रॉयल्टी विवादः क्या यह विनोद का विषय है?
ताजा विवाद में रॉयल्टी से कहीं बड़ा मसला अविश्वास और लेखकीय अस्मिता से खिलवाड़ का है

नाटककार-अभिनेता मानव कौल अपने गद्य के अलावा मंच और परदे पर भी जज्बात को नरमी और नजाकत से निभाने के लिए जाने जाते रहे हैं. कोमलता उनकी तासीर में है. विनोद कुमार शुक्ल की कविताओं और गद्य के लगभग दीवाने मानव ने कुछ साल पूर्व जब पहली दफा उन्हें फोन करने का साहस जुटाया तो संकोच, झिझक और साइलेंस के बीच इतना ही कह पाए थे: ''आइ लव यू''. लेकिन पिछले पखवाड़े रायपुर (छत्तीसगढ़) में शुक्ल से एक आत्मीय मुलाकात के बाद उन्होंने सोशल मीडिया पर जो टिप्पणी लिखी, उसने हिंदी जगत के जमीर को रेगमाल की तरह छील डाला: ''इस देश के सबसे बड़े लेखक... पिछले एक साल में वाणी प्रकाशन से छपी तीन किताबों का इन्हें 6,000 रु. मात्र मिला है. और राजकमल प्रकाशन से पूरे साल का 8,000 रु. मात्र... मतलब देश का सबसे बड़ा लेखक साल के 14,000 रु. मात्र ही कमा रहा है.''
इसे जरा एक संदर्भ में रखकर देखें. युवा लेखक नीलोत्पल मृणाल के नए उपन्यास यार जादूगर का 50,000 प्रतियों के साथ अभी पिछले अक्तूबर में पहला संस्करण छपा है. इसकी 30,000 से ज्यादा प्रतियां बिक जाने के साथ दस फीसदी के हिसाब से छह लाख रुपए की रॉयल्टी उनकी हो गई. हिंदयुग्म प्रकाशन से अपनी इस तीसरी किताब के साथ उन्हें 15-17 लाख रुपए सालाना रॉयल्टी मिल रही है. ऐप और वेबसाइट आधारित साहित्यिक प्लेटफॉर्म बिंज के लिए लिखे नए उपन्यास स्टेशन के लिए अनिल यादव को 1.60 लाख रुपए मिले हैं. किताब की शक्ल में इसे अलग से छपवाने का अधिकार लेखक के ही पास है.
दर्जन भर से ज्यादा हिंदी फिल्मों में केंद्रीय भूमिकाएं निभाकर सेलेब्रिटी बन चुके मानव की तंज टिप्पणी पर भूचाल आ गया, जबकि 86 वर्षीय शुक्ल पिछले छह साल से प्रकाशकों को अपनी प्रमुख पुस्तकें उन्हें बताए बिना आगे न छापने, उनमें संशोधन करने वगैरह के बारे में वस्तुत: विनती करते आ रहे थे, पर उन्हें अनसुना किया जाता रहा. शुक्ल ने एक वीडियो के जरिए भी गुहार लगाई कि उन्हें ठगा जा रहा है, उनकी किताबें बंधक बना ली गई हैं. इसके बाद सोशल मीडिया पर प्रकाशकों की खबर लेने वाली पोस्ट्स की बाढ़ आ गई.
चारों ओर से आलोचना के घेरे में आने से हड़बड़ाए दोनों प्रकाशकों ने भी बयान जारी कर सफाई दी और शुक्ल से सौहार्दपूर्ण संबंध बनाए रखने की उम्मीद जताई. हालांकि सफाई में भी शुक्ल कठघरे में खड़े किए जाते दिखे.
आपको याद होगा, हिंदी साहित्य के हलके में रॉयल्टी को लेकर ऐसा ही बखेड़ा अक्तूबर 2005 में प्रख्यात हिंदी कथाकार निर्मल वर्मा के निधन के बाद भी खड़ा हुआ था. उनकी पत्नी, कवयित्री गगन गिल ने राजकमल प्रकाशन पर वर्मा की पुस्तकों की रॉयल्टी में घपला करने का आरोप लगाया था. चर्चित बांग्ला लेखिका महाश्वेता देवी ने भी इसी में अपना स्वर मिलाते हुए कहा था कि अपने उपन्यासों के हिंदी प्रकाशन में वे भी ठगी गई हैं और अदालत जाने की सोच रही हैं. 2005-06 के उस रॉयल्टी विवाद के दौरान अखबारों में एक पुरानी चिट्ठी भी छपी, जिसे प्रथम प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू ने साहित्य अकादमी के तत्कालीन सचिव को लिखा था. उसमें उन्होंने इस बात पर दुख और गुस्सा जताया था कि (सूर्यकांत त्रिपाठी) निराला जैसा देश का इतना प्रतिष्ठित साहित्यकार भूखों मर रहा है और प्रकाशक उनकी किताबों से खूब कमा रहे हैं.
रॉयल्टी तो खैर एक पहलू है लेकिन उससे गंभीर बात हिंदी साहित्य की दुनिया में आज की तारीख में सबसे प्रतिष्ठित विनोद कुमार शुक्ल के लेखकीय अवमान और सरासर अनदेखी की है. बिंज के संपादक अनुराग वत्स कहते हैं, ''विनोद जी की पांडुलिपि आप उनके लगातार मना करने के बावजूद आखिर कैसे छापते रह सकते हैं? बिंज ने भी विनोद जी से संपर्क किया था तो उन्होंने कहा था कि मौजूदा कॉपीराइट्स पर पुनर्विचार और संशोधन के बाद वे हमसे संपर्क करेंगे. हमने तो उनका कुछ उठाकर नहीं छाप लिया.''
लेखक-प्रकाशक संबंध, दरअसल विश्वास की धुरी पर टिके होते हैं. अनुबंध/एग्रीमेंट अपनी जगह है ही, जिसमें आजकल अमूमन हार्डबाउंड, पेपरबैक, कलेक्टर्स एडिशन, ईबुक संस्करण, ऑडियोबुक और सिनेमा/वेबसीरीज के लिए किताब के ऑडियोविजुअल अधिकार जैसे पहलू शामिल होते ही हैं. इसके अलावा मूल भाषा से अनुवाद और किताब किसी दूसरे प्रकाशक को देने का अधिकार. टेक्नोलॉजी के जरिए कोई नए प्लेटफॉर्म आने पर आपसी सहमति से उसके अधिकार भी तय हो जाते हैं. विनोद जी इसी ओर इशारा कर रहे थे कि 20-25 साल पहले ईबुक, ऑडियो बुक, किंडल आदि न होने से वे अनुबंध में शामिल ही न थे और इन माध्यमों में उनकी किताबें आने की उन्हें सूचना तक नहीं दी गई.
हां, साल में सभी लेखकों का स्टेटमेंट प्रकाशकों के लिए जरूर एक सरदर्दी वाला काम होता है. इसकी व्यावहारिकता को लेकर प्रकाशकों में अनौपचारिक चर्चाएं होती रही हैं. अगर किसी बड़े प्रकाशक के पास 10,000 टाइटल हैं तो 7,000-8,000 लेखक होंगे. अब प्रकाशक के लिए 8,000 का एकाउंट मेनटेन करने को 5-7 एकाउंटेंट चाहिए. हिंदयुग्म पब्लिकेशन के शैलेश भारतवासी इसमें एक और पहलू जोड़ते हैं: ''हमारे पास 350 टाइटल हैं पर लगातार बिकने वाली 50 से ज्यादा नहीं हैं. सबके यहां यही रेशियो होता है. अब सभी का एकाउंट मेनटेन करना महंगा पड़ता ही है.''
प्रकाशकों और लेखकों का एक बड़ा तबका विनोद जी के मामले को रॉयल्टी से कहीं ज्यादा विश्वसनीयता, संवादहीनता और लेखक की उपेक्षा से जोड़कर देखता है. विनोद जी के सुपुत्र शाश्वत बताते हैं कि ''किसी भी प्रकाशक ने इस विवाद पर खेद नहीं जताया है. हमें भी प्रकाशकों के जारी सार्वजनिक बयान ही मिले हैं. हां, अशोक महेश्वरी (राजकमल) ने कहा है कि इसी महीने के अंत तक वे रायपुर आकर तमाम मुद्दों पर स्थिति स्पष्ट करेंगे.''
एक प्रकाशक इस विवाद में दिलचस्प नुक्ता जोड़ते हैं: ''अगर किसी प्रकाशक की प्रतिष्ठा विनोद कुमार शुक्ल को छापने से है तो उसे सर्वाधिक मेहनत उनकी किताबों की बिक्री, कलेवर, प्रस्तुति और उपलब्धता पर करनी चाहिए. पर नए लेखकों के दबाव में प्रकाशकों की वरीयताएं बदल रही हैं.'' पर इस प्रकरण ने एक बात साफ कर दी है कि तेजी से बदलती टेक्नोलॉजी के दौर में लेखकों को अलग-अलग प्लेटफॉर्मों पर अपनी रचना के अधिकारों के प्रति ज्यादा सजग और कानूनी तौर पर साक्षर होना पड़ेगा वरना विनोद जी की तरह कोई भी 'ठगी का शिकार' हो सकता है.