साइकिल की मुश्किल होती राह
रामपुर और आजमगढ़ लोकसभा उपचुनाव हारने के बाद सपा के सहयोगी दल अखिलेश यादव की कार्यशैली पर सवाल खड़े कर रहे हैं

समाजवादी पार्टी (सपा) अपने दो सबसे मजबूत गढ़ आजमगढ़ और रामपुर के लोकसभा उपचुनाव में भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) को पटखनी देकर उत्तर प्रदेश के विधान सभा चुनाव में मिली हार के जख्म पर मरहम लगाने का सपना संजोए हुए थी. सपा के दो सबसे बड़े नेता, पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष अखिलेश यादव और कद्दावर मुस्लिम नेता आजम खान के इस्तीफे से खाली हुई आजमगढ़ और रामपुर लोकसभा सीट सत्तारूढ़ भाजपा के लिए अभेद्य किले के रूप में तब्दील होती जा रही थी. सपा के पक्ष में मजबूत स्थानीय जातीय समीकरणों ने इन दोनों लोकसभा सीटों पर अखिलेश यादव को आश्वस्त कर रखा था. इसी भरोसे के चलते 26 जून की सुबह शुरू हुई मतगणना में जैसे ही आजमगढ़ और रामपुर लोकसभा उपचुनाव में साइकिल ने तेजी पकड़ी अखिलेश यादव लखनऊ में अपने आवास से निकलकर विक्रमादित्य मार्ग पर पार्टी के प्रदेश कार्यालय में आकर बैठ गए.
आजमगढ़ से सपा उम्मीदवार धर्मेंद्र यादव और रामपुर से उम्मीदवार आसिम राजा ने जैसे की बढ़त बनाई, सपा के जोशीले कार्यकर्ता भी अपने राष्ट्रीय अध्यक्ष के साथ जीत का जश्न मनाने पार्टी दफ्तर पहुंचने लगे. मतगणना के शुरुआती चार घंटे तक सपा और भाजपा के बीच उतार-चढ़ाव भरे मुकाबले में जैसे ही भाजपा ने निर्णायक बढ़त बनाई, निराश अखिलेश यादव पार्टी कार्यालय से घर की ओर निकल पड़े. राष्ट्रीय अध्यक्ष के जाते ही सपा कार्यालय में सन्नाटा पसर गया. कुछ देर बाद जब नतीजों की घोषणा हुई तो सपा के दोनों राजनैतिक किले—आजमगढ़ और रामपुर लोकसभा सीट पर भाजपा का कब्जा हो गया था. जीत से उत्साहित मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ शाम चार बजे भाजपा कार्यालय पहुंचे. यहां कैबिनेट मंत्री और प्रदेश भाजपा अध्यक्ष स्वतंत्र देव सिंह ने योगी आदित्यनाथ को मिठाई खिलाकर जीत की बधाई दी.
इस प्रकार साल 2022 के विधानसभा चुनाव में अपने सहयोगियों के साथ 125 सीटें जीतने वाली सपा के पास केवल मैनपुरी, मुरादाबाद और संभल लोकसभा सीटें ही बची हैं. राजनैतिक विश्लेषक आजमगढ़ और रामपुर लोकसभा सीट पर मिली हार की वजह सपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष अखिलेश यादव की रणनीतिक कमजोरी को ठहरा रहे हैं. बनारस हिंदू विश्वविद्यालय में समाज शास्त्र विभाग के पूर्व प्रोफेसर अजित कुमार बताते हैं, ''विधानसभा चुनाव की तरह रामपुर और आजमगढ़ के लोकसभा उपचुनाव में भी सपा प्रमुख अखिलेश यादव अति आत्मविश्वास में रहे. जमीनी हकीकत को नजरअंदाज करते हुए उन्होंने चुनाव प्रचार में उतरना उचित नहीं समझा जबकि भाजपा की तरफ से मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ और मंत्रियों के साथ पार्टी के वरिष्ठ नेताओं की बड़ी टीम दोनों लोकसभा क्षेत्रों में सघन चुनाव प्रचार में जुटी थी.''
रामपुर और आजमगढ़ के नतीजों ने सपा के लिए दो साल बाद 2024 में होने जा रहे लोकसभा चुनाव के लिए बेहद कठिन चुनौती पेश कर दी है. सपा के लिए सबसे बड़ी चिंता परंपरागत मुस्लिम-यादव वोट बैंक को पार्टी से जोड़ कर रखने की है. उपचुनाव के नतीजों ने मुस्लिम वोटों पर सपा की पकड़ कमजोर होने की ओर इशारा किया है. 20 मई को सीतापुर जेल से बाहर आने के बाद अखिलेश यादव ने आजम खान को मनाने की भरसक कोशिश की थी. अखिलेश ने आजम के करीबी दो नेताओं को विधान परिषद का सदस्य निर्वाचित कराया. आजम खान ने आजमगढ़ में सपा के पक्ष में प्रचार भी किया. इसके बावजूद वे मुसलमानों का एकतरफा समर्थन सपा को न दिला पाए. आजमगढ़ में बसपा उम्मीदवार गुड्डू जमाली ने बड़ी संख्या में मुसलमानों का वोट लेकर धर्मेंद्र यादव की हार में भूमिका निभाई. वहीं दूसरी ओर, रामपुर में मुस्लिम बाहुल्य कई बूथों पर भाजपा को 2022 के विधानसभा चुनाव की तुलना में अधिक वोट मिले हैं. रामपुर शहर बगीमा एमना बूथ पर विधानसभा चुनाव में भाजपा को एक भी वोट नहीं मिला था वहीं उपचुनाव में उसे 53 वोट मिले हैं.
आजमगढ़ लोकसभा सीट पर दिनेश लाल यादव उर्फ निरहुआ को उम्मीदवार बनाने से पहले भाजपा ने जौनपुर के गिरीश यादव को योगी सरकार में मंत्री बनाया और पूर्व विधायक संगीता यादव को राज्यसभा भेजकर सपा के यादव वोट बैंक पर डोरे डालने शुरू कर दिए थे. अजित कुमार बताते हैं, ''साल 2022 के विधानसभा चुनाव से पहले यादव और मुस्लिम मतदाताओं को प्रदेश में सपा की सरकार बनने की उम्मीद थी. इसलिए विधानसभा चुनाव के दौरान इन मतदाताओं ने पूरी मजबूती के साथ सपा को समर्थन किया था. विधानसभा चुनाव की हार के बाद यादव और मुस्लिम मतदाताओं में अपनी राजनैतिक अकांक्षाओं को लेकर दुविधा शुरू हो गई है. इसका संकेत लोकसभा उपचुनाव ने दिया है.
अगर सपा ने अपनी रणनीति में आमूलचूल बदलाव नहीं किया तो साल 2024 के लोकसभा चुनाव तक पार्टी अपने परंपरागत वोट बैंक के एक बड़े हिस्से से हाथ धो बैठेगी.'' अब देखना है कि अखिलेश यादव लोकसभा उपचुनाव के नतीजों से क्या सबक ले पाते हैं. सपा प्रमुख अखिलेश यादव के सामने एक बड़ी चुनौती अपने सहयोगी दलों को साथ रखने की भी है. महान दल के अध्यक्ष केशव देव मौर्य पहले ही साइकिल का साथ छोड़ चुके हैं तो दूसरे सहयोगी दल सीधे अखिलेश यादव के नेतृत्व पर सवाल खड़े कर रहे हैं. सुहेलदेव भारतीय समाज पार्टी (सुभासपा) के अध्यक्ष ओम प्रकाश राजभर और जनवादी पार्टी के प्रमुख संजय चौहान अखिलेश यादव को एसी कमरों से निकल कर जनता के बीच जाकर मेहनत करने की नसीहत दे रहे हैं. अखिलेश के चाचा और प्रगतिशील समाजवादी पार्टी (लोहिया) के अध्यक्ष शिवपाल यादव भी अब सपा से इतर राह पकड़ चुके हैं. ऐसे में अखिलेश यादव के सामने प्रदेश की राजनीति में अलग-थलग पड़ने की आशंका मंडरा रही है.