प्रतिरक्षाः स्वदेशी पर ज्यादा जोर
निजी क्षेत्रों को रिसर्च और डेवलपमेंट में सुविधाएं देने के लिए सरकार खोल रही खजाना. रक्षा उत्पादन के स्वदेशीकरण पर ध्यान, लेकिन नीतिगत क्रियान्वयन होगा बड़ी चुनौती.

केंद्रीय बजट 2022 प्रतिरक्षा
इस बार साल 2022-23 के लिए भारत के रक्षा बजट में 10 फीसद की ठीक-ठाक बढ़ोतरी हुई है और यह 4.78 लाख करोड़ रुपए से 5.25 लाख करोड़ रुपए हो गया है. पिछले साल का रक्षा बजट केवल 1.4 फीसद बढ़ा था. अमेरिका और चीन के बाद भारत का सैन्य बजट दुनिया का तीसरा सबसे बड़ा बजट है, लेकिन क्योंकि इसकी सेना में जनशक्ति अधिक है, इसलिए देश में आधुनिक उपकरणों की तुलना में वेतन और पेंशन पर कहीं अधिक खर्च आता है.
भारत के शस्त्रागार में 60 फीसद से अधिक सैन्य हार्डवेयर आयात किया जाता है. निरंतर रक्षा आयात से न केवल बाहरी स्रोतों पर निर्भरता बढ़ती है, बल्कि विदेशी मुद्रा भी बाहर जाती है और विदेशों में उच्च-प्रौद्योगिकी वाली नौकरियों का सृजन भी होता है.
इस साल के रक्षा बजट के रक्षा पूंजी व्यय में एक उछाल देखा गया है—यह 1.35 लाख करोड़ रुपए से बढ़कर 1.52 लाख करोड़ रुपए हो गया है—और यह ऐसा चलन है जो पिछले तीन बजटों से जारी है. सरकार युद्धपोत, लड़ाकू जेट और हॉवित्जर जैसे रक्षा हार्डवेयर खरीदने के लिए खर्च बढ़ा रही है, लेकिन देश में ही खरीदे जाने वाले हार्डवेयर में भी लगातार धीमी वृद्धि कर रही है.
पिछले साल, सरकार ने भारतीय उद्योगों से अपनी जरूरतों के 58 फीसद, 70,000 करोड़ रुपए से अधिक की खरीदारी की. इस साल, सरकार की योजना इसे बढ़ाकर 68 फीसद करने की है या रकम के संदर्भ में कहें तो यह 1 लाख करोड़ रूपये होगी. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 2 फरवरी को अपनी पार्टी के कार्यकर्ताओं से कहा, ''भारत के एमएसएमई सेक्टर को रक्षा पूंजी बजट के लिए 68 फीसद की घरेलू खरीद के आरक्षण से बहुत फायदा होगा.’’
घरेलू खरीद से स्थानीय उद्योगों पर बहुत प्रभाव पड़ता है—यह उच्च-प्रौद्योगिकी सेक्टर में रोजगार पैदा करता है, एमएसएमई के लिए माहौल तैयार करता है और देश के भीतर ही अधिक परिष्कृत हार्डवेयर तैयार करने का कौशल विकसित होता है. सोसाइटी ऑफ इंडियन डिफेंस मैन्युफैक्चर्स के अध्यक्ष एस.पी. शुक्ला कहते हैं, ''घरेलू उद्योगों के लिए पूंजीगत व्यय से निवेश बना रहेगा और नई क्षमता का निर्माण होगा.’’ इस तरह, स्वदेशीकरण पर सरकार का जोर बड़े बजटीय लक्ष्यों के साथ पूंजीगत खर्च को बढ़ावा देने और रोजगार सृजन के लक्ष्य के लिए मुफीद बैठता है.
वैसे, सरकार की आत्मनिर्भर नीति के लिहाज से अभी भी अगले दशक तक स्वदेशी उत्पादन शुरू करने के लिए स्पष्ट रोडमैप मौजूद नहीं है. रक्षा मंत्रालय के एक वरिष्ठ अधिकारी कहते हैं, ''रक्षा अधिग्रहण परिषद जैसी एजेंसी की ओर से स्वदेशीकरण के लक्ष्यों की कड़ी निगरानी होनी चाहि’’ फिलहाल, ऐसा कोई निकाय अस्तित्व में नहीं है.
स्वदेशी खरीद का फैसला रक्षा के मामले में आत्मनिर्भर होने पर जोर देने का हिस्सा है जिसे मई 2020 में शुरू किया गया था. प्रधानमंत्री कार्यालय की निगरानी में चल रही इस कोशिश में मौजूदा वक्त में स्वदेशी रक्षा उद्योग के दो स्तंभों को मजबूत किया जा रहा है—सार्वजनिक क्षेत्र के रक्षा उपक्रम और निजी उद्योग. स्व-चालित तोपखाने और मिसाइलों जैसे बड़े उपकरणों के ऑर्डर को टियर 1 उद्योगों से पूरा किया जा सकता है, लेकिन सरकार को ड्रोन और मानव-रहित सिस्टम जैसे विशिष्ट क्षेत्रों में स्टार्ट-अप को सहारा देने की जरूरत है.
इन्हीं क्षेत्रों में बजट ने बड़े कदम उठाए हैं—इसने रक्षा अनुसंधान और विकास संस्थान (डीआरडीओ) के 11,981 करोड़ रुपए के बजट का 25 फीसद हिस्से को निजी उद्योगों, स्टार्ट-अप और अकादमिक क्षेत्रों के लिए अलग रख दिया है. डीआरडीओ के चेयरमैन जी. सतीश रेड्डी कहते हैं, ''देश के अनुसंधान और विकास आधार का विस्तार सभी हितधारकों—अकादमिक, आरऐंडडी संगठन और उद्योग—के साथ समन्वयकारी नजरिए के साथ किया जा सकता है.
यह देश के भीतर एडवांस्ड सिस्टम के विकास और निर्यात के लिहाज से भी महत्वपूर्ण है.’’ इस कदम का स्वागत करते हुए भारत फोर्ज के प्रबंध निदेशक बाबा कल्याणी कहते हैं कि इससे ''फ्रंटियर टेक्नोलॉजी और क्षमता विकास में निवेश का मार्ग प्रशस्त होगा.’’
सरकार ने रक्षा प्रणालियों और प्लेटफार्मों के परीक्षण और प्रमाणन की स्थापना के लिए एक नोडल निकाय स्थापित करने के अपने इरादों की भी घोषणा की, ताकि निजी डेवलपर्स अपने रक्षा नवाचारों का जल्दी परीक्षण कर सकें. सरकार ने 'मेक’ श्रेणी के तहत रक्षा मंत्रालय की खरीद के लिए सैन्य हार्डवेयर प्रोटोटाइप विकसित करने के वास्ते 1,365 करोड़ रुपए आवंटित किए हैं.
प्रतिरक्षा के क्षेत्र में स्टार्ट-अप को फंड देने का विचार नया नहीं है. तीन साल पहले डीआरडीओ ने 'टेक्नोलॉजी डेवलपमेंट फंड’ स्थापित किया था ताकि प्रतिरक्षा के क्षेत्र में आत्मनिर्भरता को बढ़ावा दिया जा सके. डीआरडीओ ने अब तक 164 करोड़ रुपए का फंड 2,611 कंपनियों के लिए मंजूर किया है, नतीजतन 150 प्रौद्योगिकियों के डिजाइनिंग पर काम चालू है.
2018 में शुरू की गई इनोवेशन फॉर डिफेंस एक्सीलेंस (आइ-डेक्स) जैसी अन्य पहलें उतनी सफल नहीं रही हैं. आइ-डेक्स का मकसद एमएसएमई स्टार्ट-अप्स, आरऐंडडी संस्थानों और शिक्षाविदों की मदद करना था. चार साल बाद, अभी तक किसी भी अत्याधुनिक तकनीक को सफलतापूर्वक तैनात नहीं किया जा सका है और इसके कोई भी उत्पाद फील्ड परीक्षण स्तर तक नहीं पहुंचा है.
यही वजह है कि डीआरडीओ संचालित मॉडल को सरकार का समर्थन मिला है. शीर्ष रक्षा अधिकारियों का कहना है कि सरकार अमेरिकी रक्षा विभाग की डिफेंस एडवान्स्ड रिसर्च प्रोजेक्ट एजेंसी (डीएआरपीए) की तर्ज वाले मॉडल के पक्ष में है. अगर यह मॉडल काम कर जाता है, तो डीआरडीओ उन्नत तकनीकों वाले रक्षा उपकरणों मसलन एयरक्राफ्ट के इंजनों और हाइपरसोनिक हथियारों पर ध्यान केंद्रित करेगा और आला किस्म की प्रौद्योगिकियों को भारतीय उद्योगों पर छोड़ा जाएगा
डीआरडीओ विकास सह उत्पादक साझीदार (डीसीपीपी) पर जोर दे रहा है, इससे निजी क्षेत्र भी मिसाइल सिस्टम के विकास में भागीदार हो सकेगा और साथ ही उसका निर्माण भी कर सकेगा. एजेंसी प्रौद्योगिकी और पेटेंट का हस्तांतरण निजी क्षेत्र को मुफ्त में करेगा और स्वदेशी रक्षा उत्पादन को बढ़ावा देगा.
पांचवी पीढ़ी के एडवान्स्ड मीडियम लड़ाकू जहाजों का डिजाइन डीआरडीओ में तैयार हो रहा है और यह विशेष उद्देश्यों वाला विमान होगा जिसमें डीआरडीओ, एचएएल और दो निजी कंपनियां शामिल हैं और इसमें 75 फीसद फंडिंग सरकार से होगी. रक्षा मंत्रालय में यह बदलाव की बयार है, पर अभी यह देखना बाकी है कि यह कितना असरदार साबित होगा.
स्वदेशी पर निगाह
रक्षा के लिए पूंजी परिव्यय का 68 % मेक इन इंडिया के लिए अलग रखा गया
असर: स्थानीय खरीद का स्थानीय उद्योगों, सीडिंग इकोसिस्टम और घरेलू बाजार में रोजगार पैदा करने पर अच्छा असर पड़ता है
रक्षा अनुसंधान एवं विकास बजट का 25 % निजी उद्योगों, स्टार्ट-अप और अकादमिक कार्यों के लिए निर्धारित
असर: प्रौद्योगिकी विकास को आगे बढ़ाने वाले रक्षा स्टार्ट-अप और एमएसएमई के लिए पूंजी तक पहुंच की बाधा दूर होगी
रक्षा प्रणालियों और प्लेटफार्मों के परीक्षण तथा प्रमाणन की स्थापना के लिए नोडल निकाय
असर: रक्षा नवाचारों के तेज प्रोसेसिंग को सक्षम बनाएगा और उपकरणों को योग्य बनाने में निजी अनुसंधान और विकास की व्यवस्था को मदद करेगा
रक्षा के लिए पूंजी परिव्यय का 68 % मेक इन इंडिया के लिए अलग रखा गया
असर: स्थानीय खरीद का स्थानीय उद्योगों, सीडिंग इकोसिस्टम और घरेलू बाजार में रोजगार पैदा करने पर अच्छा असर पड़ता है
रक्षा अनुसंधान एवं विकास बजट का 25% निजी उद्योगों, स्टार्ट-अप और अकादमिक कार्यों के लिए निर्धारित
असर: प्रौद्योगिकी विकास को आगे बढ़ाने वाले रक्षा स्टार्ट-अप और एमएसएमई के लिए पूंजी तक पहुंच की बाधा दूर होगी
रक्षा प्रणालियों और प्लेटफार्मों के परीक्षण तथा प्रमाणन की स्थापना के लिए नोडल निकाय
असर: रक्षा नवाचारों के तेज प्रोसेसिंग को सक्षम बनाएगा और उपकरणों को योग्य बनाने में निजी अनुसंधान और विकास की व्यवस्था को मदद करेगा
''देश के अनुसंधान और विकास आधार का विस्तार सभी हितधारकों अकादमिक, आरऐंडडी संगठन और उद्योग के साथ समन्वयकारी नजरिए के साथ किया जा सकता है. देश के भीतर एडवांस्ड सिस्टम का विकास करने और निर्यात के लिहाज से भी यह बहुत महत्वपूर्ण है’’
—जी. सतीश रेड्डी चेयरमैन, डीआरडीओ
10% की वृद्धि हुई है रक्षा बजट में बीते साल के मुकाबले. 4.78 लाख करोड़ रु. से बढ़कर यह 5.25 लाख करोड़ रु. हुआ.