बसपाः तिल-तिल कर टूटा तिलिस्म
कभी दलितों में गहरी पैठ और दमदार काडर के बूते जबरदस्त रसूख रखने वाली पार्टी का 2022 के विधानसभा चुनाव में शीराजा बिखर गया. आखिर क्यों हुई उसकी इस तरह मिट्टी पलीद.

समाजवादी चिंतक राम मनोहर लोहिया का जन्म स्थान रहे आंबेडकर नगर जिले में बहुजन समाज पार्टी (बसपा) का शुरुआती दौर यूं तो बहुत दबदबे वाला नहीं रहा था लेकिन धीरे-धीरे इस इलाके में हाथी की धमक सुनाई पड़ने लगी थी. पूर्व मुख्यमंत्री मायावती ने 29 सितंबर, 1995 को तत्कालीन फैजाबाद जिले को बांटकर आंबेडकर नगर के रूप में एक नया जिला बनाया था.
तब के बसपा नेता लालजी वर्मा और राम अचल राजभर के प्रयासों से रिकार्ड पांच लाख से ज्यादा लोग नए जिले के गठन की घोषणा का गवाह बनने शिव बाबा मैदान पहुंचे थे. यहीं से यह जिला बसपा के गढ़ में तब्दील होने लगा.
फिलहाल बसपा की राष्ट्रीय अध्यक्ष मायावती ने 1998 में जिले की तत्कालीन अकबरपुर (सुरक्षित) लोकसभा सीट से चुनाव लड़ा और जीतीं. उन्होंने इसी लोकसभा सीट से 1999 और 2004 में भी चुनाव जीता. इसके बाद से आंबेडकर नगर में बसपा का ही दबदबा रहता आया.
2017 के विधानसभा चुनाव में भाजपा की लहर के बावजूद बसपा ने आंबेडकर नगर की पांच में से तीन सीटों—अकबरपुर (राम अचल राजभर), कटेहरी (लालजी वर्मा) और जलालपुर (रितेश पांडे)—पर कब्जा जमाया था. 2019 के लोकसभा चुनाव में भी मोदी लहर के बावजूद बसपा ने आंबेडकर नगर लोकसभा सीट पर कब्जा जमाया था.
पर उसके बाद बसपा का गढ़ दरकने लगा. रामअचल राजभर, लालजी वर्मा, रितेश पांडेय के पिता और पूर्व सांसद राकेश पांडेय 2022 के विधानसभा चुनाव से पहले समाजवादी पार्टी (सपा) में शामिल हो गए. 2017 में बसपा के इकलौते दुर्ग के रूप में खड़ा रहा आंबेडकर नगर जिला 2022 के विधानसभा चुनाव में नेस्तनाबूद हो गया. पहली बार बसपा यहां की सभी पांचों सीट पर खेत रही.
बसपा के पूर्व विधानमंडल दल के नेता और कटेहरी से सपा विधायक लालजी वर्मा इसकी वजहों की ओर थोड़ा इशारा करते हैं, ''बसपा सुप्रीमो मायावती ने पार्टी संस्थापक कांशीराम के तय आदर्शों से किनारा कर लिया है. वे अब परोक्ष रूप से भाजपा की मदद कर रही हैं. इससे आंबेडकर नगर की जनता नाराज है.
और अब 2022 के विधानसभा चुनाव के नतीजों ने यूपी की राजनीति में बसपा को बीती हुई बासी पार्टी घोषित कर दिया है. 2007 में पूर्ण बहुमत के साथ प्रदेश में सरकार बनाने वाली बसपा 2022 में बलिया जिले से रसड़ा विधानसभा के रूप में सिर्फ एक सीट जीत पाई. वहां से उसके प्रत्याशी उमाशंकर सिंह जीते हैं. बसपा यूपी में अपना दल (एस), निषाद पार्टी, सुहेलदेव भारतीय समाज पार्टी और राष्ट्रीय लोकदल से भी पीछे रह गई. पार्टी को इस चुनाव में 12.9 प्रतिशत वोट मिले जो 1993 के बाद से सबसे कम है.
दलित चिंतक और लखनऊ कें बाबासाहेब भीमराव आंबेडकर विश्वविद्यालय में समाजशास्त्र विभाग में सहायक प्रोफेसर अजय कुमार बसपा के बेहद कमजोर प्रदर्शन के पीछे मायावती की रणनीति को जिम्मेदार मानते हैं. उनके शब्दों में, ''2012 में यूपी की सत्ता से बसपा के बाहर होने के बाद मायावती राजनीतिक गतिविधियों में लगातार सुस्त होती गईं. बसपा के मतदाताओं और नेताओं को जोड़कर रखने में उन्होंने कोई दिलचस्पी नहीं दिखाई.’’
बसपा संस्थापक कांशीराम के सहयोगियों के रूप में राज बहादुर, आरके चौधरी, दीनानाथ भास्कर, मसूद अहमद, बरखूराम वर्मा, दद्दू प्रसाद, जंगबहादुर पटेल, नसीमुद्दीन सिद्दीकी और सोनेलाल पटेल सरीखे नेताओं की लंबी फेहरिस्त हुआ करती थी. बाद में स्वामी प्रसाद मौर्य, जुगुल किशोर, सतीश चंद्र मिश्र, रामवीर उपाध्याय, सुखदेव राजभर, जयवीर सिंह, ब्रजेश पाठक, रामअचल राजभर, इंद्रजीत सरोज, मुनकाद अली और लालजी वर्मा जैसे नेता भी बसपा के सहयोगी बने.
आज इनमें से केवल सतीश मिश्र और मुनकाद अली ही बसपा के साथ हैं. मिश्र बसपा के अकेले नेता थे जिन्होंने कुल 151 सभाएं कर बसपा उम्मीदवारों के पक्ष में माहौल बनाने की कोशिश की थी. अजय कुमार बताते हैं, ''मायावती लगातार बसपा की विचारधारा से दूर होने के साथ राजनीतिक रूप से निष्क्रिय भी होती जा रही हैं.
इस कारण बसपा के पुराने सभी नेता या तो पार्टी छोड़कर चले गए हैं या फिर निष्कासित कर दिए गए हैं. काडर मतों को बसपा से जोड़े रखने के लिए मायावती के पास न तो नेता बचे हैं और न ही कोई दूसरा तंत्र ही विकसित किया गया है. यही वजह है कि पहले पुराने नेताओं ने दूसरे दलों में ठिकाना ढूंढा और अब बसपा का काडर वोट भी खिसक गया है. इस बार के चुनावों में चौपट प्रदर्शन की यही वजह है.’’
इस बार के विधानसभा चुनाव से पहले मायावती ने ब्राह्मण, मुस्लिम और दलित वोटों को लामबंद करके वैसी ही सोशल इंजीनिरिंग करने की कोशिश की थी जिस बिना पर पार्टी 2007 में सत्ता में पहुंची थी. 2020 में कानपुर में विकास दुबे एनकाउंटर के बाद मायावती ने पार्टी के राष्ट्रीय महासचिव सतीश मिश्र को ब्राह्मणों को बसपा से जोड़ने की जिम्मेदारी सौंपी. मिश्र ने प्रदेश भर में 65 से ज्यादा ''प्रबुद्ध वर्ग सम्मेलन’’ किए.
वे हर सम्मलेन में दावा करते थे कि बसपा के साथ अगर 13 फीसदी ब्राह्मण जुड़ता है तो 23 फीसदी दलित समाज के साथ मिलकर पार्टी की जीत पक्की है. बसपा ने ऐसा ही नारा 2007 में भी दिया था. तब पार्टी से 41 ब्राह्मण विधायक जीतकर आए थे. पर उसके बाद से एक-एक कर ब्राह्मण नेता पार्टी छोड़ते गए. फिलहाल बसपा के पास ब्राह्मण चेहरे के तौर पर मिश्र के अलावा नकुल दूबे और विधानसभा चुनाव से पहले पार्टी में वापसी करने वाले पवन पांडेय शामिल हैं.
इस दफा बसपा ने 65 ब्राह्मण उम्मीदवारों को टिकट दिया था जिनमें से आधे से ज्यादा तो जमानत तक नहीं बचा पाए. वाराणसी में ''ब्राह्मण जागो मंच’’ संस्था चलाने वाले वैद्यनाथ तिवारी बताते हैं, ''मायावती की राजनीति बस 'कैल्कुलेशन’ पर टिकी है. हर चुनाव के पहले उन्होंने मिश्र को ब्राह्मणों को लुभाने की जिम्मेदारी दी. लेकिन अब ब्राह्मण समाज इनकी चाल समझकर बसपा से हाथ जोड़ चुका है.’’
बसपा ने 2019 का लोकसभा चुनाव सपा के साथ मिलकर लड़ा था. उसमें बसपा के सांसद तो शून्य से बढ़कर 10 हो गए लेकिन सपा के पांच के पांच ही रहे. लोकसभा चुनाव के फौरन बाद बसपा और सपा की राहें जुदा हो गई थीं. अक्तूबर, 2020 में राज्यसभा चुनाव के दौरान सपा और बसपा के बीच तल्खी बढ़ गई थी.
राज्यसभा चुनाव के दौरान मायावती ने भाजपा के प्रति नरम रुख दिखाया तो सात बसपा विधायकों ने बगावत कर दी. मायावती का मानना था कि सपा की शह पर यह बगावत हुई. इसके बाद मायावती ने विधान परिषद चुनाव में सपा उम्मीदवारों को हराने के लिए भाजपा को वोट करने की अपील की थी. मायावती के इस बयान से मुस्लिम मतदाताओं में पार्टी के भाजपा समर्थक रुख की पुष्टि हुई और वह सपा के पक्ष में लामबंद हुआ.
सपा से मुस्लिम मतदाताओं को खींचने की रणनीति के तहत मायावती ने इस बार विधानसभा चुनाव में सबसे ज्यादा 89 मुस्लिम उम्मीदवार उतारे थे. बसपा के एक जोनल कोआर्डिनेटर बताते हैं, ''पार्टी की रणनीति थी कि जिस विधानसभा सीट पर सपा का मुस्लिम उम्मीदवार नहीं होगा वहां पर मुस्लिम मतदाता बसपा के मुस्लिम उम्मीदवार को वोट करेंगे. इस तरह मुस्लिम और दलित गठजोड़ से बसपा को फायदा होगा.’’
इस चुनाव में 48 सीटें ऐसी थीं जिनमें सपा या उसके सहयोगी दलों के मुस्लिम उम्मीदवार के सामने बसपा का भी मुस्लिम उम्मीदवार था. इनमें से 37 सीटों पर मुस्लिम मतदाताओं ने एकतरफा सपा को वोट किया. अलीगढ़, बहराइच, बिस्वां समेत 11 विधानसभा सीटें ऐसी रहीं जहां पर सपा और बसपा के मुस्लिम उम्मीदवारों के बीच मुस्लिम मतों का बंटवारा हुआ और इसका लाभ भाजपा को हुआ.
कभी मायावती के करीबी रहे और अब कांग्रेस के यूपी मीडिया सेल के चेयरमैन नसीमुद्दीन सिद्दीकी बताते हैं, ''मायावती ने बसपा के मुस्लिम उम्मीदवारों को कुछ इस तरह उतारा जिससे वे वोट बांटकर भाजपा उम्मीदवार को जिताने में मदद कर सकें.’’ हालांकि बसपा के एक मुस्लिम प्रवक्ता नाम न छापने की शर्त पर बताते हैं, ''विपक्षी दलों में केवल बसपा ही थी जिसने पिछले पांच साल लगातार भाजपा सरकार के खिलाफ आवाज उठाई. बसपा ने ही मुसलमानों को उचित प्रतिनिधित्व दिया है.’’
विधानसभा चुनाव के नतीजे आने के दूसरे दिन मायावती ने बयान जारी कर कहा कि मुस्लिम समाज ने सपा पर भरोसा जताकर भारी भूल की है. उनका कहना था कि अगर मुस्लिम समाज का वोट दलित समाज के साथ मिल जाता तो जिस तरह पश्चिम बंगाल में टीएमसी ने भाजपा को धराशायी किया था, वैसे परिणाम यूपी में भी दोहराए जा सकते थे.
बसपा के खराब प्रदर्शन का एक बड़ा कारण परंपरागत दलित वोटों का खिसकना भी है. इसमें बड़ी संख्या जाटव (दलित) मतदाताओं की है जिसे बसपा का कोर वोटबैंक माना जाता है. इसमें सेंध लगाने के लिए भाजपा ने उत्तराखंड की पूर्व राज्यपाल, जाटव जाति की बेबीरानी मौर्य को आगरा से चुनाव लड़वाया था. मौर्य को मायावती के समकक्ष खड़ा करने के लिए उनकी 90 रैलियां की गईं. मायावती ने भी रैलियों की शुरुआत 2 फरवरी को आगरा से ही की.
आगरा कभी बसपा का गढ़ हुआ करता था. यहां के सभी नौ विधानसभा क्षेत्रों में दलित आबादी 30 प्रतिशत से ज्यादा है और उस दलित आबादी में तीन चौथाई प्रतिनिधित्व जाटव समाज का है. 2007 में बसपा ने ये सभी नौ सीटें जीती थीं. इस दफा मायावती ने प्रदेश के सभी 18 मंडल मुख्यालयों पर एक-एक रैली की पर कोई लाभ न हुआ. कानपुर के पुलिस कमिश्नर रहे, जाटव जाति के असीम अरुण इस बार कन्नौज (सुरक्षित) सीट से भाजपा टिकट से जीते.
2017 में यह सीट सपा ने जीती थी और बसपा 17 प्रतिशत वोट पाकर तीसरे नंबर पर थी. 2022 में इस सीट पर बसपा का वोट सात प्रतिशत तक घटा और भाजपा के वोटों में पांच प्रतिशत बढ़ोतरी हुई. अजय कुमार बताते हैं, ''इस बार बसपा समर्थक जाटव मतदाताओं के एक बड़े हिस्से ने भाजपा का समर्थन किया. तभी तो 2017 में दो आरक्षित सीटें जीतने वाली बसपा 2022 में एक भी आरक्ष्ति सीट न जीत सकी.’’
विधानसभा चुनाव में चारो खाने चित मायावती ने आंबेडकर नगर से सांसद रितेश पांडेय को लोकसभा में पार्टी के नेता पद से हटाकर गिरीशचंद्र जाटव को लोकसभा में पार्टी का नया नेता बनाया है, जो बिजनौर के नगीना से सांसद हैं. इसे दलित वोटबैंक सहेजने की दिशा में उठाया गया कदम माना जा रहा है.
इस बार दलबदलुओं को चुनाव लड़ाने का मायावती का दांव भी काम नहीं कर पाया. बरेली की फरीदपुर (सुरक्षित) सीट से उतरीं बसपा प्रत्याशी शालिनी सिंह अरसे से सपा से जुड़ी थीं. वहां टिकट न मिलने पर वे बसपा में आ लगीं और अगले ही दिन बसपा ने उन्हें प्रत्याशी घोषित कर दिया. उन्हें साढ़े 13 हजार से कुछ ज्यादा वोट मिल पाए. वे कहती हैं, ''बसपा का मतदाता बड़ी खामोशी से भाजपा के साथ चला गया इस वजह से मुझे बड़ी हार का सामना करना पड़ा.’’
बसपा के मूल मतदाताओं के हाथी पर से उतरने की ही वजह से पार्टी गोरखपुर में भी साफ हुई. 2017 में बसपा ने गोरखपुर जिले में एक सीट जीती थी और तीन पर सीधी लड़ाई में थी. इस बार वह गोरखपुर की नौ में से एक सीट पर भी सीधी लड़ाई में न थी. 2017 में उसने चिल्लूपार सीट जीती थी. यहां से बसपा विधायक रहे विनय शंकर तिवारी इस दफा सपा टिकट पर लड़े. बसपा चिल्लूपार सीट पर तीसरे नंबर पर गई.
गोरखपुर में बसपा के पूर्व कोआर्डिनेटर रहे रामशकल सिंह बताते हैं, ''प्रत्याशियों की बेवजह अदलाबदली के चलते पार्टी को नुकसान हुआ. जो दावेवार 2019 के लोकसभा चुनाव के बाद से किसी विधानसभा सीट पर बसपा के टिकट पर लड़ने की तैयारी कर रहे थे उन्हें दूसरी जगह से चुनाव लड़वाना भारी रणनीतिक चूक थी.’’ 2017 में गोरखपुर की पिपराइच सीट पर बसपा सीधी लड़ाई में थी.
बसपा प्रत्याशी आफताब आलम उर्फ गुड्डू भैया ने 69,000 वोट पाए थे. इस बार पार्टी ने आलम को संतकबीर नगर की खलीलाबाद नगर सीट से उतारते हुए पिपराइच सीट दीपक अग्रवाल को दी. दीपक करीब 30,000 वोट ही हासिल कर पाए. 2017 मे बसपा ने गोरखपुर मंडल की 41 सीटों में से 17 पर सीधी लड़ाई लड़ी थी और दूसरा स्थान प्राप्त किया था. इस बार वह किसी भी सीट पर दूसरे नंबर की लड़ाई में नहीं थी.
विधानसभा चुनाव से पहले युवाओं में पैठ बनाने की मायावती की रणनीति भी असर नहीं दिखा पाई. 2020 में मायावती ने भतीजे आकाश आनंद को नेशनल कोआर्डिनेटर की जिम्मेदारी दी थी. आकाश पर युवा मतदाताओं को बसपा से जोडऩे की जिम्मेदारी थी. आकाश के सहयोग के लिए सतीश मिश्र के बेटे कपिल को लगाया गया था.
कपिल को कोई पद तो नहीं दिया गया लेकिन विधानसभा चुनाव के दौरान वे अपने पिता की रैलियों के मुख्य संयोजक के रूप में दिखायी दिए थे. युवाओं में बसपा का जनाधार बढ़ाने की रणनीति कामयाब न होने पर मायावती ने नए सिरे से संगठन को तैयार करना शुरू किया है. अभी तक बसपा में दो नेशनल कोआर्डिनेटर होते थे. इनमें एक पर आकाश आनंद और दूसरे पर रामजी गौतम की तैनाती थी.
7 मार्च को विधानसभा चुनाव के अंतिम चरण का मतदान समाप्त होते ही मायावती ने आकाश आनंद को पद पर कायम रखते हुए नेशनल कोआर्डिनेटर का दूसरा पद खत्म कर दिया. उन्होंने भाई आनंद कुमार को राष्ट्रीय उपाध्यक्ष और मिश्र को राष्ट्रीय महामंत्री पद पर बरकरार रखा है. अजय कुमार कहते हैं, ''बसपा के पुराने नेताओं की 'घर वापसी’ होने तक पार्टी का पुराना गौरव लौट पाना संभव नहीं.’’