उत्तराखंडः कहर बरपा गई बारिश
भारी बारिश की वजह से मची तबाही में राज्य में करीब 64 लोगों को अपनी जान से हाथ धोना पड़ा, वहीं 11 लोग लापता हैं, वहीं 22 घायल

इस बार सोमवार (18 अक्तूबर) को छोड़कर शुक्रवार (15 अक्तूबर) से लेकर मंगलवार (19 अक्तूबर) तक छुट्टियां होने के चलते इस वीकेंड उत्तराखंड के अधिकतर पर्यटन केंद्र सैलानियों से भरे पड़े थे. लोग राज्य के नैसर्गिक दृश्यों के आनंद में मग्न थे. तीर्थयात्री भी चारधाम की यात्रा में निकल पड़े थे. इस बीच 17 अक्तूबर से पहाड़ों में बारिश शुरू हो गई जिसे महज रूटीन बारिश मानकर लोग इसके बंद होने का इंतजार करने लगे. लेकिन यह बारिश सामान्य नहीं थी. यह बढ़ती ही जा रही थी. बारिश के चलते पहाड़ों में भूस्खलन और रोड बाधित होने के समाचार मिलने शुरू हुए. विभिन्न शहरों-कस्बों से संपर्क कटने लगा. नैनीताल और रामनगर में अचानक पानी फैलने से बाढ़ के हालात पैदा हो गए.
नैनीताल की नैनी झील का पानी उसके चारों तरफ की सड़कों और बस्ती समेत बाजार तक फैलने लगा. झील किनारे अपर मालरोड, लोअर मालरोड, फ्लैट्स मैदान, तल्लीताल बाजार और नैनादेवी मंदिर जलमग्न हो गए. किसी को विश्वास ही नहीं हो रहा था कि नैनीताल में भी ऐसी बाढ़ आ सकती है. प्रशासन ने सिंचाई विभाग के अधिकारियों को झील के दोनों गेट पूरी क्षमता के साथ खोल कर पानी के स्तर को कम करने को कहा. दोनों गेट खोल दिए गए, लेकिन बारिश के लगातार जारी रहने के कारण झील का जलस्तर घटने का नाम नहीं ले रहा था. नैनीताल का यह नजारा देख यहां घूमने आए पर्यटक भी भौचक्के रह गए. नैनीताल के सभी मार्ग खतरनाक भूस्खलन होने से अवरुद्ध हो गए थे. पर्यटकों को होटलों में ही कैद रहना पड़ा. ऐसे में प्रशासन को सेना बुलानी पड़ी. सेना ने बाजारों के दुकानों में कैद हो गए दुकानदारों और पर्यटकों को रेस्क्यू किया.
ऐसा ही नजारा रामनगर-रानीखेत रोड के बीच रामनगर से 25 किलोमीटर दूर मोहान का भी था. मोहान में कोसी नदी का पानी घुस आने से वहां बने कई होटल और रिजॉर्ट्स को जलमग्न हो रहे थे. यहां 18 अक्तूबर को लेमन ट्री नामक रिजॉर्ट में एक शादी के सिलसिले में दिल्ली, गाजियाबाद और मुरादाबाद से करीब 150 मेहमान पहुंचे हुए थे. लेकिन मंगलवार की सुबह जब उन्होंने आंखें खोली तो वे चारों तरफ से पानी में घिर चुके थे. रिजॉर्ट के चारों तरफ पानी घुसने से उनके वाहन जलमग्न हो गए थे. ऐसा नजारा देखकर सभी लोगों में डर का माहौल पैदा हो गया. प्रशासन और राज्य आपदा रिस्पॉन्स फोर्स (एसडीआरएफ) की टीमों ने ट्रैक्टरों और अन्य माध्यमों से रिजॉर्ट में फंसे लोगों को सकुशल बाहर निकाला.
मौसम विज्ञान केंद्र के निदेशक एवं वरिष्ठ मौसम विज्ञानी विक्रम सिंह के मुताबिक, अटलांटिक और भूमध्य सागर से चली हवाओं के चलते पश्चिमी विक्षोभ की सक्रियता से यह बारिश हुई. ये हवाएं अफगानिस्तान, पाकिस्तान होते हुए उत्तराखंड पहुंची. पश्चिमी विक्षोभ की सक्रियता और दक्षिणी-पूर्वी हवाओं के मिल जाने से हुई मूसलाधार बारिश ने 100 साल से भी अधिक पुराने रिकॉर्ड को भी तोड़ दिया. कुमाऊं मंडल में इस बारिश ने जमकर तबाही मचाई जिसका मुख्य केंद्र नैनीताल जिला था. इससे पहले नैनीताल जिले के मुक्तेश्वर में 107 साल पहले 18 सितंबर, 1914 को 254.5 मिलीमीटर बारिश दर्ज हुई थी. लेकिन इस बार लगातार 24 घंटे में मुक्तेश्वर में 340.8 मिलीमीटर और नैनीताल में 530 मिमी बारिश रिकॉर्ड की गई. इस बारिश के कारण राज्य को अनुमानित 6 हजार करोड़ रुपए से अधिक का नुक्सान उठाना पड़ा है.
हालांकि, 19 अक्तूबर की शाम से बारिश बंद हो गई, लेकिन इसकी तबाही के निशान यहां-वहां बिखरे पड़े हैं. राज्य में कई सड़कों और पुलों को नुक्सान पहुंचा है. गौला नदी पर बने पुल का संपर्क मार्ग बह गया. पूरे उत्तराखंड में दो दिनों के भीतर मकान ढहने, भूस्खलन की वजह से घरों के गिरने और उसकी चपेट में आने तथा पानी के प्रवाह में बह जाने से 64 लोगों को जान से हाथ धोना पड़ा. वहीं, 11 लोग अब भी लापता हैं और 22 लोग घायल हैं. बारिश की वजह से 34 से अधिक लोगों की जान अकेले नैनीताल जिले में गई है. वहीं, 50 करोड़ रूपए से अधिक की सरकारी संपत्ति बर्बाद हुई है. नैनीताल के जिलाधिकारी ने आपदा से हुए नुक्सान के आकलन के लिए प्रशासन की 20 टीमें गठित की है, जो नुक्सान का आकलन कर जिला प्रशासन को रिपोर्ट देंगी.
बारिश की वजह से हालात ऐसे हो गए थे कि राज्य सरकार ने दो वायु सेना के हेलिकॉप्टर पंतनगर एयरपोर्ट पर खड़े करवाए. उनकी मदद से रामनगर के सुंदरखाल क्षेत्र में कोसी की बाढ़ से घिरकर फंसे ग्रामीणों को निकाला गया. शारदा नदी के टनकपुर क्षेत्र के बाढ़ से घिरे लोगों को भी उससे निकाला गया. हालांकि, कई जगहों पर लोग पानी से घिरे अब भी परेशान हैं. 20 अक्तूबर को रामनगर के समीप चुकम गांव के ग्राम प्रधान लक्ष्मण सिंह ने बताया कि उनके गांव के लोगों ने कोसी नदी का पानी गांव में घुसने की वजह से पूरी रात जंगल में बिताई. गांव के 25 घर पानी के बहाव में बह गए. गांव तक जाने का आज तक कोई रास्ता नहीं बना है और लोग कोसी नदी के पानी के बढ़ने पर आज भी दहशत में आ जाते हैं. यह गांव कई बार बाढ़ की विभीषिका झेल चुका है.
राज्य के उच्च हिमालयीय क्षेत्रों में ट्रेकिंग और माउंटेनियरिंग करने आए दल भी बारिश के बाद फंस गए थे. गंगोत्री में बारिश और बर्फबारी के कारण 30 पर्यटकों का एक दल 18 अक्तूबर की रात भर देवगाड़ के पास फंसा रहा. उसे दूसरे दिन पुलिस ने निकाला. उत्तरकाशी जिले से हिमाचल की तरफ ट्रेक करके जाने के प्रयास में 11 सदस्यीय एक ट्रेकिंग दल लापता हो गया. बागेश्वर जिले के सुंदरढूंगा ग्लेशियर के ट्रैक को गए चार ट्रेकर की मौत हो गई. इसी जिले में कफनी ग्लेशियर ट्रेक को गए 20 ट्रेकर लापता हो गए. उत्तरकाशी की चीन सीमा पर आइटीबीपी की पेट्रोलिंग के साथ गए तीन पोर्टर मृत मिले.
हरिद्वार में भी गंगा नदी का जलस्तर 19 अक्तूबर को चेतावनी के निशान, 294 मीटर से लगभग 0.35 सेंटीमीटर ऊपर था. ठीक 17 साल पहले अक्तूबर में ही 19 और 20 तारीख को गंगा खतरे के निशान को पार कर गई थी. लेकिन, तब इस तरह खतरनाक हालात नहीं बने थे. वहीं, ऋषिकेश में गंगा का जलस्तर बढ़ने से राफ्टिंग को रोकना पड़ा, जो कि हजारों लोगों के लिए रोजगार का साधन है. हजारों पर्यटक बुकिंग होने के बावजूद राफ्टिंग किए बगैर वापस लौट रहे हैं. इससे राफ्टिंग संचालकों को भी नुक्सान हो रहा है. वहीं, मैदानी क्षेत्रों में धान की फसल भी बारिश की भेंट चढ़ गई, जिससे किसानों को भारी नुक्सान झेलना पड़ रहा है.
राज्य में मची तबाही की गंभीरता को देखते हुए केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने भी आपदा प्रभावित क्षेत्रों का दौरा किया. 20 अक्तूबर से मौसम खुल गया है, लेकिन सड़क नेटवर्क पूरी तरह बहाल नहीं होने के कारण लोग अब भी जगह-जगह फंसे हुए हैं. जाहिर है, इस बेमौसम बारिश ने एक बार फिर उत्तराखंड को सांसत में डाल दिया.