उत्तराखंडः कोरोना टेस्ट फर्जीवाड़ा

सवाल यह है कि जब निजी कंपनी को इतने बड़े स्तर पर कोरोना जांच करने की जिम्मेदारी सौंपी गई थी, उसके पते की जांच क्यों नहीं की गई?

लापरवाही या साजिश हरिद्वार में कुंभ के दौरान जांच के लिए बने निजी लैब्स के कलेक्शन सेंटर
लापरवाही या साजिश हरिद्वार में कुंभ के दौरान जांच के लिए बने निजी लैब्स के कलेक्शन सेंटर

हरिद्वार कुंभ में कोरोना टेस्ट जांच फर्जीवाड़ा सामने क्या आया, प्रदेश के मुख्यमंत्री तीरथ सिंह रावत और पूर्व मुख्यमंत्री त्रिवेंद्र सिंह रावत आमने-सामने आ गए. मुख्यमंत्री तीरथ कह गए कि यह फर्जीवाड़ा उनके कार्यकाल का नहीं है तो पूर्व मुख्यमंत्री ने कह दिया न्यायिक जांच कराओ तो सब सामने आ जाएगा. एक ही पार्टी के पूर्व और वर्तमान मुख्यमंत्रियों के इस आपसी संग्राम में कुछ मंत्री भी वर्तमान मुख्यमंत्री के पक्ष में खड़े दिखे. त्रिवेंद्र ने कोरोना टेस्ट फर्जीवाड़े पर यह कह के आग में घी डाल दिया कि वे तो हट चुके थे, मौजूदा सरकार जाने. तीरथ ने भी बिना लाग-लपेट के जवाब दे दिया कि टेस्ट का काम देने का काम उनके सीएम बनने से पहले पूरा हो चुका था, ''मैंने तो मामले की सुगबुगाहट पर जांच बिठाई.''

उत्तराखंड कोविड कंट्रोल रूम के प्रभारी डॉ. अभिषेक त्रिपाठी की पड़ताल में पहली नजर में निजी फर्मों की लगभग एक लाख जांच रिपोर्ट के फर्जी होने का संदेह जताया गया. डॉ. त्रिपाठी ने सरकार को सौंपी अपनी रिपोर्ट में मामले को गंभीर बताकर इसकी विस्तृत जांच हरिद्वार के जिलाधिकारी से करवाने की सिफारिश की.

असल में कोरोना टेस्ट के फर्जीवाड़े का खुलासा पंजाब राज्य के फरीदकोट के एक एलआइसी एजेंट विपिन मित्तल की जागरूकता से हो पाया. विपिन मित्तल के मुताबिक, उन्हें उत्तराखंड की एक लैब से फोन आया था कि 'आप की रिपोर्ट निगेटिव आई है.' इससे वे हैरान रह गए, क्योंकि कोरोना की उन्होंने जांच ही नहीं कराई थी. उन्होंने भारतीय चिकित्सा अनुसंधान परिषद (आइसीएमआर) में शिकायत की. आइसीएमआर ने उनकी शिकायत उत्तराखंड स्वास्थ्य महकमे को भेज दी. स्वास्थ्य महकमे में कोविड कंट्रोल के प्रभारी ने छानबीन करनी शुरू की तो बेहद चौंकाने वाले खुलासे होने लगे.

जो लोग कुंभ में आए ही नहीं, उनके नंबरों पर कोरोना रिपोर्ट पहुंच गई. 90 फीसद जो सैंपल लिए दिखाए गए, उनके पते राजस्थान के मिले. जांच से जुड़े एक अधिकारी ने बताया कि हरिद्वार में 'मकान नंबर 5' से ही लगभग 530 सैंपल लिए गए. जांच में यह भी पाया गया कि इसमें 50 से अधिक लोगों का पंजीकरण एक ही फोन नंबर से किया गया था. एक ऐंटीजन टेस्ट किट से 700 सैंपल की टेस्टिंग की गई दिखाई गई थी. कानपुर, मुंबई, अहमदाबाद और 18 अन्य जगहों के लोगों के एक ही फोन नंबर को शेयर किया गया था. एजेंसी में पंजिकृत करीब 200 सैंपल कलेक्टर छात्र और डेटा एंट्री ऑपरेटर या राजस्थान के निवासी निकले, जो कभी हरिद्वार गए ही नहीं थे.

इस घपले को लेकर सोशल डेवलपमेंट फॉर कम्युनिटीज फाउंडेशन के संस्थापक, समाजसेवी अनूप नौटियाल कहते हैं, ''अधिकारी अगर अप्रैल महीने में हरिद्वार समेत प्रदेश के अन्य जनपदों की कोविड जांच के आंकड़ों पर गौर कर लेते तो इस फर्जीवाड़े को रोक सकते थे.'' नौटियाल के अनुसार प्रदेश के 12 जनपदों में 1 अप्रैल से 30 अप्रैल के बीच हुए कोविड जांच के डेटा से पता चलता है कि 58 प्रतिशत टेस्ट हरिद्वार जिले में ही हुए हैं. यह भी कि हरिद्वार में महाकुंभ मेले के दौरान पॉजिटिविटी रेट उत्तराखंड से 80 प्रतिशत कम थी.  

फर्जीवाड़े को लेकर मेला स्वास्थ्य अधिकारी डॉ. अर्जुन सिंह सेंगर का कहना है कि मेला स्वास्थ विभाग की ओर से 11 लैब्स इम्पैनल्ड थे. अब इनकी जांच के लिए एक आंतरिक समिति गठित की गई है. कोविड जांच का लैब्स का बिल करीब 9 करोड़ रुपए का है, सभी पेमेंट रोक दी गई है. लापरवाही की हद यह है कि लैब्स का भौतिक सत्यापन नहीं हुआ था. लेकिन बताया गया है कि ये सब आइसीएमआर से एप्रूव्ड थीं. सवाल यह है कि जब निजी कंपनी को इतने बड़े स्तर पर कोरोना जांच करने की जिम्मेदारी सौंपी गई थी, उसके पते की जांच क्यों नहीं की गई?

मामले के खुलासे से अब यह भी प्रश्न पूछा जाने लगा है कि क्या यह सोची-समझी साजिश का हिस्सा है, ताकि कुंभ पर कोरोना सुपर स्प्रेडर का ठप्पा न लगे? फिलहाल, इस मुद्दे पर भाजपा के वर्तमान और पूर्व मुख्यमंत्री एक-दूसरे से उलझ गए हैं.

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