प्रतिरक्षाः ढाई मोर्चे पर मुकाबले में सेना

जनरल नरवणे ने आर्मी ट्रेनिंग कमान के अभी जारी एक अध्ययन का जिक्र करते हुए कहा भी मानवबल की जगह प्रौद्योगिकी को लाया जाएगा. लेकिन साफ है कि बड़ी तादाद और सेना की तैनाती के मद्देनजर जमीन पर इन्हें उतारने में बरसों लगेंगे

सदैव सतर्क एलएसी पर रेचिन ला में हालात का जायजा लेते सेना प्रमुख जनरल एम.एम. नरवणे और 14 कॉप्र्स के कमांडर ले.जनरल पी.जी.के. मेनन
सदैव सतर्क एलएसी पर रेचिन ला में हालात का जायजा लेते सेना प्रमुख जनरल एम.एम. नरवणे और 14 कॉप्र्स के कमांडर ले.जनरल पी.जी.के. मेनन

अपनी सालाना प्रेस कॉन्फ्रेंस में, जो 12 जनवरी को हुई थी और जिसे 15 जनवरी को होने वाला सेना दिवस समारोह से पहले किया गया था, सेना प्रमुख जनरल एम.एम. नरवणे ने दुनिया की दूसरी सबसे बड़ी सेना के सामने पेश चुनौतियों का खाका खींचा था. ढाई मोर्चों पर सक्रिय युद्ध—जिसे सेना बाहरी और अंदरूनी दोनों किस्म की सुरक्षा चुनौतियों में शामिल करती है—अब एक वास्तविकता है. दुनिया की दो सबसे बड़ी सेनाओं के 1,00,000 लाख से अधिक सैनिक इस समय भारत-चीन सीमा पर आमने-सामने हैं और यह सबसे लंबी विवादित सरहद है, जिसमें से अधिकतर हिस्सा 8,000 फुट की ऊंचाई पर है. यह धैर्य का क्रूर खेल है कि पहले कौन पलकें झपकाता है—और वह भी कड़ाके की ठंड में जहां कई जगहों पर तापमान शून्य से भी तीस डिग्री नीचे तक चला जाता है.

भारतीय सेना का बड़ा दुश्मन—चीन, उत्तरी सीमा पर और पश्चिमी सीमा पर पाकिस्तान है—वही खेल दिखा रहे हैं जिसे जनरल नरवणे 'गहरी मिलीभगत' कहते हैं, जिसमें दोनों एक साथ प्रशिक्षण और कार्यवाही कर रहे हैं और खुफिया सूचनाओं का आदान-प्रदान कर रहे हैं. भारत की चीन के साथ विवादित वास्तविक नियंत्रण रेखा (एलएसी) कोई 3,488 किमी लंबी है, जो तीन सेक्शन में बंटी है—पश्चिमी, केंद्रीय और पूर्वी. पश्चिमी सेक्टर, लद्दाख मई 2020 में धधक उठा था, जब चीन की पीपल्स लिबरेशन आर्मी (पीएलए) ने एलएसी के साथ बड़ी संख्या में अपनी टुकडिय़ां तैनात कर दी थीं. कोर कमांडरों के बीच आठ दौर की बातचीत भी कोई रास्ता निकालने में बेनतीजा साबित हुई, इसलिए जबकि सेना नौवें दौर की बातचीत की तारीखों का इंतजार कर रही है, तब इसके पास हिमाचल प्रदेश और उत्तराखंड और पूर्वी सेक्टर में सिक्किम और अरुणाचल प्रदेश में जवानों को एलएसी पर तैनात करने के सिवाय कोई और चारा नहीं है. जनरल नरवणे कहते हैं,

''इस समय तक हमने सभी उत्तरी सीमाओं पर उच्च स्तरीय सतर्कता बरती है.'' भारतीय सेना की रणनीति अपनी जमीन पर जमे रहना, यह तय करना कि पीएलए दूसरे सेक्टर में न घुस जाए और बातचीत का इंतजार करते रहने की है. वास्तव में, सेना ने पूरे हिमालय में रणनैतिक बिसात बिछा दी है. लेकिन, इसके नतीजे दूरगामी साबित हो सकते हैं—मंदी के दौर में उसका असर पहले से ही दवाब में चल रहे सैन्य खर्चे पर पड़ सकता है और उन सैन्य सुधारों पर भी इसका असर पडऩा तय है जिससे मौजूदा 17 अलग सेवाओं, भौगौलिक रूप से दूर स्थित तीनों सेनाओं के कमानों को मिलाकर महज पांच थियेटरों में बदलने का है.

सेना के मोर्चे

जनरल नरवणे ने जिस 'उच्चस्तरीय सतर्कता' का जिक्र किया उसका एक मतलब निकाला जा सकता है कि वायु सेना और नौसेना के नजरिए से, जिनकी रक्षा बजट में 35 और 15 फीसद की हिस्सेदारी होती है, नई दिल्ली इस सीमा विवाद में सिर्फ थल सेना की तरफ ध्यान केंद्रित करने वाला है. हालांकि, सेना की इन्फैंट्री और आर्मर के साथ तोपखाने की यूनिटों को सीमा पर दो मोर्चों पर तैनात किया गया है, बाकी को विस्तारित प्रशिक्षण के लिए पीछे रखा गया है जो अल्पावधि सूचना पर तैनात किए जा सकते हैं.

भारतीय सेना के 13 लाख बल में से इसके 6,50,000 जवान युद्धक माने जाते हैं—इन्फैंट्री, आर्टिलरी और आर्मर्ड कोर. बाकी जंग के मैदान में मददगार की तरह होती है. माना जाता है कि सेना का करीब 40 फीसद हिस्सा केंद्र शासित प्रदेश जम्मू और कश्मीर (776 किमी लंबी नियंत्रण रेखा) और लद्दाख (एलएसी पर 1,597 किमी) पर तैनात है. वह जम्मू-कश्मीर और पूर्वोत्तर में आतंकवाद विरोधी ऑपरेशन में भी शामिल हैं. जनरल नरवणे ने कहा कि लद्दाख में, सेना की अग्रिम मोर्चे पर तैनाती बरकरार रहेगी. वे कहते हैं, ''अगर बातचीत लंबी खिंच गई...तो हम मोर्चे पर डटे रहेंगे, चाहे जितना वक्त लगे.''

रॉ के पूर्व अतिरिक्त सचिव और चीन मामलों के विश्लेषक जयदेव राणाडे पूर्वानुमान लगाते हैं कि इस साल भारत को लगातार सैन्य दवाब झेलना होगा. वे कहते हैं, ''हिमालय में सैन्य टकराव बढऩे का अंदेशा है. इनमें तेज, और सहज सैन्य कार्रवाइयां भी शामिल हो सकती हैं.'' इसका मतलब यह तैनाती इस पूरे साल भर हो सकती है. ऐसा बमुश्किल ही हुआ होगा जब सेना ने इस मोर्चे पर इतनी सख्त तैनाती की हो. इस लगातार सैन्य तैनाती का क्या असर हो सकता है? सेना को जवानों को रिजर्व में रखने की जरूरत होगी क्योंकि टुकडिय़ों को अनिश्चितकाल के लिए अग्रिम मोर्चे पर नहीं तैनात रखा जा सकता और उन्हें बदलते रहना होगा. जनरल नरवणे ने जम्मू-कश्मीर मे आतंकविरोधी अभियानों से अलग होने का विचार खारिज कर दिया.

बदले सुरक्षा परिदृश्य के मद्देनजर, चीन और पाकिस्तान के संयुक्त फौजी हमले से निबटने के लिए सेना सरकार की ओर से एक के बाद एक जारी निर्देशों का पालन कैसे करेगी? दो मोर्चों पर युद्ध की दशा में सरकार की युद्ध निर्देशिका कहती है कि वह 'पाकिस्तान को परास्त' करे और 'चीन को रोक कर' रखे. पिछले साल लद्दाख में तनातनी के बाद, सेना ने संतुलन कायम करने की रणनीति की शुरुआत की, जिसके तहत यह पश्चिमी मोर्चे की टुकडिय़ों को चीन के खिलाफ तैनात करेगा.

छोटी अवधि के लिए, सेना वह करने जा रही है जिसकी सलाह कई रणनीतिकार बहुत पहले से दे रहे थे—पाकिस्तान से निबटने के लिए मौजूदा तीन स्ट्राइक कोर में से एक को चीन से निबटने वाली माउंटेन स्ट्राइक कोर में बदलना. (स्ट्राइक कोर सीमा पर तैनात आक्रामक युद्धक संरचना है). इन स्ट्राइक कोर को अपने टैंक और हथियारबंद वाहनों को छोडऩा होगा. अब सेना अपने उस मूल प्रस्ताव पर ध्यान दे रही है जिसे उसने 2000 के शुरुआत में पेश किया था और उस प्रस्ताव में चीन के खिलाफ दो माउंटेन स्ट्राइक कोर बनाने की बात थी—एक लद्दाख में और दूसरा अरुणाचल में.

उस इलाके में जवानों को भर देने की बजाए, सेना को प्रौद्योगिकी और गोलाबारी की जरूरत है ताकि प्रतिरोध बना रहे. लेफ्टिनेंट जनरल पी. रवि शंकर, पूर्व डीजी, आर्टिलरी कहते हैं, ''हमें पारंपरिक प्रतिरोधक विधियों को लागू करने करने के लिए मानसिकता में बदलाव लाना होगा और यह क्षमता हासिल करनी होगी कि पीएलए के पश्चिमी और पूर्वी हाइवे को हम न सिर्फ रोक सकें बल्कि नुक्सान पहुंचाने की हालत में भी हो, खासकर चुंबी घाटी में ऐसा करना होगा और देप्सांग मैदानों और उत्तरी सिक्किम मैदानों में नियंत्रण के लिए ऐसा करना होगा.''

सेना के आला अधिकारी कहते हैं कि वे इस बात का ध्यान रख रहे हैं कि टुकडिय़ों की उस तरह से तैनाती न करें जो पहले विश्वयुद्ध की तरह अग्रिम मोर्चे जैसा नुक्सानदेह हो. जनरल नरवणे ने आर्मी ट्रेनिंग कमान के अभी जारी एक अध्ययन का जिक्र करते हुए कहा भी मानवबल की जगह प्रौद्योगिकी को लाया जाएगा. लेकिन साफ है कि बड़ी तादाद और सेना की तैनाती के मद्देनजर जमीन पर इन्हें उतारने में बरसों लगेंगे.

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