उत्तर प्रदेशः चेहरा बदलती मुस्लिम सियासत

ध्रुवीकरण रोकने की कोशिश में सियासी दलों ने इस बार विवादास्पद नेताओं से परहेज करते हुए नए और युवा चेहरों को बनाया उम्मीदवार. इससे समुदाय के भीतर नए सियासी रहनुमा उभरने की उम्मीद

नई नस्ल आजम खान के बेटे अब्दुल्लाह आजम खान
नई नस्ल आजम खान के बेटे अब्दुल्लाह आजम खान

रामपुर में जिला जेल के पीछे मौजूद मौलाना अबुल कलाम आजाद पार्क के बगल से जाने वाली संकरी गली सफेद रंग की कोठी की तरफ ले जाती है. कोठी के मालिक रामपुर के सांसद समाजवादी पार्टी (सपा) के राष्ट्रीय महासचिव आजम खान विभिन्न मामलों में दर्ज तीन दर्जन से अधिक मुकदमों के चलते पिछले 23 महीने से जेल में बंद हैं. यह पहला मौका है जब आजम खान जेल में रहकर रामपुर से सपा प्रत्याशी के तौर पर विधानसभा चुनाव लड़ रहे हैं. आजम के जेल में रहने के बावजूद कड़कती सर्दी और कोहरे को भेदते हुए समर्थक सुबह आठ बजे से कोठी के बाहर जमा होने लगते हैं. कोठी की बगल में एक बड़े हॉल को 'बैठक' नाम दिया है. 'बैठक' की दीवारें आजम खान की तस्वीरों से पटी पड़ी हैं. सुबह ठीक दस बजे अब्दुल्लाह आजम खान 'बैठक' में पहुंचते हैं और अपने वालिद की तरह एक-एक समर्थक के पास जाकर उसका हाल-चाल पूछते हैं.

31 साल के इंजीनियर अब्दुल्लाह भी अपने वालिद के साथ जेल में बंद थे और दो हफ्ते पहले ही रिहा हुए हैं. सपा ने रामपुर की स्वार टांडा सीट से अब्दुल्लाह को उम्मीदवार बनाया है. उन्होंने अपनी विधानसभा सीट के साथ अपने वालिद के चुनाव क्षेत्र में प्रचार की कमान संभाल ली है. कोठी में कार्यकर्ताओं से मिलने के बाद अब्दुल्लाह रोज दोपहर 12 बजे रामपुर में बाब-ए-इल्म रोड पर मौजूद सपा कार्यालय पहुंच जाते हैं. आजम खान ने दारुल अवाम के नाम से मशहूर हाइटेक सपा कार्यालय का निर्माण 2014 के लोकसभा चुनाव से पहले कराया था. पार्टी कार्यालय के हर कमरे में उन्हें और उनके परिवार को साजिश के तहत जेल में बंद किए जाने और उन्हें रिहा करने की मांग करते बड़े-बड़े पोस्टर नुमायां हैं. अब्दुल्लाह के सपा कार्यालय पहुंचते ही सैकड़ों की तादाद में कार्यकर्ता उन्हें घेर लेते हैं. कई लोगों के हाथों में गुलाबी रंग के कागज में भेजी गई नोटिस है. प्रशासन ने भारतीय दंड संहिता (आइपीसी) की धारा 149 के तहत जारी 'रेड कार्ड' के जरिए इन लोगों पर चुनाव के दौरान गड़बड़ी की आशंका जाहिर की है.

उत्तर प्रदेशः चेहरा बदलती मुस्लिम सियासत

आजम खान की तरह अब्दुल्लाह भी कार्यकर्ताओं से अपना रिश्ता जोड़ते हुए उन्हें प्रशासन की इस एकतरफा कार्रवाई का विरोध करने का भरोसा दिलाते हैं. वे तुरंत कार्यालय में मौजूद स्टाफ को प्रशासन की विद्वेष पूर्ण कार्रवाई की जानकारी देता शिकायती पत्र तैयार करने का निर्देश देते हैं ताकि उसे फौरन चुनाव आयोग को भेजा जा सके. अब्दुल्लाह आरोप लगाते हैं, ''मुरादाबाद के कमिशनर आंजनेय कुमार सिंह ने रामपुर का जिलाधि‍कारी रहते हुए आजम साहब और परिवार को झूठे मुकदमों में फंसाया और अब चुनाव के दौरान सपा कार्यकर्ताओं को परेशान करने के पीछे उनका ही हाथ है.'' करीब एक घंटा सपा कार्यालय में रहने के बाद अब्दुल्लाह अपने चुनाव क्षेत्र स्वार टांडा की ओर निकल पड़ते हैं. अपने चुनाव क्षेत्र में छह घंटे जनसंपर्क करने के बाद वे रामपुर लौट आते हैं और रात 12 बजे तक मतदाताओं के दरवाजे जाकर उनसे अपने वालिद के लिए वोट मांगते हैं. मुस्लिम आबादी बहुल रामपुर में मतदाता अब्दुल्लाह में आजम खान का अक्स देखते हैं और भारी बहुमत से जिताने का भरोसा भी दिलाते हैं.

रामपुर में आजम खान की गैरमौजूदगी में अब्दुल्लाह आजम के रूप में एक युवा सियासी चेहरे का उभार हो रहा है तो यहां से साढ़े तीन सौ किलोमीटर दूर शामली जिले की कैराना विधानसभा सीट पर एक बहन अपने भाई की राजनैतिक विरासत बचाने मैदान में कूद पड़ी है. यह हैं 28 वर्षीया इकरा हसन जो जेल में बंद और कैराना विधानसभा सीट से सपा उम्मीदवार नाहीद हसन के चुनाव प्रचार में दिन-रात एक किए हुए हैं. इकरा कैराना से सांसद रहे मरहूम मुनव्वर हसन की बेटी और दो बार विधायक रहे नाहीद की बहन हैं. इकरा दिल्ली के लेडी श्रीराम कॉलेज से कानून की पढ़ाई करने के बाद इंटरनेशनल लॉ का अध्ययन करने लंदन चली गई थीं. दिसंबर, 2019 में लंदन स्थि‍त भारतीय उच्चायोग के सामने नागरिकता संशोधन कानून (सीएए) का विरोध करके वे चर्चा में आई थीं. इकरा पश्चिमी यूपी के एक बड़े राजनैतिक खानदान से ताल्लुक रखती हैं.

उत्तर प्रदेशः चेहरा बदलती मुस्लिम सियासत

1984 के लोकसभा चुनाव में इकरा के दादा अख्तर हसन ने निर्दलीय प्रत्याशी के रूप में चुनाव लड़ने वाली वर्तमान में बसपा की राष्ट्रीय अध्यक्ष मायावती को दो लाख से अधिक मतों से हराया था. अख्तर हसन के बेटे और इकरा के पिता मुनव्वर हसन ने पश्चिमी यूपी की मुस्लिम राजनीति में बड़ा नाम कमाया. वे लोकसभा, राज्यसभा, विधानसभा और विधानपरिषद, चारों सदनों के सदस्य रहे. 2008 में एक हादसे में मुनव्वर हसन की मौत होने के बाद इकरा की मां तबस्सुम हसन सांसद बनीं. फिर उनके बेटे नाहीद हसन दो बार कैराना से विधायक बने. वर्ष 2015 में इकरा शामली में जिला पंचायत सदस्य भी निर्वाचित हुई थीं. नाहीद पर 17 मुकदमे दर्ज हैं. उन्हें गैंगस्टर ऐक्ट के मुकदमें में उस वक्त गिरफ्तार कर लिया गया जब वे 2022 के विधानसभा चुनाव में कैराना सीट से नामांकन करके लौट रहे थे. भाई की खातिर घर-घर प्रचार करने के लिए इकरा ने दस टोलियां बनाई हैं. एक टोली का नेतृत्व वे स्वयं कर रही हैं. वे बताती हैं, ''नाहीद पर कार्रवाई राजनैतिकद्वेष से प्रेरित है. जनता यह समझ रही है.'' 

यूपी में 2022 का विधानसभा चुनाव मुस्लि‍म राजनीति के लिहाज से एक नई शुरुआत करने जा रहा है. पिछले कई चुनावों में अपनी धमक दिखाने वाले मुस्लि‍म चेहरे इस बार नदारद हैं तो नए युवा नेता इनकी जगह लेने की भरसक कोशिश कर रहे हैं. आजमगढ़ के प्रतिष्ठित शिबली नेशनल कॉलेज के सेवानिवृत्त प्राचार्य ग्यास असद खान बताते हैं, ''भाजपा का विरोध करने वाले राजनैतिक दलों विशेषकर समाजवादी पार्टी ने ऐसे मुस्लिम नेताओं को चुनाव में उतारने से परहेज किया है जो पूर्व में अपने भड़काऊ बयान के चलते विवादों में घिरे थे. राजनैतिक पार्टियों को लगता है कि पूर्व के चुनावों में इनके विवादास्पद बयानों ने ही मुसलमानों के विरोध में हिंदुओं के ध्रुवीकरण की नींव तैयार की थी. इस बार चुनाव में बड़ी संख्या में नए मुस्लि‍म युवा नेता राजनीति में सक्रिय हुए हैं जो समाज के हर तबके का समर्थन पाने का प्रयास कर रहे हैं. यह मुस्लिम राजनीति में एक बड़ा बदलाव है. इस तरह, 2022 का विधानसभा चुनाव प्रदेश में नई 'मुस्लिम लीडरशि‍प' को भी जन्म देगा.'' वर्ष 2019 के लोकसभा चुनाव के बाद से ही राजनैतिक दलों ने एक बड़ा बदलाव करते हुए नए चेहरों को पार्टी की मुस्लिम सियासत की कमान सौंप दी थी. (देखें बॉक्स) 

दिग्गजों के सामने राजनैतिक संकट

विवादों में रहने वाले मुस्लिम नेताओं से राजनैतिक पार्टियों की दूरी ने कई दिग्गजों (देखें बॉक्स) के सामने सियासी संकट भी खड़ा कर दिया है. सहारनपुर में मुस्लिम राजनीति की धुरी रहे इमरान मसूद ने 2014 के लोकसभा चुनाव से पहले प्रधानमंत्री पद के तत्कालीन उम्मीदवार नरेंद्र मोदी के खिलाफ एक भड़काऊ बयान दिया था. इस बार इमरान ने कांग्रेस छोड़कर सपा में शामिल होने की घोषणा की, उनका पूर्व का बयान एक बार फि‍र सोशल मीडिया पर छा गया. नतीजतन, सपा ने इमरान मसूद पर दांव लगाने से हाथ पीछे खींच लिए. सूत्रों के मुताबिक, सपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष अखिलेश यादव ने यूपी में सरकार बनने पर इमरान मसूद को सम्मानजनक तरीके से 'एडजस्ट' करने का भरोसा दिया है.

मेरठ और आसपास के जिलों में मुस्लिम राजनीति की धुरी रहे याकूब कुरैशी भी इस बार चुनावी मैदान से बाहर हैं. कुरैशी वर्ष 2006 में उस वक्त चर्चा में आए थे जब उन्होंने डेनमार्क के कार्टूनिस्ट का सिर कलम करने वाले को 51 करोड़ रुपए देने की घोषणा की थी. सांप्रदायिक रूप से बेहद संवेदनशील मुजफ्फरनगर जिले में 2013 के बाद हुए दंगे ने धु्रवीकरण की नींव तैयार कर दी  थी. पिछले तीन चुनाव में यह धु्रवीकरण स्पष्ट रूप से दिखाई पड़ा था. किसान आंदोलन से दोबारा स्थापित हुई जाट-मुस्लिम एकता को बरकरार रखने और ध्रुवीकरण रोकने के लिए समाजवादी पार्टी और राष्ट्रीय लोकदल (रालोद) गठबंधन ने मुजफ्फरनगर में एक नया प्रयोग किया है.

एक समय था जब एक ही मुस्लिम परिवार कैराना और मुजफ्फरनगर लोकसभा सीट का प्रतिनिधित्व करता था. इस परिवार में लताफत अली मुजफ्फरनगर से सांसद थे तो उनके बहनोई गय्यूर अली खान कैराना से सांसद थे. इस बार चुनाव में तस्वीर अलग नजर आ रही है. मुजफ्फरनगर के बड़े चेहरों को राजनैतिकपार्टियों ने घर बिठा दिया है. मुजफ्फरनगर निवासी पूर्व राज्यसभा सदस्य अनीर आलम खान के पुत्र पूर्व विधायक नवाजिश आलम बुढ़ाना या चरथावल सीट से गठबंधन उम्मीदवार के रूप में चुनाव लड़ना चाहते थे लेकिन उनकी हसरत अधूरी रह गई. पूर्व विधान परिषद सदस्य चौधरी मुश्ताक के पुत्र नदीम चौधरी और चरथावल से बसपा के टिकट पर विधायक रह चुके नूर सलीम राणा, पूर्व विधायक हाजी लियाकत अली भी मीरापुर विधानसभा सीट से सपा-रालोद गठबंधन से टिकट मांग रहे थे, इन्हें भी निराशा हाथ लगी. 

'नवाब' बनाम रियाया

रामपुर में नवाब खानदान और आजम खान के बीच छत्तीस का आंकड़ा रहा है. आजम खान रामपुर से नौ बार विधायक रहे हैं. लेकिन 2022 के विधानसभा चुनाव में पहली बार आजम परिवार का सीधा मुकाबला नवाब खानदान से है. रामपुर शहर सीट से कांग्रेस के टिकट पर नवाब खानदान के नावेद मियां सपा उम्मीदवार आजम खान के सामने चुनाव मैदान में हैं तो नावेद मियां के बेटे हैदर अली खां उर्फ हमजा मियां भाजपा के सहयोगी अपना दल (एस) उम्मीदवार के रूप में स्वार टांडा विधानसभा सीट पर अब्दुल्लाह को चुनौती दे रहे हैं. यह पहला मौका है कि जब भाजपा या उसके किसी सहयोगी दल ने विधानसभा चुनाव में किसी मुस्लिम उम्मीदवार को टिकट दिया हो. हमजा मियां ने 2019 में कांग्रेस की सदस्यता ली थी. बाद में उनकी विचारधारा बदल गई और अब वे अपना दल के उम्मीदवार के रूप में चुनाव मैदान में हैं. हमजा बताते हैं, ''आजम खान ने रामपुर की पहचान को नष्ट कर दिया है. रजा लाइब्रेरी से नवाब खानदान को बेदखल कर दिया. मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने राज्य सरकार के कोटे से मुझे रजा लाइब्रेरी का सदस्य नामित किया है.''
 
दरगाह आला हजरत की अलग राह

एक दौर था जब बरेलवी मुसलमानों के मरकज बरेली स्थित दरगाह आला हजरत के दरवाजे पर सियासतदां सिर झुकाने पहुंचा करते थे. संभवत: यह पहली बार है कि दरगाह से जुड़े दिग्गज खुद पार्टियों को समर्थन की पेशकश कर रहे हैं. नबीरे आला हजरत मौलाना अदनान रजा खां उर्फ अदनान मियां लखनऊ जाकर समाजवादी पार्टी को समर्थन दे चुके हैं. जमात रजा मुस्तफा दरगाह आला हजरत का प्रमुख संगठन है जिसके राष्ट्रीय अध्यक्ष असजद रजा खां भी नबीरे आला हजरत हैं. जमात में उपाध्यक्ष के पद पर असजद मियां के दामाद सलमान मियां काबिज हैं जिनकी एक गोपनीय मुलाकात 2021 के जुलाई महीने में मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ से हुई थी. इस मुलाकात की फोटो वायरल होने के बाद जब दरगाह परिवार में विवाद बढ़ा तो सलमान मियां ने सफाई दी कि वे मुख्यमंत्री योगी से मुसलमानों के मसलों पर मुलाकात करने गए थे.

नबीरे आला हजरत और इत्तेहाद-ए-मिल्लत काउंसिल (आइएमसी) के प्रमुख मौलाना तौकीर रजा खां भी विधानसभा चुनाव से सपा से तालमेल की कोशि‍श में थे. सपा से किसी प्रकार के समझौते पर दिलचस्पी न दिखाए जाने पर तौकीर ने अचानक कांग्रेस को बिना शर्त समर्थन देने की घोषणा कर दी. इस वक्त तौकीर पश्चिमी यूपी में कांग्रेस उम्मीदवारों के पक्ष में प्रचार कर रहे हैं. अब उनके निशाने पर समाजवादी पार्टी है. तौकीर कहते हैं, ''अगर प्रदेश में दोबारा समाजवादी पार्टी आई तो फिर से दंगे शुरू हो जाएंगे.'' दरगाह आला हजरत परिवार से अलग-अलग राजनैतिकदलों को समर्थन देने के बीच में ही दरगाह प्रमुख मौलाना सुब्हान रजा खां उर्फ सुब्हानी मियां के दामाद सैयद आसिफ मियां ने बतौर एआइएमआइएम प्रत्याशी के तौर पर उत्तराखंड की खटीमा विधानसभा सीट से नामांकन कर दिया है. बताया जाता है कि असद्दुदीन ओवैसी की पार्टी से टिकट लेने से पहले आसिफ मियां ने कांग्रेस और सपा से टिकट लेने का प्रयास किया था लेकिन बात नहीं बनी. आसिफ के चुनाव लड़ने से पैदा हुए विवाद को थामने के लिए उनसे दरगाह के सारे पद छीन लिए गए हैं. साथ ही आसिफ को दरगाह के किसी पद पर इस्तेमाल न करने की सख्त हिदायत भी दी गई है.

दरगाह आला हजरत परिवार की बहू रहीं और बरेली में तीन तलाक पीड़ित महिलाओं के लिए काम कर रहीं निदा खान ने भाजपा का दामन थाम लिया है. निदा को मुस्लिम महिलाओं के बीच भाजपा की नीतियों का प्रचार करने की जिम्मेदारी मिली है. बरेली के वरिष्ठ वकील अजीजुल हलीम कहते हैं, ''यूपी में बदल रही मुस्लिम राजनीति का असर दरगाह आला हजरत की अंदरूनी सियासत पर भी पड़ रहा है. आने वाले दिनों में दरगाह आला हजरत से जुड़े परिवारों के बीच राजनैतिक प्रतिद्वंद्विता और बढ़ेगी.''

बहरहाल, 2022 के विधानसभा चुनाव में बड़े और विवादास्पद चेहरों से दूर मुस्लिम राजनीति की तपिश वैसी नहीं दिख रही जैसी पिछले चुनावों में दिखती आई है. सहारनपुर के देवबंद में मजलिस-इत्तेहाद-ए-मिल्लत नाम से सामाजिक संस्था चलाने वाले मुफ्ती तारिक काजमी बताते हैं, ''मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के मुसलमानों के प्रति तीखे बयानों ने भाजपा के विरोध में मुस्लिम ध्रुवीकरण को ही बढ़ावा दिया है. मुस्लिम मतदाता उस पार्टी के पक्ष में लामबंद होता दिख रहा है जो भाजपा को हराने की क्षमता रखता हो. इसने ही यूपी विधानसभा चुनाव में सपा-रालोद गठबंधन और भाजपा के बीच सीधे मुकाबले की नींव रखी है.''

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