प्रधान संपादक की कलम से
महामारी ने ''सोशल डिस्टेंसिंग’’, ''मास्क प्रोटोकॉल’’, ‘‘जूम मीटिंग’’ और ''लॉकडाउन’’ जैसे शब्द और मुहावरे हमारी बोलचाल का हिस्सा बना दिए.

2020 सुर्खियों के सरताज कोविड-19
अमूमन इंडिया टुडे सालाना सुर्खियों के सरताज यानी समूचे वर्ष की सुर्खियों में छाए रहने वाले और हम सब पर सबसे अधिक असर छोडऩे वाले घटनाक्रम या शख्सियत का चयन आसान नहीं होता. लेकिन कोविड-19 के वर्ष में हमें कोई शक-शुबहा नहीं हुआ. आदमी के बाल की मोटाई के हजारवें हिस्से के बराबर के एक वायरस ने 75 साल पहले द्वितीय विश्व युद्ध के बाद ऐसी तबाही मचाई, जिसकी दूसरी मिसाल नहीं है.
और उसका कहर अभी जारी है. 2019 के आखिरी महीनों में चीन में पाए गए नॉवेल कोरोना वायरस ने दुनिया भर में ऐसी स्वास्थ्य इमरजेंसी का आलम पैदा कर दिया कि अभी तक दुनिया भर में 8.04 करोड़ लोग उसके संक्रमण का शिकार हो चुके हैं, 18 लाख लोग जान गंवा चुके हैं और दुनिया भर में खरबों डॉलर की संपत्ति स्वाहा हो चुकी है. भारत 29 दिसंबर तक 1.02 करोड़ संक्रमण के मामलों के साथ दुनिया में सबसे अधिक संक्रमण वाला दूसरा देश है. अलबत्ता हम 1,48,000 मौत के साथ सबसे कम मृत्यु दर वाले देश हैं.
इस साल हमारे 52 में से 19 अंक महामारी और उसके असर पर केंद्रित रहे. कोविड-19 ने हमारी जिंदगियां ऐसे बदल डालीं कि अभी तक हम उसे पूरी तरह जान भी नहीं पाए हैं. उसका असर इतना पुक्चता है कि कोई दूसरा सुर्खियों का सरताज उसे छू भी नहीं सकता, चाहे कोई नेता हो या खिलाड़ी, उद्यमी हो या वैश्विक आतंकवादी, जो पिछले दो दशकों के हमारे आवरण पर नमूदार होते रहे हैं. शायद 9/11 का आतंकवादी हमला ही उसके आसपास ठहरता है, जिससे दुनिया बुनियादी तौर पर बदल गई थी. दरअसल, उसी साल हमने सालाना सुर्खियों के सरताज के चयन का चलन शुरू किया था.
महामारी ने ''सोशल डिस्टेंसिंग’’, ''मास्क प्रोटोकॉल’’, ‘‘जूम मीटिंग’’ और ''लॉकडाउन’’ जैसे शब्द और मुहावरे हमारी बोलचाल का हिस्सा बना दिए. भारत में दुनिया का सबसे सख्त लॉकडाउन हुआ, जिसने जिंदगियां, रोजी-रोजगार और कारोबार तबाह कर दिए और एक नए शहरी वर्ग की लाचारी उघाड़ कर रख दी. ये प्रवासी हैं, जो हमारे शहरों को जिंदा बनाए रखते हैं. उसने देश को 59 साल में पहली दफा मंदी में झोंक दिया. जीडीपी वित्त वर्ष 20 की अंतिम तिमाही में 3.2 फीसद से लुढ़ककर मौजूदा वित्त वर्ष की पहली तिमाही में -23.9 फीसद नीचे पहुंच गई. इस तरह हमें दुनिया की बड़ी अर्थव्यवस्थाओं में सबसे बुरे हाल में पहुंचा दिया.
फिर भी, जैसा कि लेखक और पत्रकार फरीद जकरिया हमें अपनी बेहद लोकप्रिय किताब टेन लेसंस फॉर ए पोस्ट-पैनडेमिक वर्ल्ड में बताते हैं, मानव जाति में दर्द और नुक्सान जज्ब करने और आगे बढ़ जाने की अकूत क्षमता है.
इसलिए आपूर्ति शृंखला टूट-फूट गई तो कंपनियां भंडारण, खरीद और वितरण की अधिक कारगर तरीकों की तलाश में जुट गईं. बिक्री के लिए नए डिजिटल तरीके अपनाए गए, जिसे इंटरनेट ऑफ थिंग्स और आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस ने संभव बनाया है. वर्क फ्रॉम होम नया सामान्य चलन बन गया और वीडियो कॉल बातचीत का नया साधन. लचीले काम के घंटे, वर्चुअल बैठकें नए कामकाजी जिंदगी के खास तरीके बन गए हैं. कोविड-19 ने हमारी स्वास्थ्य सुविधाओं को बेदम कर दिया, लेकिन सकारात्मक पक्ष यह है कि डॉक्टरों और स्वास्थ्यकर्मियों के जीवट और वैक्सीन खोज के पराक्रम ने मानव जाति के दृढ़ निश्चय को ही दिखाया है.
हमने केस स्टडी के जरिए पड़ताल की है कि 2020 के सुर्खियों के सरताज कोविड-19 या ''महा बदलावकारी’’ ने कैसे हमारी अर्थव्यवस्था, शिक्षा व्यवस्था, स्वास्थ्य सुविधाओं को नए ढर्रे पर ला खड़ा किया और कैसे हमारे कामकाज, मनोरंजन के तरीके या हमारे बच्चों की पढ़ाई बदल डाली है. इन मिसालों में मुंबई के एमएसएमई उद्यमी हैं, जिनकी चिंता अपने बेकरी उपकरण कारोबार के बैठते जाने की है, नोएडा का एमबीए छात्र है, जिसकी कक्षाएं अपने गृह राज्य अरुणाचल प्रदेश में इंटरनेट की खराब कनेक्टिविटी की वजह से बर्बाद हो रही हैं और दिल्ली की एक इकलौती मां हैं जो बच्चे की देखभाल के साथ वर्क फ्रॉम होम से जूझ रही हैं.
हमारे यहां अन्य सुर्खियों के सरताज की फेहरिस्त भी लंबी-चौड़ी है. उनमें प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी हैं. हमने पाया कि उनकी लोकप्रियता में इस साल अनेक संकटों के बावजूद इजाफा ही हुआ है. संकट भी चीन की फौज के साथ हिमालय में टकराव से लेकर राष्ट्रीय राजधानी की सीमाओं पर डटे लाखों नाराज किसानों तक भारी हैं. इसके अलावा भारतीय मूल की निर्वाचित उप-राष्ट्रपति से लेकर तीन मुख्यमंत्री हैं, जिनमें दो भाजपा के राजनैतिक छल के बावजूद मजबूती से अपनी जमीन पर डटे हुए हैं और तीसरे उसके साथ हैं.
सुर्खियों के दूसरे हकदार में एक दलित महिला जो स्त्री-पुरुष भेदभाव, जाति और वर्ग की दीवारों से टकराई, सीएए विरोधी प्रदर्शनकारी, अर्थव्यवस्था की मंदी से जूझतीं वित्त मंत्री, दुखद अंत का शिकार एक बॉलीवुड स्टार और एक दागदार बैंकिंग सितारा है. ये सभी सुर्खियों के हिस्से रहे हैं लेकिन हमारे सुर्खियों के सरताज की तरह हाल के इतिहास में सबसे अधिक भुला देने लायक और न भुलाने लायक वर्ष नहीं बना पाए.
इसी मुकाम पर मैं अपने पाठकों के लिए खुशनुमा और सबसे बढ़कर, सेहतमंद नए साल की कामना करता हूं. आशा है, 2021 महज नए सामान्य चलन का नहीं, बल्कि बेहतर सामान्य चलन का वर्ष होगा.