नौकरशाहीः तैनाती पर तनातनी

अखिल भारतीय सेवाओं के अफसरों को अनिवार्य केंद्रीय प्रतिनियुक्ति पर बुलाने की नई दिल्ली की मांग ने केंद्र-राज्य के बीच एक और विवाद की आग सुलगा दी है.

नरेंद्र मोदी
नरेंद्र मोदी

केंद्र सरकार के कार्मिक और प्रशिक्षण विभाग (डीओपीटी) की तरफ से भेजी गई 12 जनवरी की चिट्ठी से राज्यों में आक्रोश की लहर दौड़ गई है. चिट्ठी में अखिल भारतीय सेवाओं (एआइएस) के अफसरशाहों के बंटवारे की व्यवस्था में बदलाव के प्रस्ताव पर 25 जनवरी तक राज्यों का जवाब मांगा गया है. एआइएस में भारतीय प्रशासनिक सेवा (आइएएस), भारतीय पुलिस सेवा (आइपीएस) और भारतीय वन सेवा (आइएफएस) आती हैं.

डीओपीटी ने यह चिट्ठी केंद्रीय मंत्रालयों में एआइएस अधिकारियों की कथित कमी के बाद लिखी. यह कहती है कि राज्य ''केंद्रीय प्रतिनियुक्ति के लिए पर्याप्त संख्या में अधिकारी प्रायोजित नहीं कर रहे हैं’’, जिससे केंद्र सरकार की जरूरत पूरी नहीं हो पा रही है. उसने पहले भी चिट्ठियां (20 और 27 दिसंबर और 7 जनवरी को) लिखकर राज्यों की टिप्पणियां मांगी, लेकिन उनका कम ही जवाब आया.

लिहाजा उसने 12 जनवरी की चिट्ठी में प्रस्ताव दोहराया. पिछले साल डीओपीटी ने राज्यों को चेताया था कि पर्याप्त अधिकारी नहीं भेजने का असर भविष्य मंं काडर समीक्षा के प्रस्तावों पर पड़ सकता है. केंद्र विभिन्न मंत्रालयों में डायरेक्टर और जॉइंट सेक्रेटरी स्तर के पद नहीं भर पा रहा है.

केंद्रीय सचिवालय सेवा (सीएसएस) के खाली पड़े पदों में 390 जॉइंट सेक्रेटरी स्तर (19 साल से अधिक अनुभव) के और 540 डिप्टी सेक्रेटरी (नौ साल) या डायरेक्टर रैंक (14 साल की सेवा) के हैं. अब आइएएस (काडर) नियम 1954 के नियम-6 को संशोधित करने का कदम दांव पर लगा है, जो आइएएस की केंद्रीय प्रतिनियुक्ति का प्रावधान करता है. इसके अनुसार, एआइएस अधिकारी को संबंधित राज्य सरकार की सहमति (एनओसी) से केंद्र में पदस्थ किया जा सकता है.

डीओपीटी राज्यों से केंद्रीय प्रतिनियुक्ति पर जाने के इच्छुक एआइएस अधिकारियों के नामों की सालाना सूची भेजने के लिए कहता है. उसमें से फिर वह अफसरों का चयन करेगा. नया प्रस्ताव केंद्रीय प्रतिनियुक्ति पर अफसरों की लगातार कमी की वजह से भेजा गया. देश में करीब 5,200 आइएएस अधिकारी हैं, जिनमें से 1 जनवरी, 2021 तक मात्र 458 आइएएस अधिकारी केंद्रीय प्रतिनियुक्ति पर थे.

नौकरशाहीः तैनाती पर तनातनी

कुछ राज्यों ने वाकई बहुत कम अफसरों को केंद्र में प्रतिनियुक्ति के लिए नामित किया है. मध्य प्रदेश (370 आइएएस अफसरों में से केवल 24 केंद्रीय प्रतिनियुक्ति पर) पश्चिम बंगाल (298 में से 28), राजस्थान (241 में से 12) और तेलंगाना (164 में से नौ) का नाम इस सूची में विशेष है. दरअसल, अनिवार्य आरक्षित के प्रतिशत के रूप में वास्तविक प्रतिनियुक्तियां 2014 में 69 फीसद से गिरकर 2021 में 30 फीसद पर आ गईं, जिससे लगता है कि डीओपीटी की चिंता जायज है. 

पहले के बदलाव
डीओपीटी एक दशक से भी कम समय में दो अहम बदलाव पहले ही कर चुका है. अगस्त 2017 में केंद्र सरकार ने जहिर तौर पर अफसरशाही का राष्ट्रीय एकीकरण सुनिश्चित करने और सेवाओं का अखिल भारतीय चरित्र पक्का करने के लिए काडर आवंटन नीति में संशोधन किया. मौजूदा राज्य काडर को पांच क्षेत्रों में बांट दिया गया.

नीति के तहत अभ्यर्थी को पहले घटती वरीयता के क्रम में क्षेत्रों के बीच से अपनी पसंद बतानी होती है. इसके बाद उसे प्रत्येक चुने गए क्षेत्र से पसंद का काडर बताना होता है. प्रत्येक पंसदीदा क्षेत्र के लिए दूसरी काडर पसंद उसके बाद बताई जाती है. सूची के खत्म होने तक यह प्रक्रिया चलती रहती है. उसके बाद किसी बदलाव की इजाजत नहीं दी जाती.

अधिकारी आवंटित काडर में काम करते रहते हैं या भारत सरकार में प्रतिनियुक्त कर दिए जाते हैं. केंद्र में अधिक अफसर पक्के करने की खातिर 2020 में डीओपीटी ने 2007 बैच के बाद के आइएएस अधिकारियों के लिए केंद्र में डिप्टी सेक्रेटरी के स्तर पर कम से कम तीन साल या उससे अधिक काम करना अनिवार्य कर दिया ताकि जॉइंट सेक्रेटरी, एडिशनल सेक्रेटरी या सेक्रेटरी के रूप में अधिक ऊंचे पदों पर उनके मनोनयन और नियुक्ति पर विचार किया जा सके.

अब अधिकारी को केंद्रीय प्रतिनियुक्ति पर भेजने में राज्यों की ओर से देरी करने पर दिल्ली सर्वोपरि अधिकार हासिल करना चाहती है. उसने प्रस्ताव किया है कि ''अधिकारी केंद्र सरकार की ओर से निर्दिष्ट की गई तारीख से काडर से कार्यमुक्त हो जाएगा.’’

समस्या यह है कि बहुत सारे अफसर राज्यों में रहने में ही सुकून महसूस करते हैं. मगर एआइएस अधिकारियों की केंद्रीय प्रतिनियुक्ति, चाहे वे आइएएस अधिकारी हों या आइपीएस, अधिकारियों का दोतरफा आवागमन सुनिश्चित करती है, जो केंद्र सरकार के साथ राज्यों के लिए भी फायदेमंद है. इससे अधिकारियों की अधिकार क्षेत्र की विशेषज्ञता में इजाफा और अनुभव व्यापक होता है.

लड़ाकू संघवाद
राज्य अलबत्ता इस कदम को संदेह से देखते हैं. पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी पहली मुख्यमंत्री हैं जिन्होंने 13 जनवरी को प्रधानमंत्री को लिखी चिट्ठी में अपना विरोध जोरदार ढंग से रखा. इस मुद्दे पर अपने तीसरे पत्र में उन्होंने इस कदम को अत्यंत क्रूर बताया और कहा कि प्रस्तावित संशोधन ''सहकारी संघवाद की भावना’’ के खिलाफ है, ''मामले को गैर-संघीय पराकाष्ठा पर ले जाता है’’ और इसके अलावा ''भारत की संवैधानिक योजना के मूल ढांचे’’ के खिलाफ है.

बनर्जी अच्छी तरह जानती हैं कि केंद्रीय हस्तक्षेप के क्या मायने हो सकते हैं. पिछले साल डीओपीटी ने यास तूफान की समीक्षा के लिए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के साथ बैठक से मुख्यमंत्री के कथित तौर पर किनारा कर लेने के कुछ ही घंटों बाद पश्चिम बंगाल के चीफ सेक्रेटरी अलपन बंद्योपाध्याय को दिल्ली अपने दफ्तर में रिपोर्ट करने का निर्देश दिया था. कभी केंद्रीय प्रतिनियुक्ति पर नहीं रहे 1987 बैच के इस आइएएस अधिकारी को 31 मई को सेवामुक्त होना था. अब वे केंद्र के खिलाफ केस लड़ रहे हैं.

केंद्र के प्रस्ताव ने अन्य मुख्यमंत्रियों को भी इस समूहगान में शामिल होने के लिए उकसा दिया है. तमिलनाडु के एम.के. स्टालिन कहते हैं कि यह केंद्र को किसी भी अधिकारी को संबंधित राज्य की सहमति के बिना सूचीबद्ध करने का अधिकार देता है और उन्हें ''किसी भी केंद्र सरकार के हाथों दंडित होने के लगातार डर में’’ रखता है.

झारखंड के हेमंत सोरेन का कहना है कि यह आइएएस अधिकारियों के भीतर भय की मानसिकता उत्पन्न करेगा और उनकी ''वस्तुपरकता, कार्य प्रदर्शन और कार्य क्षमता’’ पर प्रतिकूल असर डालेगा और उन्हें मामलों में खरी-खरी राय देने से रोकेगा क्योंकि इसे ''केंद्र-राज्य विवादों के संवेदनशील मामलों में पक्ष लेने’’ की तरह देखा जा सकता है.

अन्य मुख्यमंत्री संघीय भावना की दुहाई देते हैं और इसे राज्यों को अधिकार कम करने की चेष्टा बताते हैं. छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री भूपेश बघेल आगाह करते हैं कि अगर इसे लागू किया गया तो राज्यों की प्रशासनिक व्यवस्था ध्वस्त हो सकती है. वे दावा करते हैं कि इस संशोधन की वजह से विभिन्न अहम पदों पर तैनात अफसरों को अस्थिरता और अस्पष्टता का एहसास होगा.

वे कहते हैं, ''अपने कर्तव्यों का निर्वहन करते हुए वे पसोपेश में पड़ जाएंगे और राजनैतिक हस्तक्षेप के कारण उनके लिए खासकर चुनावों के समय निष्पक्ष रूप से काम कर पाना संभव नहीं होगा.’’ विरोध मोटे तौर पर बेशक गैर-भाजपा शासित राज्यों से ही है.

राज्य इस बात से सबसे ज्यादा परेशान हैं कि नई दिल्ली जहां प्रतिनियुक्त किए जाने वाले अधिकारियों की संख्या के बारे में राज्य की सलाह मांगती है, वहीं असहमति की स्थिति में वह सर्वोपरि अधिकार चाहती है. आइपीएस और आइएफएस अफसरों के लिए भी ऐसे ही प्रस्तावों के चलते राज्यों को आशंका है कि यह उनके संविधान प्रदत्त अधिकार को कुचलने की कोशिश है.

अधिकारियों का दर्द
अफसरशाह पसोपेश में हैं और अकेले में उन्हें डर है कि प्रस्तावित बदलावों से वे बदले की कार्रवाई के शिकार हो सकते हैं. बड़ी चिंता यह है कि केंद्र सरकार केंद्रीय दायित्व के लिए किसी भी अधिकारी की सेवा हासिल करने का अधिकार अनधिकृत रूप से हड़प रही है. इसका नतीजा यह होगा कि प्रतिद्वंद्वी पार्टी की सरकार के करीब माने जाने वाले अफसरशाह को दंड स्वरूप दिल्ली लाया जा सकता है.

मगर कुछ अफसर प्रस्ताव का समर्थन भी करते हैं. अभी अध्ययन अवकाश पर चल रहे 1994 बैच के आइएएस अधिकारी श्रीवत्स कृष्णा कहते हैं, ''केंद्र और राज्यों के बीच सौहार्द और सहयोग, संघवाद की तरह, एकतरफा निर्मित नहीं हो सकता. भारत सरकार महज 458 आइएएस अधिकारियों के साथ असरदार ढंग से नहीं चल सकती.

राजकाज की गुणवत्ता, नीति बनाने और उन्हें लागू करने दोनों के लिहाज से, बहुत अधिक उन हाथों पर निर्भर है जो इसका संचालन करते हैं.’’ वे कहते हैं कि एआइएस अफसरों को राज्य सेवा मानने वाला कोई भी राज्य मौजूदा नियमों का उल्लंघन कर रहा है. यही नहीं, वे सवाल करते हैं कि क्या भारत सरकार को विशेष स्थितियों के लिए विशिष्ट अधिकारियों को चुनने का विकल्प नहीं होना चाहिए, खासकर अब जब वे निजी क्षेत्र से पेशेवरों को ला रहे हैं?

अलबत्ता कई अफसर केंद्र की मंशाओं को लेकर चौकन्ने हैं. सेवानिवृत्त अफसर और लेखक एम.जी. देवसहायम अफसोस के साथ कहते हैं, ''भारत राज्यों का संघ है और इस तरह हमारे यहां केंद्र सरकार है. कोशिश यह की जा रही है कि अखिल भारतीय सेवा को एक केंद्रीय सत्ता के मातहत ले आया जाए.’’

दूसरों का कहना है कि समस्या कहीं ज्यादा गहरी है और पहले से ही बहुत कुछ अपने हिसाब से ढाल ली गई सिविल सेवा को अनिवार्य रूप से अधीन बनाने से जुड़ी है. राजस्थान के सेवानिवृत्त आइएएस अधिकारी अजित कुमार सिंह सवाल करते हैं, ''जब केंद्र खुद बाहर से अफसर लाने पर जोर दे रहा है, तो अनिच्छुक अफसरों को प्रतिनियुक्ति पर बुलाने की जरूरत ही क्या है?

यह कदम आइएएस अधिकारियों का मनोबल तोड़ देगा और सेवाएं समय के साथ अपनी चमक खो देंगी. अदूरदर्शी फैसले राज्यतंत्र को लंबे समय के नुक्सान ही पहुंचा सकते हैं.’’

फिर भी दूसरों का कहना है कि समस्या यह है कि बहुतायत अधिकारी अपने राज्य से बाहर काम नहीं करना चाहते. इसके दो कारण हैं. एक तो मनोनयन की प्रक्रिया ही केंद्र सरकार में जाने वाले अफसरों के खिलाफ है. दूसरे, काडर राज्य में आराम विकसित कर लेता है और अज्ञात (केंद्र) को स्वीकार करना नहीं चाहता. नतीजा यह है कि एआइएस प्रभावी तौर पर प्रांतीय सेवा बनकर रह गई है.

आंध्र प्रदेश काडर से सेवानिवृत्त हुए पी.वी. रमेश जोर देकर कहते हैं, ''सिविल सेवा में योग्यता का कोई लाभ नहीं है. परेशानी यह है. बाहर से इसकी मांग होने के बजाए यह खुद पर थोपी गई खूबी या गुण है. आका केवल आज्ञापालन की मांग करते हैं.’’ वे कहते हैं कि लोग आइएएस को फौलादी ढांचा कहा करते थे, लेकिन असल में यह कोई ढांचा ही नहीं है. वे अफसरशाहों की तुलना कटोरे में रखे और अलग-अलग दिशाओं में भागते बहुत-से अमीबा से करते हैं.

रमेश राजकाज का पूरा ढांचा सुधारने का सुझाव देते हैं (जिसकी पिछले 75 साल से कोई कोशिश नहीं की गई), क्योंकि आइएएस 1.4 अरब लोगों के जटिल देश के लिए बहुत अदने हैं. उनका समाधान यह है—पहले 12 से 14 साल के लिए काडर आवंटित मत कीजिए क्योंकि तब आपसे फील्ड में सेवा देने और अगले स्तर के लिए अपनी प्रेरणा कमाने की उम्मीद की जाती है.

उस चरण में एक स्वतंत्र राष्ट्रीय सिविल सेवा प्राधिकार को यूपीएससी के साथ काम का मूल्यांकन करने दीजिए और फिर तय कीजिए कि हरेक को किस दिशा में जाना चाहिए. साथ ही अधिकारियों के लिए साल-दो साल तक केंद्र सरकार के साथ काम करना अनिवार्य कर दीजिए और इसे पूरा करने के बाद ही अधिकारी को राज्य आवंटित किया जाना चाहिए.

उनका मानना है कि अखिल भारतीय सेवा में कर्मचारी की स्थिति राष्ट्रीय होनी चाहिए, ताकि एक ऐसी अफसरशाही हो जो स्वतंत्र हो और राष्ट्र निर्माण के उद्यम का हिस्सा होते हुए भी कानून के शासन के पक्ष में खड़ी हो सके. 

—साथ में अमिताभ श्रीवास्तव, रोहित परिहार और रोमिता दत्ता

''भारत सरकार महज 458 आइएएस अफसरों के साथ असरदार ढंग से नहीं चल सकती. राजकाज की गुणवत्ता, नीति बनाने और इन्हें लागू करने दोनों के लिहाज से बहुत कुछ उन हाथों पर निर्भर है जो इसका संचालन करते हैं ‘’
तीनों सेवाओं का डील-डौल
किस तरह राज्यों व केंद्र के बीच आइएएस, आइपीएस और आइएफएस अफसरों का बंटवारा होता है

आइएएस
कुल 
अफसर  5,231
 केंद्र सरकार 
में तैनात 458
 राज्यों और यूटी काडर में तैनात  4,773
 राज्यों की सिविल सेवाओं से पदोन्नत आइएएस अफसर 1,316


आइपीएस
 कुल 
अफसर  3,049
 राज्य सिविल सेवाओं के पदोन्नत अफसर 1,060

 अफसर जिनकी केंद्र में प्रतिनियुक्ति पर तैनाती हो सकती है 1,075

आइएफएस
 कुल 
अफसर  2,224
राज्य सिविल सेवाओं से पदोन्नत अफसर 967

अफसर जिनकी केंद्र में प्रतिनियुक्ति पर तैनाती हो सकती है 382.

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