 एचडीडब्ल्यू (जर्मन), 4 स्कॉर्पियो वर्ग) और एक परमाणु शक्ति संचालित एसएसबीए (बैलिस्टिक मिसाइल सबमरीन) आइएनएस अरिहंत हैं. बुरी खबर यह है कि इन पुरानी नावों में से कम से कम आधी में प्रौढ़ उम्र के सुधार चल रहे हैं. इसका मतलब है कि भारत के पास किसी भी वक्त युद्ध के लिए तैयार महज सात पनडुब्बियां हैं.

2008 में रूस से लीज पर ली गई परमाणु शक्ति संचालित हमलावर पनडुब्बी आइएनएस चक्र (जो पिछले साल लौटा दी गई) को भी कमान कर चुके वाइस एडमिरल अरुण कुमार सिंह कहते हैं, ''हालांकि भारत के लिए सबसे बड़ा खतरा चीन है, पर पाकिस्तान सरीखी छोटी-सी नौसेना भी जल्द ही हमसे आगे निकल सकती है. हमारी अंतर्जलीय क्षमताएं दयनीय हैं.''

खतरे की घंटियां एक पखवाड़ा पहले 16 जुलाई को फिर बजने लगीं जब रूसी मूल की किलो वर्ग पनडुब्बी आइएनएस सिंधुध्वज को 35 साल की सेवा के बाद मुक्त कर दिया गया. स्कॉर्पियो वर्ग की चार नई पनडुब्बियों को छोड़कर इत्तफाकन भारत की सभी पनडुब्बियां तीन दशक पुरानी हैं. रूसी किलो वर्ग की चार मौजूदा पनडुब्बियों को अतिरिक्त सेवाकाल के लिए उन्नत बनाया जा रहा है, वहीं बाकी तीन इस दशक के आखिर तक अपना सेवाकाल पूरा करेंगी.

भारतीय पनडुब्बियों के बेड़े से 7,600 किमी लंबी तटरेखा की रक्षा करने और खुफिया जानकारियां जुटाने के लिए अदन की खाड़ी से मलक्का जलडमरूमध्य तक फैले प्रभाव क्षेत्रों की गश्त लगाने, पनडुब्बी विरोधी युद्ध, और सुरंग बिछाने का काम लिया जाता है. नौसेना विशेषज्ञ मानते हैं कि प्रौढ़ावस्था के सुधारों को अंजाम देकर नौसेना न्यूनतम अंतर्जलीय क्षमता कायम रखने की बेतहाशा कोशिश कर रही है. मगर उन्नत होने के बाद भी इन पनडुब्बियों को मौजूदा पीढ़ी की दुश्मन पनडुब्बी या पनडुब्बी विरोधी क्षमता का सामना करना होगा. भारत की मौजूदा चालू पनडुब्बियों में ज्यादातर 1970-1980 के दशकों में डिजाइन की गई थीं.

पनडुब्बियां समुद्री युद्ध के तीनों पहलुओं समुद्र पर नियंत्रण, दुश्मन को समुद्र से दूर करना और समुद्री शक्ति के प्रदर्शन—में अहम भूमिका अदा करती हैं. आदर्श तो यही होता कि नौसेना के पास अब तक कम से कम 24 पनडुब्बियां होतीं ताकि वह अपनी 30 साल की पनडुब्बी निर्माण योजना (करगिल टकराव के बाद 1999 में सुरक्षा पर कैबिनेट कमेटी में स्वीकृत) पूरा कर पाती. योजना 2012 तक 12 डीजल पनडुब्बियां और 2030 तक 12 और पनडुब्बियां शामिल करने की थी, पर बार-बार हुई देर ने नौसेना को योजना में फेरबदल के लिए मजबूर कर दिया. अब योजना का पूर्वानुमान 2030 तक 18 डीजल-चालित पनडुब्बियां और छह एसएसएन (परमाणु पनडुब्बियां) हासिल करने का है.

30 साल की इस योजना का उद्देश्य ऐसी पनडुब्बी निर्माण क्षमता विकसित करना है जो भारतीय नौसेना को पनडुब्बियां देती रहे. पुरानी सेवामुक्त पनडुब्बियों को बदलने के लिए भारतीय नौसेना के पास उनकी जगह किसी भी वक्त कम से 20 पनडुब्बियों का मजबूत बल होना (या उसे संचालित करना) चाहिए. इसलिए प्रोजेक्ट 75 और प्रोजेक्ट 75 (इंडिया) तैयार किए गए, जो साथ-साथ चलने थे और जिनमें से हरेक में छह पारंपरिक पनडुब्बियां तैयार की जानी थीं. दो स्थापित पनडुब्बी उत्पादन इकाइयां यह सुनिश्चित करतीं कि हर दूसरे साल एक पनडुब्बी कमिशन की जा सके. मगर यह हुआ नहीं.

2006 में फ्रांसीसी फर्म नेवल ग्रुप (पहले डीसीएनएस) और मझगांव डॉक लिमि. (एमडीएल) के बीच भारत में स्कॉर्पीन वर्ग की छह पनडुब्बियां बनाने के करार पर दस्तखत हुए. पहली पनडुब्बी की डिलिवरी 2012 में होनी थी, पर परियोजना में बार-बार देरी होती रही. अभी तक चार स्कॉर्पीन पनडुब्बियां सौंपी गई हैं और दो अभी सौंपी जानी हैं. अगले कार्यक्रम प्रोजेक्ट 75 (इंडिया) में 43,000 करोड़ रुपए की अनुमानित लागत से बेहतर सेंसरों और हथियारों और एआइपी के साथ देश में छह पारंपरिक पनडुब्बियां बनाई जानी थीं. एयर इंडिपेंडेंट प्रोपल्शन या एआइपी समुद्री प्रणोदक टेक्नोलॉजी है जिससे गैर-परमाणु पनडुब्बियां वायुमंडल की ऑक्सीजन के बगैर संचालित हो सकती हैं. इसकी बदौलत पनडुब्बियां ज्यादा लंबे वक्त पानी के भीतर रह सकती हैं. एआइपी से लैस पनडुब्बियों को अपनी बैटरियां चार्ज करने के लिए सतह पर नहीं आना पड़ता (उन्हें एसएसपी के रूप में वर्गीकृत किया जाता है, जबकि अन्य डीजल हमलावर पनडुब्बियां एसएसके के तौर पर जानी जाती हैं). हालांकि यह कार्यक्रम बहुत पहले नवंबर 2007 में शुरू हुआ था, पर अब भी अंतिम पड़ाव के नजदीक नहीं है.

एमओडी की रक्षा अधिग्रहण परिषद (डीएसी) ने 2020 में प्रोजेक्ट 75 (इंडिया) के लिए भारतीय साझेदारों के तौर पर एडीएल और लार्सन ऐंड टूब्रो (एलऐंडटी) को शॉर्टलिस्ट किया. उन्हें दुनिया भर के छह पनडुब्बी शिपबिल्डरों के साथ मिलकर काम करना था. पांच विदेशी ओईएम (मूल उपकरण निर्माता) डेवू शिपबिल्डिंग ऐंड मरीन इंजीनियरिंग (दक्षिण कोरिया), नेवल ग्रुप (फ्रांस), नवांतिया (स्पेन), रोजोबोरोनेक्सपोर्ट (रूस) और टीकेएमएस (जर्मनी) हैं. मगर नौसेना की तरफ से कुछ निश्चित खास चीजों की मांग के चलते कार्यक्रम मुश्किल में पड़ गया. इनमें दी जा रही पनडुब्बी में कार्यशील या प्रमाणित एआइपी मॉड्यूल लगे होने की मांग भी थी. इसके चलते केवल जर्मनी और दक्षिण कोरिया दौड़ में रह गए, क्योंकि किसी भी अन्य के पास अपने प्लेटफॉर्म पर प्रमाणित एआइपी नहीं थी. खुद अपनी योजना के जाल में घिरी नौसेना ने अब मंत्रालय से विशिष्ट ब्योरों में ढील देने के साथ शॉर्टलिस्ट किए गए शिपयार्डों के लिए आरएफपी (प्रस्ताव के अनुरोध) का जवाब देने की समय सीमा बढ़ाने को कहा. समय सीमा 30 जून थी, पर अब उसे और छह महीने बढ़ा दिया गया है.

पूर्व पनडुब्बी चालक और भारतीय मैरिटाइम फाउंडेशन के वाइस-प्रेसिडेंट कमोडोर अनिल जय सिंह मानते हैं कि भारतीय नौसेना जिस फ्यूल सेल एआइपी की तलाश में हैं, वह किसी भी पारंपरिक पनडुब्बी के लिए बेहद जरूरी है. संयोगवश नौसेना की नई स्कॉर्पीन वर्ग की पनडुब्बियां एआइपी से लैस नहीं हैं. कमोडोर जय सिंह कहते हैं, ''अगर यह कार्यक्रम पूरा हो भी जाता है (अगर एमओडी एआइपी के मसले का हल निकाल लेता है), तो यह करार पर दस्तखत से कम से कम 2-3 साल पहले होना होगा. फिर पहली पनडुब्बी कमीशन होने में कम से कम 7-8 साल लगेंगे. लगता है, प्रोजेक्ट 75(आइ) के तहत पहली पनडुब्बी 2030 के दशक के मध्य तक ही आ सकेगी. नौसेना के सामने अब सबसे बड़ी चुनौती तब तक जिंदा रहना है क्योंकि उसकी ज्यादातर पनडुब्बियां तीन दशक पुरानी हैं और उनका सेवाकाल बीत चुका है.''

भारत के नजदीकी पास-पड़ोस के घटनाक्रमों को देखते हुए विश्लेषकों का कहना है कि सरकार को पनडुब्बी निर्माण की दिशा में आगे बढ़कर काम करने का नजरिया अपनाना होगा. पाकिस्तानी नौसेना को उसकी सभी आठ चीन निर्मित पनडुब्बियां अगले 8-10 साल में मिलने की संभावना है, जिससे वह समुद्र में भारतीय नौसेना को रोकने की क्षमता के लिहाज से बढ़त पा जाएगा.

दूसरी तरफ चीन है जो हर साल अपनी नौसेना में विशाल समुद्री क्षमता के 20-25 भीमकाय जहाज बढ़ाएगा, जिनमें चार पारंपरिक और दो परमाणु शक्ति संचालित पनडुब्बियां होंगी. चीन की पीएलए-एन (पीपल्स लिबरेशन आर्मी नेवी) के पास फिलहाल 59 चालू पनडुब्बियां हैं. 2030 तक उसकी नौसेना के पास करीब 450 जहाज आ जाएंगे.

पीएलए-एन के विस्तार को दूसरे विश्व युद्ध के बाद दुनिया की सबसे बड़ी शांतिकालीन बढ़ोतरी बताते हुए एक नौसैन्य अधिकारी कहते हैं, ''पर्याप्त संख्या के चलते चीनी हिंद महासागर में निश्चित तौर पर कम से कम 30 युद्धपोत भेजेंगे, जिनमें पनडुब्बियां और विमान वाहक पोत भी होंगे. हमें अब से अगले 15 साल के हिंद महासागर क्षेत्र (आइओआर) की परिकल्पना करनी होगी.'' वे यह भी कहते हैं कि चीन समुद्री डाकू विरोधी अभियानों के बहाने अपनी पारंपरिक और परमाणु पनडुब्बियां आइओआर में तैनात कर देता है.

जहां तक हमारे बुढ़ाते बेड़े की बात है, कमोडोर जय सिंह कहते हैं कि जब पनडुब्बी 25 साल से ज्यादा पुरानी हो जाती है, तो उसकी समुद्री योग्यता की जांच के लिए समय-समय पर सर्वे करने होते हैं, जिनमें टूट-फूट और नुक्सान का पता लगाया जाता है. वे कहते हैं, ''हम विकट स्थिति में हैं. मुझे नहीं लगता कि हमारी उन्नत बनाई गई पनडुब्बियां उन नई पनडुब्बियों (चीनी और पाकिस्तानी) से लोहा ले पाएंगी जो जल्द हिंद महासागर में उतरने जा रही हैं. उनके उपकरण और दूसरे पुर्जों की सीमाएं होंगी.''

एक नौसेना अधिकारी कहते हैं कि हालांकि चीन का मुख्य तटीय भूभाग हिंद महासागर से कुछ हजार मील दूर है, पर फिलहाल उसकी मुख्य ताकत उसके एसएसएन हैं, क्योंकि वे चीन से सफर करते हुए हिंद महासागर में आ सकते हैं और यहां लगातार काम करते रह सकते हैं. वे कहते हैं, ''चीन को छह परमाणु पनडुब्बियां मिल गई हैं और वह और ज्यादा का निर्माण कर रहा है, इसलिए अगले कुछ सालों में ये नावें हिंद महासागर में स्थाई ठिकाना बना सकती हैं.''

इसके अलावा ज्यों ही चीन के पास चार विमानवाहक पोत होंगे, एक विमानवाहक युद्धपोत हिंद महासागर में तैनात होगा, क्योंकि चीनी तटरेखा की रक्षा के लिए उन्हें चार विमानवाहकों की जरूरत नहीं है. चीन वैश्विक दबदबे और महाशक्ति के दर्जे का तलबगार है और इसके लिए उसे आइओआर में अपनी आवाजाही स्थापित करने की जरूरत है. ऐसे में भारतीय नौसेना ही अकेली ताकत है जिसके पास चीन की बढ़ती आक्रामकता को रोकने की क्षमता है.

आइओआर के लिए चीन के पास लंबे वक्त की परिकल्पना और दूरदृष्टि है. ढाका को दो पनडुब्बियां देने के बदले वह बांग्लादेश में पनडुब्बी अड्डा स्थापित कर चुका है. उसने म्यांमार की नौसेना को भी एक पुरानी पनडुब्बी दी है. इसके साथ बंगाल की खाड़ी में चीन को पनडुब्बी अड्डा मिल गया है. जहां तक अरब सागर की बात है, पाकिस्तान के साथ आठ पनडुब्बियों के सौदे के बूते चीन इस इलाके में काम कर सकता है.

विशेषज्ञ मानते हैं कि छोटी-सी तटरेखा होने की वजह से पाकिस्तान को 11 पनडुब्बियों की जरूरत नहीं है, पर इनका इस्तेमाल चीन भारत पर दबाव डालने के लिए करेगा. कमोडोर जय सिंह कहते हैं, ''अगर चीन भारतीय नौसेना पर लगाम लगाना चाहे, तो इसके लिए उसकी अपनी क्षमताएं ही काफी हैं. पाकिस्तान के साथ मिलीभगत की बदौलत वह भारतीय नौसेना पर किसी भी वक्त समुद्र में और ज्यादा दबाव डाल सकता है. भारतीय नौसेना काफी तेजी से क्षमता का निर्माण नहीं करती तो आइओआर में सबसे ताकतवर नौसेना होने का तमगा खो सकती है.'' इससे पहले कि देश अपने को महासागरीय मझधार से घिरा पाए, भारतीय योजनाकारों को हमारी अंतर्जलीय क्षमताओं के निर्माण के लिए तेजी से फैसला लेना होगा. 

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