मध्य प्रदेशः महिला वोटरों पर फोकस
एमपी में महिला एसएसजी की संख्या 3,57,499 है जो यहां के 51,527 में से 45,527 गांवों में फैले हैं

पहले बिहार में और अब उत्तर प्रदेश में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के दिलो-दिमाग से वे लोग नहीं जाते जिन्हें वे 'खामोश मतदाता' कहते हैं. ये दरअसल महिला मतदाता हैं जिन्हें केंद्र सरकार की कई योजनाओं का सीधा फायदा मिला और जिन्होंने भाजपा को वोट देकर अपना आभार भी जताया है. इस जनसांख्यिकी समूह की अहमियत को भलीभांति समझकर भाजपा अब उन्हें खुलकर रिझा रही है. महिला मतदाताओं को गोलबंद करने का इससे अच्छा तरीका क्या होगा कि राज्य प्रायोजित स्वयं-सहायता समूहों (एसएचजी) को लामबंद किया जाए, जिन्होंने गांव-देहात की महिलाओं को ताकतवर बनाने में सबसे अहम भूमिका अदा की.
यही वजह है कि भाजपा अध्यक्ष जे.पी. नड्डा ने अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस 8 मार्च को मध्य प्रदेश के देवास में लाल, नीली और गुलाबी साड़ियां पहनकर आई महिलाओं के विशाल जमावड़े को संबोधित किया. मौके को हाथ से न जाने देते हुए नड्डा ने केंद्र की महिला समर्थक योजनाएं गिनाईं और इन्हें जमीन पर उतारने के लिए मध्य प्रदेश सरकार की भूरि-भूरि सराहना की.
मध्य प्रदेश की 'दीदी ब्रिगेड' या महिला एसएचजी भाजपा के भरोसेमंद हैं. भारत में करीब 74 लाख एसएचजी हैं, जो करीब 8 करोड़ महिलाओं को एक मंच पर लाते हैं. हाल के सालों में मध्य प्रदेश के ग्रामीण इलाकों में पूर्णत: महिलाओं के एसएचजी की संख्या में बड़ा उछाल आया है. 2012 में जहां वे न के बराबर थे, आज करीब 3,57,499 एसएचजी हैं, जो राज्य के 51,527 में से 45,527 गांवों में फैले हैं. उनकी संख्या राज्य के करीब 40 लाख परिवारों की नुमाइंदगी करती है, जिसका अर्थ है कि वे राज्य की 8.7 करोड़ आबादी (प्रति परिवार औसतन पांच सदस्य मान लें तो) में से करीब 2 करोड़ आबादी पर प्रत्यक्ष और परोक्ष असर डालते हैं. इसीलिए भाजपा उन तक पहुंचने में जुटी है.
मध्य प्रदेश के सामाजिक संगठन विकास संवाद के सचिन जैन कहते हैं, ''एसएचजी के कार्यक्रम सरकार आयोजित करती है, पर मेहमान हमेशा भाजपा के पदाधिकारी होते हैं. एक बार जब पदाधिकारी और एसएचजी को सरकारी सहायता के बीच कड़ी जुड़ गई, तो लाभार्थियों के बीच उस पदाधिकारी की 'स्वीकार्यता' बढ़ जाती है. यह सब बहुत सोच-समझ कर किया गया है.'' यही नहीं, वोटों में प्रत्यक्ष नकद हस्तांतरण से बेहतर कुछ तब्दील नहीं हुआ. जैन कहते हैं, ''लाभार्थियों के हाथ में सीधे धन देना मतदान पर सड़क बनाने और कुएं खोदने से कहीं ज्यादा असर डालता है. रुपए-पैसे की आजादी मिलने पर अंतत: महिलाएं भी फैसले लेने की स्थिति में आ जाती हैं.''
राजनीतिक विश्लेषक गिरिजा शंकर को भी संदेह नहीं कि 2023 में राज्य के चुनाव के लिए भाजपा इसी मॉडल पर दांव लगा रही है. वे कहते हैं, ''भाजपा को यकीन है कि उसके लाभार्थी केंद्रित तरीके के अच्छे राजनैतिक फायदे मिले हैं. उत्तर प्रदेश के चुनाव से, जहां वोट बटोरने के लिए राशन बांटने का इस्तेमाल किया गया, यह यकीन और पुख्ता हुआ.'' वे यह भी कहते हैं कि इन योजनाओं का राजनैतिक फायदा उठाने के लिए बहुत कुछ इस पर निर्भर करता है कि ये फायदे चुस्ती से लोगों तक पहुंचे, जिसका दारोमदार शिवराज सिंह चौहान की सरकार पर है.
लाभार्थियों के हाथों में ज्यादा रकम देने की खातिर राज्य सरकार कई बड़ी सरकारी परियोजनाओं पर अमल का काम एसएचजी को सौंप रही है. मसलन, राज्य का पोषण कार्यक्रम, जिसके लिए साल में 800 करोड़ रुपए आवंटित हैं और जिसका प्रबंध राज्य के महिला और बाल विकास विभाग के हाथ में है, अब धीरे-धीरे एसएचजी को सौंपा जा रहा है. एसएचजी को गेहूं खरीद और राशन दुकानों के संचालन सरीखे आमदनी पैदा करने वाले क्षेत्रों में भी काम करने की इजाजत दी जा रही है. मध्य प्रदेश ग्रामीण आजीविका मिशन के सीईओ एल.एम. बेलवाल कहते हैं, ''टेक-होम राशन बनाने के लिए प्रत्येक 2,500 टन क्षमता के छह संयंत्र एसएचजी को दिए जा चुके हैं. फोकस अब उनकी उद्यमिता क्षमता के निर्माण पर है, क्योंकि वे भिन्न-भिन्न किस्म के उत्पाद बना रहे हैं लेकिन उन्हें मार्केटिंग में सहायता की जरूरत है.''
सरकार का दावा है कि वह एसएचजी को कर्ज की सुलभता में भी सुधार ला रही है. करीब 3,20,000 एसएचजी को 2,900 करोड़ रुपए के कर्ज बांटे जा चुके हैं. इन समूहों को रकम का आवंटन दूसरे तरीकों से किया गया है. मसलन, करीब 2,29,000 एसएचजी को 286 करोड़ रुपए 'रिवॉल्विंग फंड' में और करीब 1,06,000 समूहों को 834.42 करोड़ रुपए सामुदायिक निवेश के रूप में दिए गए. राज्य के मौजूदा बजट में भी एसएचजी को आवंटित रकम में भारी बढ़ोतरी की गई है. यह अब 600 करोड़ रुपए से बढ़ाकर 1,100 करोड़ रुपए कर दी गई है. सवाल यह है: क्या इस सारे निवेश की फसल 2023 में काटी जा सकेगी?