मध्य प्रदेशः सरेंडर की पॉलिसी कितनी कामयाब

माओवाद प्रभावित राज्यों में समर्पण नीति का मिश्रित परिणाम दिखा है: आंध्र को सफलता मिली पर छत्तीसगढ़ बहुत ज्यादा सफल नहीं रहा

बड़ी कामयाबी सुकमा जिले के मलाईगुड़ा कैंप में गणतंत्र दिवस पर सरेंडर करने वाले 23 माओवादियों के साथ सुरक्षाकर्मी
बड़ी कामयाबी सुकमा जिले के मलाईगुड़ा कैंप में गणतंत्र दिवस पर सरेंडर करने वाले 23 माओवादियों के साथ सुरक्षाकर्मी

मध्य प्रदेश में सक्रिय सात बड़े माओवादियों ने बीते एक साल में महाराष्ट्र और छत्तीसगढ़ में समर्पण किया. इनमें डिविजनल कमांडर दिवाकर भी है, जिसे महाराष्ट्र-मध्य प्रदेश-छत्तीसगढ़ के नए इलाके में विस्तार का काम सौंपा गया था. समर्पण करने में तो खैर कोई बुराई नहीं पर यह समर्पण दिलचस्प इसलिए हैं क्योंकि 2010 के बाद एक भी माओवादी ने मध्य प्रदेश में हथियार नहीं डाले. नतीजतन, मध्य प्रदेश पुलिस को इन प्रमुख माओवादियों (और उनसे मिलने वाली सूचनाओं) तक पहुंचने के लिए काफी मशक्कत का सामना करना पड़ रहा है.

दूसरे राज्यों में हो रहे समर्पणों से प्रेरित होकर मध्य प्रदेश सरकार अपनी मौजूदा 1997 की माओवादी समर्पण नीति की कमियों और खामियों को दूर करने के लिए नई 'माओवादी समर्पण और पुनर्वास नीति' का मसौदा लेकर आई है. सूत्र कहते हैं कि यह माओवादियों से समर्पण करवाने के मामले में वामपंथी उग्रवाद से प्रभावित राज्यों के बीच छिड़ी आपसी होड़ का नतीजा है. केंद्र सरकार की ओर से 2014 में माओवादी समर्पण और पुनर्वास नीति का सूत्रपात करने के बाद ओडिशा, छत्तीसगढ़, आंध्र प्रदेश, तेलंगाना और महाराष्ट्र सहित कई ऐसे राज्यों ने अपनी-अपनी समर्पण नीतियों में फेरबदल किया. मगर उन्हें मिली-जुली कामयाबी ही मिली.

मध्य प्रदेश की मसौदा नीति बताती है कि इसके तहत मिलने वाले फायदों का पात्र कौन होगा. इनमें मध्य प्रदेश के भीतर और बाहर दोनों जगह रहकर गैरकानूनी गतिविधियों में लिप्त लोग शामिल हैं. उन्हें 5 लाख रुपए या उस माओवादी कार्यकर्ता के सिर पर रखे गए इनाम की रकम में से जो भी ज्यादा हो, मिलेगी. इसके अलावा पुलिस के हवाले किए गए हथियारों और गोला-बारूद के लिए अतिरिक्त धनराशि दी जाएगी. पिछले अपराधों के लिए माफी का भी प्रावधान है. ओडिशा, आंध्र प्रदेश और तेलंगाना की नीतियों की देखा-देखी, अन्य माओवादी सदस्यों, वित्तीय स्रोतों, असलहे और गोला-बारूद के बारे में जानकारी देने की जिम्मेदारी हथियार डालने वाले माओवादी की होगी. राज्य स्तर की एक समिति प्रक्रिया की छानबीन करके फैसला लेगी कि समर्पण स्वीकार किया जाए या नहीं. मगर समर्पण के लिए उग्रवादियों की कोई श्रेणी निर्धारित नहीं की गई है, जैसा ओडिशा ने किया है.

मध्य प्रदेश की मसौदा नीति में ज्यादा जोर समर्पण करने वाले माओवादियों के पुनर्वास पर दिया गया है. उन्हें कौशल विकास के लिए तीन महीने तक प्रति माह 6,000 रुपए और प्रधानमंत्री आवास योजना के तहत मकान देने का प्रावधान है. पुनर्वास नीति, पढ़ने के इच्छुक माओवादी कार्यकर्ता को 36 महीने तक प्रति माह 2,000 रुपए, राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा कानून के तहत अनाज, स्वास्थ्य बीमा और खुफिया जानकारी जुटाने में मदद देने के काम के लिए गोपनीय सैनिक के तौर पर रोजगार देने की पेशकश करती है. हथियार डालने वाला कार्यकर्ता अगर दूसरे माओवादियों के खात्मे या गिरफ्तारी में मदद करता है तो उसे पुलिस बल में पूर्णकालिक कॉन्स्टेबल के रूप में नियुक्त किया जा सकता है. दिलचस्प यह कि समर्पण के वक्त अगर वह नक्सली अविवाहित है तो इस नीति में उसे शादी के लिए 25,000 रुपए देने का प्रावधान है.

पिछले अपराधों के लिए माफी सभी समर्पण नीतियों में विवादास्पद मुद्दा रहा है. मध्य प्रदेश की मसौदा नीति इस पर भी ध्यान देती है. छानबीन समिति समर्पण से पहले किए गए अपराधों के मामले वापस लेने की सिफारिश कर सकेगी. अलबत्ता चूंकि कानून में गंभीर अपराधों के लिए माफी का प्रावधान नहीं है, लिहाजा आम तौर पर होता यह है कि ऐसे अपराधों के लिए अदालत में चालान (आरोपपत्र) ही दाखिल नहीं किए जाते. राज्य के एक बड़े पुलिस अफसर कहते हैं, ''इससे राज्य को समर्पण करने वाले नक्सली पर सरकार का नियंत्रण बनाए रखने में भी मदद मिलती है, खासकर जब उनके ऊपर फिर अपराध की दुनिया में लौट जाने का दबाव होता है.''

माओवादी हिंसा में मारे गए लोगों के परिजनों के लिए खेती की जमीन, रोजगार और नकद मुआवजा देने के प्रावधान भी इस मसौदा नीति में हैं. मध्य प्रदेश में संयोग से अब तीन ही जिले, मंडला, डिंडोरी और बालाघाट आधिकारिक तौर पर माओवाद से प्रभावित रह गए हैं. भारत की विद्रोह विरोधी रणनीतियों में समर्पण और पुनर्वास पर बहुत ज्यादा जोर रहा, लेकिन 2014 की राष्ट्रीय नीति के बाद अब उन्हें तर्कसंगत और आसान बनाया गया है. माओवाद प्रभावित राज्यों में समर्पण नीतियों को लागू करने का अनुभव मिला-जुला रहा है. मध्य प्रदेश के पड़ोसी राज्य छत्तीसगढ़ में, जहां माओवाद का फैलाव और प्रभाव ज्यादा रहा है, उसकी नीति के शुरुआती दिनों में भ्रष्टाचार और फर्जी समर्पण की कई खबरें सामने आई थीं.

छत्तीसगढ़ ने पहली समर्पण और पुनर्वास नीति 2004 में घोषित की, पर उसे ज्यादा कामयाबी नहीं मिली. 2004 और 2014 के बीच, जब राज्य ने दूसरी नीति का ऐलान किया तो कुल जमा कोई सौ लोगों ने समर्पण किया. फर्जी समर्पण और सरगनाओं के बजाए सुरक्षाकर्मियों के हाथों मजबूर छुटभैयों के समर्पण को लेकर तब भी सवाल उठाए गए थे. दूसरी नीति के बाद 2016 में कोई 1,160 कथित माओवादियों ने समर्पण किया, पर केंद्र सरकार की छानबीन समिति ने फैसला दिया कि उनमें से 1,000 से ज्यादा  लोग माओवादी कहलाने लायक नहीं थे. उससे एक साल पहले राज्य सरकार की छानबीन समिति ने भी पाया कि समर्पण करने वाले 75 फीसद माओवादी कार्यकर्ता पुनर्वास पैकेज के पात्र नहीं थे.

दूसरी तरफ, आंध्र प्रदेश की समर्पण और पुनर्वास नीति ज्यादा कामयाब रही, जो 1993 में लाई गई और लगातार बेहतर बनाई गई. 2005 से 2015 के बीच आंध्र प्रदेश में माओवादी घटनाएं 500 से घटकर दो पर आ गईं. नक्सलरोधी ग्रेहाउंड फोर्स को इसका श्रेय दिया गया पर मध्य प्रदेश के अधिकारी कहते हैं कि इसमें पुनर्वास उपायों का भी बराबर योगदान है. रिमोट ऐंड इंटरनल एरिया डेवलपमेंट योजना के तहत पुनर्वास कार्यक्रम का पूरा फोकस ग्रामीण इलाकों पर रहा. विश्लेषक कहते हैं कि इन उपायों से माओवादियों की नए रंगरूटों की खोज पर असर पड़ा है.

मगर समर्पण और पुनर्वास नीति से उग्रवादी गतिविधियां क्या कमजोर होती दिखाई देती हैं? मध्य प्रदेश में नक्सल ऑपरेशंस के आइजी साजिद फरीद शापू कहते हैं, ''कतई नहीं. माओवाद से निबटने में आंध्र प्रदेश के मॉडल की कामयाबी से पता चलता है कि समर्पण का सीधा संबंध कार्रवाइयों के जरिए उनके ऊपर डाले गए दबाव से है. इस मोर्चे पर कोई ढिलाई नहीं होनी चाहिए. समर्पण नीति की कामयाबी दरअसल बहुत कुछ कार्रवाइयों की कामयाबी पर निर्भर है.'' मध्य प्रदेश भी माओवाद से निबटने के लिए उनके इलाकों में पूरी तरह आदिवासियों के बल का गठन कर रहा है. वैसे, पूर्वी मध्य प्रदेश में इस काम के लिए एक समर्पित सशस्त्र बल 'द हॉक' पहले से है.

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