हिजाब विवादः इंसाफ का परदा

हिजाब का मामला अपनी विनम्र शुरुआत से लंबी दूरी तय करके वाकई इतनी सार्वभौम हदों को छूने की तरफ जाता है या नहीं, यह कानून के कुछ तकनीकी पहलुओं पर भी निर्भर करेगा

पहनावे का प्रश्न बेंगलूरू में कर्नाटक हाइकोर्ट के गेट के सामने से गुजरती हिजाब पहने युवतियां
पहनावे का प्रश्न बेंगलूरू में कर्नाटक हाइकोर्ट के गेट के सामने से गुजरती हिजाब पहने युवतियां

सुनील मेनन

कर्नाटक का हिजाब मामला राष्ट्रीय तवज्जो के और ऊंचे पायदान पर आ गया है, जो शायद होना ही था. उडुपि के कॉलेज में छात्राओं को कैंपस में इस्लामिक दुपट्टा पहनकर आने देने से इनकार करने पर शुरू हुए इस विवाद से उठे मुद्दों का पिटारा अब सुप्रीम कोर्ट की न्यायिक बुद्धिमता के अधीन होगा. कुछ अपीलें तो उसके सामने पहुंच गई हैं और कुछ और शायद आती होंगी. इनमें कर्नाटक हाई कोर्ट के 15 मार्च के उस फैसले को चुनौती दी गई है जिसने आम समझ में 'हिजाब पर पाबंदी' के रूप में जाने गए फरमान को कायम रखा है.

मुद्दा तय करते वक्त हाई कोर्ट की तीन जजों की पीठ ने इस प्रश्न को सबसे ज्यादा अहमियत देना चुना कि इस्लाम की परंपरा में हिजाब पहनना अनिवार्य है या नहीं. इसने एक व्यावहारिक सवाल को, ऐसे सवाल को जिसे कॉलेज के नियमों और व्यक्ति के अधिकारों के बीच टकराव के स्तर पर ही सख्ती से तय करके हल किया जा सकता था, ज्यादा बुनियादी और जोखिम भरे क्षेत्र के हवाले कर दिया. आखिर में अदालत ने फैसला दिया कि इस्लामिक सिद्धांत हिजाब पहनने का अनिवार्य आदेश नहीं देते.

फैसले ने यूनिफॉर्म के विचार को भी विशेष शक्ति दे दी, यह कहकर कि स्कूल और प्रि-यूनिवर्सिटी कॉलेज (पीयूसी, प्लस 2 के समकक्ष) ''अर्हताप्राप्त सार्वजनिक स्थल'' हैं जहां अनुशासन का विचार सर्वोपरि है और व्यक्तिगत पसंद से ऊपर होना ही चाहिए. कर्नाटक के इससे जुड़े 1983 के कानून में यूनिफॉर्म पहनने के लिए नहीं कहा गया था. विवाद के ऐन बीचोबीच, 5 फरवरी, 2022 को एक शासकीय आदेश (जी.ओ.) के जरिए अलग-अलग कॉलेजों की ओर से निर्धारित यूनिफॉर्म के रूप में कार्यपालिका के लिए एक कवच लाया गया. अदालत ने अंतत: उस जी.ओ. को भी वैध ठहरा दिया, यह कहकर कि यह समानता के सिद्धांत का उल्लंघन नहीं करता और न ही अपने स्वरूप में पक्षपाती है.

हिजाब विवादः इंसाफ का परदा

अपने वास्तविक दायरे तक सख्ती से परिसीमित यह फैसला केवल कर्नाटक के स्कूलों और पीयूसी पर लागू होता है. दफ्तरों, मॉल, सड़कों, किसी भी दूसरे सार्वजनिक स्थल या वास्तव में भारत में किसी भी अन्य जगह लागू नहीं होता. चूंकि यह सामान्य सिद्धांतों की स्थापना करता है, इसलिए इसकी धमक हर जगह सुनी जा सकती है. यही नहीं, इस मुद्दे में संवैधानिक अधिकारों की समूची शृंखला समाई है. अनुच्छेद 14, 15, 19(1), 25-28 को लीजिए, जो भारत के नागरिकों को समानता, अभेदभाव, अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और अंत:करण/धर्म के पालन की स्वतंत्रता की गारंटी देते हैं. इनमें आखिरी खास तौर पर अर्थपूर्ण है. उडुपि से जो शुरू हुआ, वह अंतत: उसिलमपट्टी से लेकर उत्तर दिनाजपुर तक हर जगह पहुंच सकता है. टिप्पणीकार अदालतों में अन्य धर्मों की प्रथाओं के खिलाफ हू-ब-हू ऐसे ही मामलों की ''संभाली न जा सकने वाली बाढ़'' की संभावना से इनकार नहीं करते. आखिरकार शरारत की गुंजाइश और भारत के विभिन्न सामाजिक और राजनैतिक हलकों में इसका छिटका हुआ प्रभाव मामूली नहीं है.

याचिकाकर्ताओं की पैरवी करने वाले सुप्रीम कोर्ट के वकील संजय हेगड़े को लगता है कि इस फैसले में 5 फरवरी के जी.ओ. के बुनियादी नुक्ते पर ही झोल है. वे सवाल करते हैं, ''प्रश्न यह है, यूनिफॉर्म निर्धारित करने का अधिकार कहां है? अगर यह मूल कानून में मौजूद नहीं है, तो क्या आप इसे नियम के जरिए ला सकते हैं? क्या कोई नियम मूलत: दी गई शक्ति से आगे जा सकता है?'' मगर जब अदालत ने एक बार उसका दायरा बढ़ा दिया तो अनिवार्यता का एक अहसास आ गया. सुप्रीम कोर्ट के वकील शाहरुख आलम कहते हैं, ''कानून के समाजशास्त्र में बहुतायत से लिखा गया है कि न्यायिक तर्क हमेशा संदर्भ से जुड़ा होता है. जजों का सोच-विचार अनिवार्यत: काल और स्थान से निकलकर आता है. यह उन वक्तों के बारे में भी सच है जो राजनैतिक तौर पर इतने बेचैन नहीं होते.'' जज मामले के बिल्कुल न्यूनतम तत्वों से आगे बढ़कर समाज में मौजूद गहनतर सर्वानुमति को प्रतिबिंबित करने की तरफ जाते हैं.

उधर मुस्लिम सिविल सोसायटी और टिप्पणीकारों के तबकों में मायूसी है. समुदाय में अलगाव की भावना की झलक देते हुए दिल्ली अल्पसंख्यक आयोग के पूर्व अध्यक्ष डॉ. जफरुल इस्लाम खान कहते हैं, ''फैसला निराशाजनक है. यह सही नहीं था कि जज धार्मिक मामले की व्याख्या करें. उन्हें मुद्दे की व्याख्या के लिए धार्मिक अध्येताओं को बुलाना चाहिए था.'' वे कहते हैं कि यह फैसला ''कट्टरता को न्यायिक स्वीकृति'' देने के जोखिम से भरा है.

हर कोई सहमत नहीं है. केरल के राज्यपाल आरिफ मोहम्मद खान, जो 1980 के दशक में शाह बानो मामले में कट्टरपंथियों का विरोध करने के लिए मशहूर हैं, फैसले का दोटूक समर्थन करते हैं. उन्होंने इंडिया टुडे टीवी से कहा, ''यहां सवाल पूरी तरह स्कूलों/कॉलेजों तक सीमित है. खुद आलोचक इसका दायरा बढ़ा रहे हैं... मानो भारत और कर्नाटक की सरकारें महिलाओं को अपनी ड्रेस चुनने के अधिकार से वंचित कर रही हों. उन्होंने तो तीन तलाक पर भी अनुच्छेद 25 के उल्लंघन का दावा किया था.'' कई सारे लोग बीच की स्थिति में हैं. ये वे लोग हैं जो खुद हिजाब के मामले में तो दुविधा में हैं, पर फिर भी उन्हें लगता है कि यह फैसला निजी और सामुदायिक पसंद के अनुल्लंघनीय दायरे का उल्लंघन करता है.

बहस से हटकर यह फैसला अगनिगत मुस्लिम लड़कियों की पढ़ाई को मुश्किल में डाल सकता है. लेखक-इतिहासकार राणा सफ्वी कहती हैं, ''बहुत-सी चर्चाएं चल रही हैं. कानून, संवैधानिक अधिकार, पितृसत्तात्मकता, वगैरह. मगर मुझे लड़कियों की चिंता है. मैंने उत्तर प्रदेश और दिल्ली में कई पहली पीढ़ी की छात्राएं देखी हैं, जिनके परिवार हिजाब की वजह से ही उन्हें स्कूल जाने देते हैं. आप पसंद करें या न करें, यह हकीकत है... और इसका असर असल जिंदगियों पर पड़ेगा. शिक्षा के अधिकार को चोट पहुंचेगी.'' कई लोग 'यूनिफॉर्म' और 'अनुशासन' के विचार को दी जा रही प्रमुखता को लेकर बेचैनी साझा करते हैं. आलम कहते हैं, ''आप इसे फूको के क्लासिकल शब्दों में पढ़ सकते हैं:

यह उस विचार का निर्माण है जो आदर्श नागरिक गढ़ता है, ऐसा नागरिक जो अनुशासित हो, एकसमान हो, घुल-मिल जाए और सवाल न पूछे. और संवैधानिक अदालत इस पर अपनी मुहर लगाती है, यह मेरे लिए गहरी परेशानी की बात है.'' यह वह मैदान भी है जहां से बात समान नागरिक संहिता की तरफ जा सकती है, जैसा कि फरवरी में भारतीय जनता पार्टी के राजनीतिकों की घोषणाओं में देखा गया. एक यथार्थवादी धरातल भी है. कुछ लोग मानते हैं कि सत्तारूढ़ प्रतिष्ठान व्यावहारिक तौर पर इस राह पर जाकर विवादों का पिटारा नहीं खोलना चाहेगा, जबकि बहस को जिंदा रखेगा. भारत का सामाजिक भूदृश्य बेइंतहाई पेचीदगियों से भरा है. यहां पूरा बुर्का पहने मुस्लिम औरतों से लेकर कृपाण धारी सिख और दिगंबर जैन साधु तथा निर्वस्त्र नागा साधुओं तक सब रहते हैं. यह अपवादों का समुच्चय है. इस पर एकरूपता का कानून बनाने की शुरुआत कोई कैसे करे? ये शाश्वत सवाल हैं.

हिजाब का मामला अपनी विनम्र शुरुआत से लंबी दूरी तय करके वाकई इतनी सार्वभौम हदों को छूने की तरफ जाता है या नहीं, यह कानून के कुछ तकनीकी पहलुओं पर भी निर्भर करेगा. खास तौर पर सुप्रीम कोर्ट के सामने कौन-सी याचिकाएं आती हैं, वे विशेष अवकाश याचिकाएं (एसएलपी) हैं या जन हित याचिकाएं (पीआइएल) और असल में कौन ये याचिकाएं दायर करता है. सबसे पहले शुरुआत करने वाली उडुपि कॉलेज की लड़की निबा नाज थी, जो मूल याचिकाकर्ताओं में भी नहीं थी. उसने इस आधार पर एसएलपी दायर की कि फैसले का सीधा असर उस पर पड़ता है, क्योंकि वह इसके न्यायिक क्षेत्राधिकार में आती है. (एसएलपी वैसे केवल मूल याचिकाकर्ता ही दाखिल कर सकता है.)

कुछ अन्य पीआइएल हैं. ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड भी पीआइएल दाखिल करने पर विचार कर रहा है. पीआइएल फैसले के दायरे को 'सामान्य' बना देगी. वह जिसे ठोस पहलुओं ('क्या उडुपि कॉलेज सही था?') के बजाय अमूर्त पहलू ('अनिवार्य प्रथा') माना जा रहा था, जो अन्य मामलों में लागू नहीं था, सार्वभौम संदर्भ अख्तियार कर लेता है. कानूनी बिरादरी को लगता है कि सुप्रीम कोर्ट शायद हड़बड़ी न करे. मामले की लिस्टिंग उसने टाल ही दी है, जो एकाधिक पर्यवेक्षकों के लिए संकेत है कि अगर वह चाहे तो सामान्य कामकाज पूरा करते हुए मामले को लटका रहने दे सकता है. कभी-कभी लोकतंत्र और कानून के बीच टकराव दिखाई दे सकता है. निषेधात्मक कानून का अर्थ स्वतंत्रताओं के ह्रास में हो सकता है. अगर शीर्ष अदालत मामले को लटका रहने देती है, तो वह सोद्देश्य ढंग से टालना भी हो सकता है.

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