शम्सुर्रहमान फारुक़ीः अफ़साना एक नक्क़ाद का

पहले कई चांद थे सरे आसमां आया, फिर क़ब्ज़-ए ज़मां, फिर अभी लॉकडाउन के दौरान उन्होंने फ़ानी बाक़ी नाम का अफ़साना लिखा

महमूद फ़ारूक़ी
महमूद फ़ारूक़ी

विशेषः शम्सुर्रहमान फ़ारूक़ी

महमूद फ़ारूक़ी

हरगिज़ न मीरद आन कि दिलअश ‌‌ज़िंदा शुद ब इश्क़
(जिसका दिल इश्क़ से ‌‌ज़िंदा हो वो कभी नहीं मर सकता: हाज़ शिराज़ी)

अब सोचिए तो यक़ीन नहीं होता कि शम्सुर्रहमान फ़ारूक़ी साहब ने उम्र का 70वां पड़ाव पार करने के बाद फ़िक्शन लिखना शुरू किया. उसके पहले की सारी ‌‌ज़िंदगी उन्होंने आलोचना और तहक़ीक़ में गुज़ारी, हालांकि उनकी नस्र यानी गद्य की रवानी उनका ख़ासा था—उनकी तहरीर हमेशा बहुत कसी हुई और कड़कदार आहंग से लबरेज़ होती थी. ये शुरू से ही उनका तरीक़ा रहा था कि वो हर बात को बहुत मुदल्लिल अंदाज़ में और प्राथमिक तर्कों के साथ शुरू करते थे.

पहले मौज़ू का अहाता, फिर उसके बारे में और लोगों के मत, फिर उनका ख़ुद का मंतव्य. हज़ारों की तादाद पर मुश्तमिल उनके किसी भी मज़मून को उठा लीजिए, कोई एक लाइन भर्ती की नहीं मिलेगी. जिस शख्स की कुल्लियात यानी समग्र, कुछ नहीं तो 40-50 जिल्दों तक पहुंचे उसकी तहरीर की ये नुमायां ख़ूबी क़ाबिल-ए सताइश है. उनके लिखने में हिसाब की तरह का पैनापन और बहाव था, एक नुक़्ते से दूसरे, दूसरे से तीसरे, आधार से कोण, कोण से स्तंभ, स्तंभ से त्रिकोण, और फिर देखते-देखते एक नए विचार के मज़मून का दोमहला, चमहला खड़ा हो गया.

और हमेशा अपने विरोधियों का मत ज़ाहिर करते हुए लिखते थे. तहरीरों में हिसाब की सी ये चुस्ती-दुरुस्ती और सटीकपन हैरतअंगेज़ तो है, क्योंकि वो हिसाब में बहुत कमज़ोर थे और उस ज़माने में हाइ स्कूल में हिसाब ‌अनिवार्य नहीं था, मगर इसी विचार पद्धति और तरीक़ा-ए कार ने उन्हें नए-नए अन्वेषण करने और पुराने को नए तर्ज़ से देखने और दिखाने के क़बीले का सरदार बनाया, एक ऐसा क़बीला जिसमें वो पेशवा भी थे और तन-ए तन्हा मुसार भी. इश्क़ की तरह इल्म की ऐसी मंजि़लें आती हैं जहां आदमी अपनी जद्दोजहद और तपस्या में ग़र्क़ हो के सबसे बिछड़ जाता है, बिल्कुल अलग-थलग पड़ जाता है, पूरी तरह से तन्हा. शायद इसीलिए उनके महबूब और हिंदुस्तानी फ़ारसी के सबसे बड़े शायर पटना के मिर्जा अब्दुल क़ादिर बेदिल ने कहा था:

हर तरफ़ नज़र करदीम, मन ब ख़ुद सफ़र करदीम
ऐ मुहीत-ए हैरानी, ईन चे बेकरानी हास्त

(हर तरफ़ नज़र डालता हूं, और सफ़र करने वाला अकेला मैं ही दिखाई देता हूं/ ऐ हैरानी का सागर, ये कैसी बेकरानी, कैसी अनादी, कैसा अनंत है) 

वो हमेशा इस बात का ऐतराफ़ करते थे कि तनक़ीद, यानी आलोचना, की उमर तख़लीक़ यानी मौलिक सृजनात्मक लेखन से कम होती है, मगर उसके बावजूद उन्होंने फ़िक्शन लिखने में ‌इतने साल लगाए. शायद इसीलिए कि जो काम वो कर रहे थे वो ख़ुद किसी मौलिक रचना से कम नहीं था. अपने रचनात्मक जीवन के पहले 20 साल वो उर्दू में आधुनिकता के मतवाले और आधुनिकतावाद उर्फ़ जदीदियत के शीर्ष पुरुष के रूप में खड़े रहे. उन्होंने आधुनिकता का अलम तब बुलंद किया था जब हर तरफ तरक़्क़ीपसंद या प्रगतिशील लेखक संघ के अदीब का दौर-ए दौरा था.

तरक़्क़ीपसंद या प्रगतिशील लेखक संघ जो अदब और कला में विरोध का झंडा उठाए दाख़िल हुए थे वे 60 की दहाई आते-आते ख़ुद पूरी तरह वर्चस्व प्राप्त किए मनसबदार बन गए थे, और शायद इसीलिए सत्ताधीन मठाधीशों की तरह अदब को छोड़कर, अदबी तहरीकों और गिरोहबंदियों में ज़्यादा दिलचस्पी रखने लगे थे. मानक अदीबों की सूची तैयार करना, उनकी आमद खारज का इंद्राज करना, कुछ को देश निकाला, कुछ को पुरस्कृत करने के अभियान में वो ज़्यादा सरगर्म थे.

इसी प्रतिष्ठित और सत्तारूढ़ प्रगतिशीलता के खिलाफ विद्रोह के अलमबरदार के रूप में फ़ारूक़ी साहब 1966 में शबख़ून नाम की पत्रिका ले के आए थे, जिसका मतलब ही था, घात लगाकर रात में किया गया हमला. और शबख़ून के साथ शुरू हुआ सिलसिला नए से नए अदबी कीर्तिमान और पैमानों का. उसके अहम अध्याय थे हर शुमारे में छपने वाला 'भयानक अफ़साना’, जदीद नज़्म, फ़ारूक़ी के तब्सिरे और ग़ालिबशिनासी के नए पहलुओं का.

उस दौर में उन्होंने दूसरे लिखने वालों पर जिस तरह की तेज़ और तल्ख़ टीका-टिप्पणी की, जिस तरह के बेहद तीव्र विवादों को जन्म दिया और बड़े नामों पर जिस शोख़ी से चुभते हुए सवाल उठाए, उन्हें आज भी भुलाया नहीं जा सकता है. मगर वो अलग दौर था, वो बुतशिकनी का दौर था, पुराने थके-मांदे ख़ुदाओं को हरम से हटा के ज़मीन साफ़ करने का वक़्त था, और वो वक़्त था मग़रिकी फ़िक्र और तनक़ीद और अदब की परस्तिश का. इस दौर में फ़ारूक़ी साहब ने नए और पुराने लिखने वालों पर गहरे शिकंजे कसे, प्रेमचंद पर सवाल खड़े किए, बेदी को आमियाना, राक़ को मामूली शायर कहा, मंटो के 'खोल दो’ को घटिया अफ़साना बताया, 'शेर, ग़ैर शेर और नस्र’ की तफ़रीक़ की, नए नाम आगे बढ़ाए और अपनी हर तहरीर में अरस्तु (एरिस्टोटल), अफ़लातून (प्लैटो), शेक्सपियर और बायरन और बोदुलेयर वग़ैरह के हवाले दिए.

लोगों को शिकायत होने लगी कि फ़ारूक़ी मग़रिबपरस्ती में इस तरह गिरफ़्तार हैं कि अपनी जड़ों और अपनी रिवायतों से मुंहमोड़ के पूरी तरह गुमराह हो चुके हैं. मगर उस भटके हुए फ़ारूक़ी और उनके शबख़ून ने जिन बड़े नामों से हमें शनास कराया उनमें से सिर्फ़ चंद नाम मुलाहिज़ा हों: इंतिज़ार हुसैन, नैयर मसूद, ज़फ़र इक़बाल, अहमद मुश्ताक़, मोहम्मद अलवी और शहरयार, जिनका नाम लिए बग़ैर मौजूदा उर्दू अदब का तसव्वुर मुहाल है.

मगर उसी दौर में वो 'तफ़हीम-ए ग़ालिब’ नाम के अपने कॉलम में ग़ालिब की नई-नई परतें खोल रहे थे, एक-एक शेर की व्याख्या कभी-कभी 7-8 पन्नों में करते. ग़ालिब को पूरी तरह से आधुनिक शायर साबित कर चुके थे. ग़ालिब शिनासी करते-करते वो मीर तक पहुंचे और फिर जब उन्होंने मीर को पढ़ना और समझना शुरू किया तो फिर उन पर एक नई दुनिया खुली. पहले ये कि शायरी सिर्फ़ वो नहीं होती जो दिल को छू जाए, या जिसको आप अच्छा फ़लसफ़ा या नेक विचार कहके श्रद्धा सुमन अर्पित करें.

शायरी रची जाती है, तरकीबें गूंधी जाती हैं, शायरी में श्लेष और यमक और ध्वनि और इबहाम और पैकर के ज़रिए एक संसार बुना जाता है ताकि कूज़े में समंदर समाया जाए. शायरी वो है जिसकी ध्वनि और गूंज उसी सहृदय और रसिक को समझ में आती है जो उसमें इंगित इशारों, किनायों और संकेतों को समझने की सलाहियत रखता हो. मीर और उसके अहद के दूसरे फ़ारसीदां शायरों और नक़्क़ादों, जैसे ख़ान आरज़ू और टेक चंद बहार, और सियालकोटी मल वारस्ता की जांच-पड़ताल करते हुए वो आचार्य आनंदवर्धन और आचार्य अभिनवगुप्त और आचार्य मम्मत तक पहुंचे.

उन्हें समझ में आया कि उस ज़माने की हिंदी (यानी उर्दू जिसे उस वक़्त हिंदी ही कहा जाता था) और फ़ारसी शायरी, दोनों की शायरी से अपेक्षा और उसकी वही समझ थी जो क़दीम संस्कृत शोरा और विद्वानों की थी. यानी शेर क्या कहता है, या किस बारे में है, और शेर के मानी यानी अर्थ क्या हैं, ये दो अलग-अलग बातें हैं. शेर कह सकता है कि महबूब गुलाब की तरह है, और उसे देख के हम पानी-पानी हो जाते हैं, महबूब का गुलाब होना और हमारा पानी-पानी होना तो शेर का मज़मून हुआ, मगर पानी-पानी होने से अर्थ के जो अनगिनत पहलू निकलते हैं वो मानी आफ़रीनी है, और आचार्य आनंदवर्धन के ध्वनि सिद्धांत के क़रीबतर है.

शायरी का काम है नए मज़मून गढ़ना और नए मज़मून से नए मानी निकालना. अंग्रेज़ों ने सिखाया था कि तुम्हारी शायरी, क्या हिंदी, क्या ब्रज, क्या संस्कृत, घटिया है क्योंकि उसमें रूपक, इतने ‌इस्तेआरे और पैकर हैं, वो मनगढ़ंत, कृत्रिम भावनाएं दर्शाती है, वो बनावटी है, तरी नहीं, पेचीदा है, सरल नहीं, वो बौद्धिक है, हार्दिक नहीं, जबकि वड्र्सवर्थ और कीट्स क्या नेचुरल शायरी करते हैं, सच्चे जज़्बात की अक्क़ासी.

हमारे साहित्य को सिरे से रद्द करने वाली इस इल्ज़ाम तराशी का सबसे ठोस जवाब फ़ारूक़ी साहब ने दिया, ये दिखाकर कि मीर की शायरी उतनी ही अज़ीम है जितनी शेक्सपियर की, या जॉन डन की या एलेग्जैंडर पोप की. शायरी अल्फ़ाज़ का इंतज़ाम है, शायर हर लफ़्ज़ को सोच-समझके बांधता है, और क़ारी का काम उस बंधन को खोलना है. अर्थ पढ़ने वाले या सुनने वाले के ऊपर निर्भर है, इस क़दीम बौद्ध और संस्कृत मंशूरे को 4,000 पृष्ठों पर फैली मीर की अपनी शरह के जरिए उन्होंने उर्दू शायरी में अंतर्निहित सिद्धांत के तौर पर पेश किया.

लोग कहते थे उर्दू शायरी में ‘विदेशी’ नदियां, पेड़, उपमाएं भरी हुई हैं, लेकिन उन्होंने दिखाया कि शायरी देसी इसलिए नहीं होती है कि उसमें बयान की गई पेड़-पौधों या फलों की सूची देसी है. शायरी कहां की है यह इस पर निर्भर करता है कि शायरी की चेष्टा क्या है, शायरी क्या और किस तरह करने की कोशिश कर रही है और इस तरह उन्होंने उर्दू शायरी को संस्कृत शेरियात से जोड़ा. पहले वो ग़ालिब को जदीद बताते थे, फिर उन्होंने दिखाया कि दरअसल मीर भी उतने ही जदीद हैं और ग़ालिब से बड़े हैं.

ये सब कर चुकने के बाद वो दास्तानों पर आए, एक ऐसा ज़खीरा जिसे कूड़े का ढेर समझके छोड़ दिया गया था. 20 साल की अनथक मेहनत और कूड़े के अंबार में ख़ुद को ग़र्क़ करके उन्होंने दिखाया कि दरअसल ये लाल-ओ जवाहिर का ख़ज़ाना है जिसको हमने सिर्फ़ इसलिए नज़रअंदाज़ कर रखा है क्योंकि यथार्थवाद और यथार्थवादी नॉवेल ने हमारी आंखों में ऐसी धूल झोंक रखी है कि हम हर बयानिये या कथानक (यानी नरेटिव) को नॉवेल के नुक़्ता-ए नज़र से देखते हैं जबकि होना उसके बरअक्स चाहिए. अपनी रचनात्मक ‌‌ज़िंदगी के हर मोड़ पर वो इस शेर को चरितार्थ करते नज़र आते हैं कि:

फिरती है आज शहर की गलियों में जहां ख़ाक
सोना लिया है गोद में भर कर वहीं से हम

इतना सब काम कर चुकने के बाद, 40-50 किताबें लिख लेने के बाद, उर्दू तहक़ीक़ और तनक़ीद की दुनिया के हर वर्क़ पर अपना सिक्का बैठा लेने और ख़ुद को अपनी ‌‌ज़िंदगी ही में अमर करा चुकने के बाद वो फिक्शन पर आए. कैसे आए, उसकी भी दिलचस्प कहानी है. 1997 में ग़ालिब की यौम-ए पैदाइश के दो सौ साला जश्न के लिए उन्होंने जो शुमारा तैयार किया उसमें सबसे अच्छा मज़मून एक हिंदी लेखक कृष्ण मोहन का था जो उर्दू पढऩा नहीं जानते थे. अब किसी अंजान हिंदी लेखक की तस्नीफ़ को उर्दू के नामवर अदीबों पर तरजीह कैसे दें? और न दें तो भी नाइंसाफी.

इस दुश्वारी से निबटने के लिए उन्होंने ग़ालिब की ‌‌ज़िंदगी पर मुब्नी एक अफ़साना लिखा ‘ग़ालिब अफ़साना’ के नाम से, जो एक फ़र्जी नाम से छपा. वो इतना मक़बूल हुआ कि फिर उन्होंने दूसरे शायरों के बहाने या उनके बारे में कई अफ़साने लिखे जो बहुत चर्चित हुए. फिर वो लिखते चले गए. पहले कई चांद थे सरे आसमां आया, फिर क़ब्ज़-ए ज़मां, फिर अभी लॉकडाउन के दौरान उन्होंने फ़ानी बाक़ी नाम का अफ़साना लिखा, जिसमें क़दीम हिंदू, बौद्ध, जैन, यूनानी, और सीरियाई देवमाला और पौराणिक मिथकियों से न सिर्फ अपनी गहरी जानकारी दिखाई बल्कि उनका भरपूर इस्तेमाल करते हुए एक ऐसी कहानी गढ़ी जो ‌‌ज़िंदगी और वजूद के बारे में नए सवाल उठाती है.

एक तरह से देखें तो उन्होंने अपने कथा साहित्य को एक ख़ास मक़सद के लिए इस्तेमाल किया. 18वीं-19वीं सदी की शायरी, संस्कृति और सभ्यता के बारे में उन्होंने 50 साला अदबी सफ़र में जो पुनरावलोकन किया था, उसको उन्होंने बड़ी चाबुकदस्ती और महारत से अपनी तख़लीक़ो में उजागर किया. जो बातें वो बतौर नक़्क़ाद अपनी आलोचनाओं और समीक्षाओं में कह रहे थे वही बातें उन्होंने अपनी तख़लीक़ी तहरीरों में अपने किरदारों के ज़रिए कहलवाईं.

ये अलग बात है कि फ़ैज़ की तरह उन्होंने ये काम इतनी कुशलता से किया कि अशोक वाजपेयी और विश्वनाथ त्रिपाठी से लेकर इरफ़ान ख़ान और रवीश कुमार और अरुण शौरी तक उनके दीवाने हो गए. इसमें कोई शक नहीं कि उनके साहित्य लेखन से उनकी एक विस्तृत और देशव्यापी पहचान बनी और इस तरह उनकी शोहरत का सूरज, उनके नाम के अनुरूप और दरख्शां ताबिंदा हुआ.

पिछले हफ़्ते एक शोकसभा में अशोक वाजपेयी ने बजा तौर पर कहा कि उनकी सबसे बड़ी कामयाबी ये थी‌ कि जिसे हम अपने पतन का साल समझते थे उन्होंने उस दौर को हमारी साहित्यिक पराकाष्ठा का दौर साबित करके दिखाया, और एक ऐसी आधुनिकता गढ़ी जो देसी तो थी ही, मगर जो अपनी शास्त्रीय रिवायतों को साथ लेकर क़ायम हुई थी.

अशोक जी ने उनकी तुलना आचार्य हज़ारी प्रसाद द्विवेदी से करते हुए कहा कि जैसे उनके लिए प्राचीन काल था वैसे ही फ़ारूकी साहब के लिए मध्ययुगी दौर था, जैसे द्विवेदी जी के लिए कबीर थे वैसे ही फ़ारूक़ी साहब के लिए मीर थे, और अपनी बात फैलाने के लिए दोनों ने उपन्यास लिखे. मगर फ़ारूक़ी साहब आधुनिक और समकालीन मग़रिबी साहित्य और फ़लसफ़े पर ज़्यादा गहरी निगाह रखते थे और शायद इसीलिए उनकी तहरीरें, क्या तख़लीक़ और क्या तनक़ीद, हमें ज़्यादा प्रासंगिक और ज़्यादा तात्कालिक मालूम होती हैं.

दास्तानों में उन्होंने ज़बानी या मौखिक परंपराओं पर ज़ोर दिया, और उसके ज़बानी परिवेश और प्रदर्शन के सिद्धांतों को रेखांकित किया. दास्तानें ज़बानी सुनने और सुनाने की चीज़ थीं, उन पर कोई भी टीका-टिप्पणी इस तथ्य को नज़रअंदाज करके नहीं की जा सकती. मगर वह ख़ुद भी उसी वाचिक परंपरा की एक अनमोल कड़ी थी. उनकी बातचीत सुनके ऐसा लगता था जैसे कोई अज़ीम दानिश्वर, मुफ़क्किर और आलिम बड़े मज़े से क़िस्सागोई कर रहा है और ख़ुशबयानी ऐसी सहज और सादा है कि एक-एक हर्फ़ दिल में उतरता चला जाए.

वो क्या ख़ूब बोलते थे, और बेतकान बोलते थे और संगीत की भाषा में कहें तो बात-बात की गिरह लगाते हुए ऐसे चलते थे कि हज़ार-डेढ़ हज़ार बरस हम पर रोशन होते चले जाएं. मैं अपनी ख़ुशबख़्ती को क्या कहूं कि सैकड़ों बार उनके क़दमों में बैठा मगर तीराबख़्ती देखिए कि जाहिल का जाहिल रहा. बहरहाल हम ख़ुशक़िस्मत हैं कि यूट्यूब पर उनके दर्जनों वीडियोज हैं जिनको सुन सकते हैं, बार-बार सुन सकते हैं, कि वो कहा करें और सुना करे कोई.

कई हज़ार सफ़हात पर फैली हुई उनकी तहरीरें, कई सौ घंटों पर फैली हुई उनकी तक़रीरें, मगर कहीं कोई सतही या ख़ानापूर्ति की बात नहीं, हर बात विक़ार और गहराई और गीराई और वज़न और नयापन और जदीदियत लिए हुए, कोई लफ़ज़ फ़ालतू नहीं, कोई ख्याल नक़ली नहीं, कोई विचार ओढ़ा हुआ नहीं, सब कुछ मौलिक, ख़ालिस, ख़ुदसख़्ता, और क्र-ओ ख़्याल की आंच को लौ देता हुआ, हिंदुस्तान जन्नत निशान के अनदेखे साहित्यिक सांस्कृतिक कमालात दिखाता हुआ. मीर पे उनकी चार जिल्दों का उनवान दरअसल उनकी ख़ुद की तख़लीक़ी ‌‌ज़िंदगी के हर लफ्ज़ और हर्फ़ पर सादिक़ आता है:

जहां से देखिए यक शेर-ए शोर अंगेज़ निकले है
क़यामत का सा हंगामा है हर जा मेरे दीवान में.

महमूद फ़ारूक़ी दास्तानगो हैं. चाचा शम्सुर्रहमान फ़ारूक़ी की प्रेरणा से ही उन्होंने दास्तानगोई शुरू की और आधुनिक समय में उसके अगुआ बने


मीर और उसके अहद के दूसरे फ़ारसीदां शायरों और नक़्क़ादों, जैसे ख़ान आरज़ू और टेक चंद बहार, और सियालकोटी मल वारस्ता की जांच-पड़ताल करते हुए वो आचार्य आनंदवर्धन और आचार्य अभिनवगुप्त और आचार्य मम्मत तक पहुंचे.

Read more!