राजस्थानः क्या कारगर होगा आदिवासी कार्ड?

जयपुर के सम्मेलन में मीणा समुदाय के दो विधायकों ने जनगणना फॉर्म में आदिवासी धार्मिक कोड नाम से एक अलग कॉलम की मांग की

जनता के बीच एक जनसुनवाई के दौरान राजस्थान के मुख्यमंत्री अशोक गहलोत
जनता के बीच एक जनसुनवाई के दौरान राजस्थान के मुख्यमंत्री अशोक गहलोत

राजस्थान में सियासी दलों ने अपने आदिवासी वोट बैंकों को मजबूत करने के लिए आश्चर्यजनक रूप से, धर्म का इस्तेमाल शुरू कर दिया है. विधानसभा चुनाव दिसंबर 2023 में होंगे और उनमें काफी देर है. लेकिन सियासी दलों ने अचानक आदिवासियों पर ध्यान केंद्रित कर दिया है जिनके लिए 25 सीटें आरक्षित हैं और एक दर्जन अन्य सीटों पर वे नतीजों को प्रभावित करने की क्षमता रखते हैं. आदिवासियों यानी अनुसूचित जनजाति (एसटी) के मुद्दों के बीच धर्म को भी ले आना, अपने आदिवासी वोट बैंक को मजबूत करने की सियासी दलों की दीर्घकालिक रणनीति है. साथ ही, कांग्रेस के असंतुष्टों और भाजपा विधायकों ने विधानसभा अध्यक्ष सी.पी. जोशी पर आदिवासियों की आवाज दबाने के आरोप लगाए हैं.

मुख्यमंत्री अशोक गहलोत के विश्वासपात्र विधायक और युवा कांग्रेस प्रमुख गणेश घोघरा ने 9 मार्च को विधानसभा में कहा कि आदिवासी हिंदू नहीं थे और उनकी अपनी अलग संस्कृति है तथा उन पर हिंदू धर्म थोपा जा रहा है. उन्होंने कहा कि शराब की दुकानों को उनके क्षेत्र में आदिवासियों के लिए आवंटित किया जाना चाहिए. उन्होंने कहा कि अगर कोई आदिवासी सरपंच बनता है तो गैर-आदिवासी निर्वाचित प्रतिनिधि उसके साथ भेदभाव करते हैं. भाजपा और उसके विधायक गोपी चंद मीणा ने इसका जोरदार विरोध किया और कहा कि आदिवासी हमेशा से हिंदू थे और रहेंगे. भाजपा तब से कांग्रेस से पूछ रही है कि वह आदिवासियों को हिंदू मानती है या नहीं. उसे लगता है कि कांग्रेस अब उन आदिवासियों के वोट गंवा देगी जो खुद को हिंदू मानते हैं.

इसके कुछ दिनों बाद 13 मार्च को, शक्तिशाली मीणा समुदाय के दो विधायकों—कांग्रेस के गोपाल मीणा और निर्दलीय रामकेश मीणा, ने जयपुर में अपने समुदाय के सम्मेलन में देश की जनगणना फॉर्म में पूरे भारत के लिए आदिवासी धार्मिक कोड नाम से एक अलग कॉलम की व्यवस्था देने की मांग की.

उसी दिन, भाजपा ने इस मुद्दे पर आक्रामक रुख अपनाया और एक सोची-समझी रणनीति के तहत जयपुर में एक सेमिनार आयोजित किया, जहां केंद्रीय मंत्री फग्गन सिंह कुलस्ते ने आदिवासियों को सनातनी हिंदू कहा और अपनी बात को साबित करने के लिए हिंदुओं के समान धार्मिक रीति-रिवाजों का उदाहरण दिया. उन्होंने मीणाओं को विष्णु का वंशज बताया. इस सेमिनार में शामिल अन्य लोगों ने कहा कि यह सब धर्मांतरण में शामिल एजेंसियों की शह पर हो रहा है और आदिवासियों को गैर-सनातनी घोषित करने के ऐसे किसी भी प्रयास को बर्दाश्त नहीं किया जाएगा.

गौरतलब कि भारत ट्राइबल पार्टी (बीटीपी) जिसने पिछले विधानसभा चुनावों में दो सीटें जीतकर सबको चौंका दिया था और कुछ अन्य सीटों पर भी अच्छा प्रदर्शन किया था, उसने भी आदिवासियों को गैर-हिंदू घोषित करने और उनके लिए एक अलग कोड की मांग का समर्थन किया है. कहा जा रहा है कि बीटीपी जिस तरह कांग्रेस के किले में सेंध लगा रही है, उसकी काट के लिए घोघरा ने आदिवासियों को गैर-हिंदू घोषित करने का मुद्दा उठाया है. बीटीपी का कांग्रेस के साथ कभी प्यार, कभी तकरार का रिश्ता रहा है.

इसने पिछले साल सचिन पायलट के विद्रोह के दौरान गहलोत का समर्थन किया था. लेकिन दिसंबर में कांग्रेस से तब समर्थन वापस ले लिया जब बीटीपी उम्मीदवार को डूंगरपुर के जिला परिषद अध्यक्ष बनने से रोकने के लिए कांग्रेस और भाजपा ने हाथ मिला लिया. 27 सीटों वाले डूंगरपुर जिला परिषद चुनाव में, बीटीपी उम्मीदवार पार्वती डोडा को 13 वोट मिले, जबकि कांग्रेस और भाजपा को क्रमश: छह और आठ वोट मिले थे. जिला प्रमुख चुने जाने के लिए डोडा को एक और वोट की जरूरत थी, पर कांग्रेस-भाजपा ने हाथ मिलाकर भाजपा के सूर्य अहारी को जिता दिया. इसलिए दोनों मुख्य सियासी दल अब गैर-हिंदू या हिंदू होने की मांग को हवा देकर एसटी वोटों को जैसे-तैसे अपने पाले में करने के लिए हाथ-पैर मार रहे हैं. भाजपा धर्म परिवर्तन के मुद्दे को भी उछाल रही है जिसकालाभ उसे गैर-आदिवासी क्षेत्रों में भी हिंदू वोट बैंक को मजबूत करने में मिलेगा.

10 मार्च को बागी कांग्रेस विधायक रमेश मीणा ने इस मामले को एक और दिलचस्प रंग देते हुए विधानसभा अध्यक्ष सी.पी. जोशी पर आरोप लगाया था कि वे एसटी के विधायकों की आवाज दबाने के लिए उन्हें ऐसी सीटें आवंटित कर रहे हैं जहां माइक नहीं हैं. 

राजनीति, सत्ता को अपनी मुठ्ठी में करने का खेल है और राजस्थान कांग्रेस पिछले कुछ समय से इसे बहुत नजदीक से अनुभव कर रही है. सचिन पायलट खेमा पिछले कई महीनों से इसे छीनने के लिए अपना एड़ी-चोटी का जोर लगा रहा है. इसी फिराक में इसने पिछले साल बगावत की लेकिन नाकाम रहने के कारण वह सब भी गंवा दिया जो पहले से इसके पास था. चाहे जैसे भी हो, पायलट खेमा राज्य में अपनी ही कांग्रेस सरकार के लिए असहज स्थितियां पैदा करने का कोई अवसर नहीं गंवाना चाहता. रमेश मीणा गहलोत सरकार में कैबिनेट मंत्री थे पर पिछले जुलाई में पायलट के साथ उन्हें भी मंत्रिमंडल से बर्खास्त कर दिया गया. रमेश मीणा ने एक सवाल पूछने की अनुमति मांगी और अध्यक्ष ने उन्हें इजाजत दे भी दी लेकिन मीणा ने कहा कि वे बोल नहीं सकते क्योंकि उनके सामने माइक नहीं है. जोशी पिछले साल खुली बगावत के बावजूद दलबदल विरोधी कानून के तहत नोटिस जारी करने के कारण पायलट खेमे के निशाने पर रहते हैं.   

अध्यक्ष ने स्पष्ट किया कि बैठने की व्यवस्था का निर्धारण मुख्य सचेतक करते हैं और कोरोना के कारण दूर-दूर बैठाने की विवशता से, 196 विधायकों में से दोनों दलों के विभिन्न जातियों के लगभग 50 विधायकों की सीट के सामने माइक की व्यवस्था नहीं है. ऐसे विधायक जिनकी सीट के सामने माइक नहीं है, वे पीछे की पंक्ति में जाते हैं और जो माइक उन्हें सबसे पहले दिखता है उसी में बोलते हैं. रमेश मीणा, जो कुछ दिनों पहले अपने प्रश्न का समय आने पर अनुपस्थित थे, को इस बार अचानक लगने लगा कि अगस्त से ही उनकी सीट के सामने माइक की व्यवस्था इसलिए नहीं है क्योंकि गहलोत सरकार, अध्यक्ष जोशी और मुख्य सचेतक महेश जोशी एससी/एसटी विधायकों के साथ अच्छा व्यवहार नहीं करते हैं.

कोविड प्रोटोकॉल के कारण कुछ कैबिनेट मंत्री भी दूसरी पंक्ति में चले गए और यहां तक कि हेमा राम चौधरी जैसे कुछ वरिष्ठ पूर्व मंत्री और पूर्व अध्यक्ष दीपेंद्र सिंह, दोनों ही पायलट खेमे के और गैर-एससी/एसटी नेता हैं, को भी पीछे की बेंच पर बिठाया गया है पर उन्होंने इसे सहजता से स्वीकार किया है. अगस्त में, पहली बार के विधायक होने के बावजूद पायलट ने कैबिनेट मंत्रियों के साथ दूसरी पंक्ति में बिठाने को एक मुद्दा बना दिया था और आखिरकार अपनी ताकत का प्रदर्शन करने के बाद जनवरी में उन्हें पहली पंक्ति में जगह दी गई और कैबिनेट मंत्रियों को भी उनके पीछे बिठाया गया. दो विधायक वेद प्रकाश सोलंकी और मुरारी मीणा, रमेश मीणा का समर्थन कर रहे हैं.

मीणा ने इस मुद्दे को भावनात्मक रंग देने की कोशिश भी की. विधानसभा के बाहर उन्होंने कांग्रेस सरकार पर आदिवासियों की आवाज दबाने के आरोप लगाए और कहा कि अगर राहुल गांधी उनकी पीड़ा सुनने के लिए थोड़ा वक्त तक नहीं निकाल सकते तो वे पार्टी ही छोड़ देंगे. आखिर रमेश मीणा ऐसा क्यों कर रहे हैं? केवल इसलिए क्योंकि पायलट ने उन्हें मंत्रिमंडल में वापसी और सरकार में कहीं अधिक दखल का वादा किया था जिसकी अब उम्मीद कम हो गई है.

ऐसी चर्चाएं गर्म थीं कि सोनिया गांधी गहलोत को ऑल इंडिया कांग्रेस कमिटी (एआइसीसी) अध्यक्ष बनाना चाहती हैं, लेकिन इससे उलट कांग्रेस आलाकमान मुख्यमंत्री गहलोत के प्रदर्शन से खुश है. पायलट की ओर से लगातार खड़ी की जा रही मुश्किलों से सोनिया और राहुल गांधी नाखुश हैं और गांधी परिवार में एकमात्र प्रियंका ही हैं जो पायलट को शांत रखने की कोशिश करती हैं. गहलोत को बदलने से कांग्रेस सरकार का पतन निश्चित हो जाएगा. वर्तमान परिस्थितियों में पायलट या कोई अन्य नेता विधायकों को एकजुट नहीं रख सकता है. गांधी परिवार इस बात को अच्छी तरह समझता है और वे जुलाई 2020 के बाद की घटनाओं के कारण पायलट से कहीं अधिक गहलोत पर भरोसा करता है.

क्या रमेश मीणा सचमुच गांधी परिवार को अपनी फरियाद सुनने के लिए विवश कर सकते हैं? सियासी दलों ने शायद ही कभी राजस्थान में आदिवासी कार्ड खेला हो, पर अब वे इसके लिए तैयार हैं. आदिवासियों के गैर-हिंदू होने का मुद्दा उठाकर गहलोत के घोघरा ने रमेश मीणा के आरोपों की तुलना में कहीं बड़ा सियासी पासा फेंक दिया है.

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