स्वास्थ्यः सेहत को नहीं मिली बूस्टर डोज़
महामारी का दौर जारी रहने और स्वास्थ्य देखभाल की बढ़ती जरूरतों के बावजूद, इस क्षेत्र को कम प्रोत्साहन मिला है.

केंद्रीय बजट 2022 स्वास्थ्य
दूसरी लहर में 2,00,000 से अधिक मौतों का कारण बनी कोविड महामारी के हमले के मद्देनजर स्वास्थ्य सेवा क्षेत्र के लिए जितने धन की अपेक्षा थी, 2022-23 के बजट में इस क्षेत्र के लिए उससे बहुत कम धन दिया गया है. रु. 86,200.65 करोड़ के साथ वित्त वर्ष 2023 के लिए बजट अनुमान पिछले साल के 73,932 करोड़ रुपए के मूल बजट अनुमान से लगभग 12,000 करोड़ रुपए अधिक है, लेकिन यह वित्त वर्ष 2022 के संशोधित अनुमान रु. 86,000.65 करोड़ से सिर्फ 200 करोड़ रुपए अधिक है. सरकारी बजट में स्वास्थ्य सेवा को दी गई प्राथमिकता के आधार पर भारत दुनिया के 189 देशों में 179वें स्थान पर है.
बजट प्रस्तावों का उज्ज्वल पक्ष यह है कि नेशनल इंस्टीट्यूट आफ मेंटल हेल्थ एंड न्यूरो साइंसेस, बेंगलूरू के माध्यम से एक राष्ट्रीय टेलीमेंटल स्वास्थ्य कार्यक्रम शुरू किया जाएगा. एशियन फेडरेशन ऑफ साइकियाट्री एसोसिएशन के अध्यक्ष डॉ. जी. प्रसाद राव कहते हैं, ''महामारी (कोविड) के कारण पैदा हुई प्रच्छन्न वैश्विक मानसिक स्वास्थ्य महामारी को ध्यान में रखते हुए ऑनलाइन मानसिक स्वास्थ्य सेवा प्रदान करने के लिए 23 केंद्रों वाले राष्ट्रीय नेटवर्क की स्थापना की बात स्वागत योग्य कदम है.’’
विशिष्ट स्वास्थ्य पहचान सहित डिजिटल स्वास्थ्य पहलों को प्रोत्साहन देने के लिए, राष्ट्रीय डिजिटल स्वास्थ्य पारिस्थितिकी तंत्र को एक खुले मंच के रूप में स्थापित किया जाएगा. इसमें स्वास्थ्य सुविधाओं की डिजिटल रजिस्ट्रियां होंगी.
हालांकि स्वास्थ्य देखभाल पर सार्वजनिक व्यय अपेक्षाओं से बहुत कम है. वर्ष 2022-23 के लिए राष्ट्रीय स्वास्थ्य मिशन के लिए आवंटन केवल एक प्रतिशत बढ़ाकर 37,000 करोड़ रुपए किया गया.
सिंगल स्पेशियलिटी हेल्थकेयर पर केंद्रित एक ऑपरेटिंग और निवेश प्लेटफॉर्म, एशिया हेल्थकेयर होल्डिंग्स के कार्यकारी अध्यक्ष विशाल बाली कहते हैं, ''स्वास्थ्य पर सार्वजनिक व्यय में वृद्धि के बारे में बजट में कुछ नहीं कहा गया है जबकि भारत भर में स्वास्थ्य सेवा में सुधार के लिए इसकी सबसे ज्यादा जरूरत है.’’
कॉन्टिनेंटल हॉस्पिटल्स, हैदराबाद के चेयरमैन और एमडी, डॉ. गुरु एन. रेड्डी के अनुसार, भारत लंबे समय से स्वास्थ्य सेवाओं पर जरूरत से कम खर्च कर रहा है. उनका कहना है कि ''इस दौर में सकल घरेलू उत्पाद के 3 प्रतिशत से जरा भी कम आवंटन तकलीफदेह साबित होगा. जाहिर है हम कष्ट उठाते रहेंगे.
स्वास्थ्य क्षेत्र के लिए मामूली बजटीय आवंटन के साथ कोई भी विकासशील देश विकसित नहीं हो सका.’’ रेड्डी का सुझाव है कि सभी राष्ट्रीय स्वास्थ्य मिशनों को अनुभवी निजी निकायों को सौंपा जाए और प्रभावी कार्यान्वयन के लिए विशेषज्ञों की एक समिति गठित की जाए.
चिकित्सा उपकरण क्षेत्र इस बात से निराश है कि सरकार ने जिन सुधारों का वादा किया था, उन पर आगे नहीं बढ़ी है. एसोसिएशन ऑफ इंडियन मेडिकल डिवाइस के फोरम कोऑर्डिनेटर राजीव नाथ कहते हैं, ''(उपकरणों के लिए)80-85 प्रतिशत आयात निर्भरता और भारत के लगातार बढ़ते आयात बिल को समाप्त करने में मदद करने वाले किसी उपाय की घोषणा नहीं की गई है.’’
स्वास्थ्य देखभाल की बढ़ती लागतों को देखते हुए विशेषज्ञों का मानना है कि राज्य संचालित स्वास्थ्य योजनाओं से बाहर के वर्गों में आने वालों और नागरिकों को सब्सिडी के जरिये निजी बीमा के तहत लाना चाहिए. हर कर्मचारी के लिए बीमा कवर अनिवार्य कराने की जरूरत है.
1 % राष्ट्रीय स्वास्थ्य मिशन के लिए आवंटन में बढ़ोतरी, 2021-22 में 36,576 करोड़ रु. से बढ़ा कर बजट 2022-23 के लिए 37,000 करोड़ रु. किया गया.