प्रधान संपादक की कलम से

भारत ने अपनी अर्थव्यवस्था में पिछले चार दशकों की सबसे बड़ी सिकुड़न का सामना किया. दूसरी ओर, आक्रामक चीन के उभार से पैदा भूराजनैतिक बदलाव ने जलवायु परिवर्तन सरीखी मौजूदा चुनौतियों को और बढ़ा दिया है.

विभाजन की दीवारें कैसे ढहाएं?
विभाजन की दीवारें कैसे ढहाएं?

अरुण पुरी

अब से पांच महीने बाद हम अपने समय की एक सबसे निर्णायक घटना—कोरोनावायरस महामारी—की दूसरी सालगिरह मनाएंगे. विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यूएचओ) की तरफ से कोविड-19 के प्रकोप को वैश्विक महामारी घोषित किए जाने के बाद इन 19 महीनों में इस वायरस ने दुनिया भर में 50 लाख से ज्यादा लोगों की जानें लीं और करीब 40 खरब डॉलर के आर्थिक उत्पादन का नुक्सान किया. दूसरे विश्व युद्ध के बाद से इतने व्यापक पैमाने पर तबाही और कोई नहीं मचा सका था. गौर करने वाली बात यह है कि हम इससे अभी भी पूरी तरह बाहर नहीं आ पाए हैं.

कई वजहें हैं जो अभी भी चिंता का सबब हैं तो दूसरी कई वजहें उम्मीद जगाने वाली भी हैं. जिस तेज रफ्तार के साथ हमने वायरस से लड़ने के लिए कई वैक्सीन तैयार कीं और जिस रफ्तार से हमने इसका इस्तेमाल कर लोगों का टीकाकरण कराया, उसमें इनसानी जज्बे की फतह साफ तौर पर देखी जा सकती है.

इंडिया टुडे कॉन्क्लेव पिछले साल, डब्ल्यूएचओ की तरफ से वैश्विक महामारी के अलार्म के महज दो दिन बाद यानी 13 और 14 मार्च को होना तय था. हमें उसे रद्द करना पड़ा. उसके बाद से हमने महामारी को विश्व अर्थव्यवस्था में उथल-पुथल मचाते और दुनिया भर में आपूर्ति शृंखलाओं को तहस-नहस करते देखा.

भारत ने अपनी अर्थव्यवस्था में पिछले चार दशकों की सबसे बड़ी सिकुड़न का सामना किया. दूसरी ओर, आक्रामक चीन के उभार से पैदा भूराजनैतिक बदलाव ने जलवायु परिवर्तन सरीखी मौजूदा चुनौतियों को और बढ़ा दिया है.

इस तरह से उपजे चौतरफा संकट ने खासी अनिश्चितता वाली स्थिति पैदा कर दी. महामारी से पहले वाली सामान्य जिंदगी में हाल-फिलहाल लौट पाने की संभावना नजर नहीं आती. इसकी बजाए जिस स्थिति के बारे में हम यथार्थपरक ढंग से अनुमान लगा सकते हैं और जिसे हमने इस साल अपनी कॉन्क्लेव की थीम चुना, वह है 'अ बेटर नॉर्मल' या कि एक बेहतर सामान्य स्थिति.

पिछली बातों में अटके रहने की बजाए हमने आगे देखने का निर्णय किया. खास और जानी-मानी 78 शख्सियतें हमारे कॉन्क्लेव में इकट्ठा हुईं, जो अब तक की सबसे ज्यादा संख्या है. उन्होंने हमें बताया कि यह बेहतर सामान्य क्या हो सकता है और आगे की राह की सबसे अहम चुनौतियों पर भी रोशनी डाली.

मसलन, केंद्रीय वाणिज्य और उद्योग मंत्री पीयूष गोयल ने 197 अरब डॉलर के निर्यात और सेवा क्षेत्र में आई तेजी की तरफ इशारा करते हुए ऐलान किया कि आर्थिक बहाली बस होने ही वाली है. सेंसेक्स ने हाल ही में 60,000 का निशान पार किया है, ऐसे माहौल में शानदार निवेशक राकेश झुनझुनवाला ने कहा कि भारत की ग्रोथ स्टोरी को लेकर वे खासे आशावान हैं.

पूर्वी लद्दाख के सरहदी छोर पर चीन की पीपल्स लिबरेशन आर्मी की तरफ से पिछले 17 महीनों से चली आ रही जबरदस्त सैन्य लामबंदी हमारी सुरक्षा-कूटनीति की सबसे बड़ी चुनौतियों में से है. विदेश मंत्री एस. जयशंकर ने हमें बताया कि बीजिंग के साथ रिश्ते तभी सामान्य हो सकते हैं जब पीएलए अपनी सैन्य टुकड़ियां हटा ले, ''उन्हें (चीन को) चाहिए कि (शांति और अमन-चैन के) समझौतों पर टिके रहें और जो सही है वह करें.''

जलवायु परिवर्तन पर युवा विशेषज्ञों के हमारे पैनल ने हमें बताया कि जलवायु परिवर्तन को राष्ट्रीय और वैश्विक पैमाने पर फौरन प्राथमिकता देने की जरूरत है. ऐसा इसलिए क्योंकि जितना लंबा इंतजार हम करेंगे, नुक्सान उतने ही अमिट और स्थायी होते जाएंगे. यह महामारी के हमारे जवाब और जन स्वास्थ्य को नए सिरे से प्राथमिकता देने के बारे में भी इतना ही सच हो सकता है.

यह आसान काम नहीं होने जा रहा है, जैसा कि बिल ऐंड मेलिंडा गेट्स फाउंडेशन के सह-अध्यक्ष बिल गेट्स ने हमें बताया कि जलवायु परिवर्तन के मामले में वैक्सीन ईजाद करने सरीखे कोई तुरत-फुरत समाधान नहीं हैं. हरित साधन अपनाने या कार्बन उत्सर्जन को शून्य तक घटाने की कीमत अमीर देशों तक को गवारा नहीं है, भारत सरीखे मध्यम आय वाले देशों की तो बात ही क्या करें.

सड़क परिवहन और राजमार्ग मंत्री नितिन गडकरी ने हमें बताया कि भारत की सबसे बड़ी परेशानी फिलहाल प्रदूषण है, जिसके लिए इंटरनल कंबस्शन या आंतरिक दहन इंजनों को ई-वाहनों से बदलने की जरूरत है.

हमने ड्रोन, यूनिकॉर्न और क्रिप्टोकरेंसियों, ओटीटी के हमारे नए सितारों और कुछ बेहद उम्दा ऑनलाइन शो निर्माताओं जैसे सरीखे नए रुझानों की भी पड़ताल की. ओलंपिक में व्यक्तिगत श्रेणी में स्वर्ण पदक जीतने वाले हमारे सिर्फ दो खिलाड़ियों—अभिनव बिंद्रा और नीरज चोपड़ा—ने प्रतिस्पर्धा में उतरने को लेकर अपने दो नितांत अलग-अलग तरह के नजरियों का खुलासा किया.

संक्षेप में, बेहतर सामान्य के लिए जद्दोजहद करते हुए हम इस नई उम्मीदों भरी दुनिया का कैसे निर्माण करते हैं, यह हमारी मानव पूंजी से तय होना है. जैसा कि इंग्लैंड की नेशनल हेल्थ सर्विस के चेयरमैन सर मैल्कम ग्रांट ने हमसे कहा: ''बात न तो अस्पतालों की है, न उपकरणों-औजारों की है.

यहां तक कि पैसा भी उतना बड़ा मुद्दा नहीं. बात लोगों की है, स्वास्थ्य सेवा में लगे प्रोफेशनल्स की है, जो प्रभावी स्वास्थ्य तंत्र और नाकारा स्वास्थ्य तंत्र के बीच फर्क पैदा करते हैं.'' सर ग्रांट तो वैसे महामारी के संदर्भ में ये बातें कह रहे थे, लेकिन ये तो भविष्य में हमारे सामने आने वाली कमोबेश हर तरह की चुनौतियों के बारे में सटीक बैठ सकती हैं.

Read more!