उत्तर प्रदेश धान खरीदः बिक जाए तब जाने

प्रदेश सरकार की हाइटेक धान खरीद व्यवस्था बदहाली की शिकार, बड़े किसान और माफिया लेखपालों से मिलकर चांदी काट रहे. छोटे किसान फसल लेकर हफ्तों से खरीद केंद्रों पर खड़े, उनकी कोई सुनवाई नहीं

बाराबंकी के पास सिद्धौर में धान क्रय केंद्र पर कई किसान अपना धान बेचने के लिए हक्रतों से इसी तरह लाइन में खड़े मिले, रात को वहीं ट्रॉली के नीचे वे सो जाते हैं
बाराबंकी के पास सिद्धौर में धान क्रय केंद्र पर कई किसान अपना धान बेचने के लिए हक्रतों से इसी तरह लाइन में खड़े मिले, रात को वहीं ट्रॉली के नीचे वे सो जाते हैं

बाराबंकी से गोंडा के लिए निकलने पर थोड़ा आगे बढ़ते ही राजमार्ग पर स्थित नवीन गल्ला मंडी में बने क्रय केंद्र के इर्दगिर्द सैकड़ों ट्रैक्टर-ट्रॉलियों के नीचे किसान सर्द रातें गुजारने को विवश हैं. इन्हीं में से एक बाराबंकी के बंकी तहसील के कुंदपुरवा गांव के रहने वाले 70 वर्षीय किसान गणेश वर्मा भी हैं. वे 30 नवंबर को क्रय केंद्र पर अपनी ट्रॉली पर बैठे धान लादे उदास बैठे मिले. पिछले दो हफ्ते से वे अपनी फसल बेचने के लिए बारी आने का इंतजार कर रहे हैं. परेशानहाल गणेश बताते हैं, ''हमैं नाईं पता रहा कि धान बेचै खातिर पहिले आनलाइन रजिस्ट्रेसन करावैक परत है.'' क्रय केंद्र पर जानकारी मिलने के बाद दूसरे किसानों की मदद से बड़ी मुश्कि‍ल से उनका रजिस्ट्रेशन हुआ. उसके बाद टोकन मिला तो पता चला कि उनका धान 3 दिसंबर को खरीदा जाएगा. तब तक 150 रुपए रोज के हिसाब से करीब 20 दिन का ट्राली का किराया देना पड़ेगा.

गणेश जैसे 25 से अधि‍क किसान बाराबंकी की नवीन गल्ला मंडी में डेरा डाले हुए थे. 30 नवंबर को कार्तिक पूर्णिमा के अवकाश के चलते क्रय केंद्र बंद था पूरी मंडी में सन्नाटा पसरा हुआ था. तभी इन किसानों ने विपणन शाखा के कांटा नंबर दो पर कुछ कर्मचारियों को धान की तौल के बाद निकाले गए फरहा (बेहद खराब धान, जिसमें से चावल निकलने की गुंजाइश न हो) की साफ-सफाई करते पकड़ लिया. किसान गुस्से में आ गए. उन्हीं में से एक बाराबंकी में तरांवा के रहने वाले अपुल वर्मा बताते हैं, ''क्रय केंद्र पर कर्मचारी किसानों का धान खराब बताकर उसे फेंक देते हैं. फि‍र उसी फेंके गए धान की साफ-सफाई कर उसे मिल मालिकों को बेच देते हैं.'' अपुल ने क्रय केंद्रों पर खारिज धान के नाम पर धांधली किए जाने की शि‍कायत जिलाधि‍कारी आदर्श कुमार सिंह से की. जिलाधि‍कारी के निर्देश पर मामले की जांच कर रहे जिला खाद्य विपणन अधि‍कारी संतोष कुमार द्विवेदी बताते हैं, ''जांच में जो भी दोषी पाया जाएगा उस पर कड़ी कार्रवाई की जाएगी.'' 

कदम-कदम पर समस्याओं का पहाड़

धान खरीद केंद्रों में फैले भ्रष्टाचार से बांदा में बबेरू के उप जिलाधि‍कारी (एसडीएम) सौरभ शुक्ल रू-ब-रू हुए. सौरभ 27 नवंबर को कमासिन में चल रहे पीसीएफ धान खरीद केंद्र पर अचानक पहुंच गए. वहां मौजूद किसान अभि‍मन्यु सिंह और ब्रह्मानंद ने एसडीएम से शि‍कायत की कि केंद्र प्रभारी नत्थू प्रसाद किसानों से पल्लेदारी के नाम पर प्रति क्विंटल 40 रुपए कमिशन ले रहे हैं. किसानों ने घटतौली की भी शि‍कायत की. सौरभ ने क्रय केंद्र पर तौल कर रखे गए धान के बोरों की दोबारा तौल कराई तो हर बोरे में तीन से छह किलो तक धान अधि‍क निकला. एसडीएम ने क्रय केंद्र प्रभारी के खि‍लाफ एफआइआर दर्ज करा दी.

मूल्य समर्थन योजना के तहत 1 अक्तूबर से उत्तर प्रदेश में शुरू हुई धान खरीद पारदर्शिता के सरकारी दावों के बावजूद भ्रष्टाचार की भेंट चढ़ गई है. दो महीने के भीतर दोषि‍यों पर हुई कार्रवाई खरीद प्रक्रिया से किसानों को हो रही दिक्कतों की ओर इशारा करती है. क्रय केंद्र के बाहर किसान ट्रैक्टर-ट्रॉलियों में धान लादकर बेचने का इंतजार करने को विवश हैं. धान खरीद में लापरवाही बरतने के आरोप में औरैया में यूपी कोऑपरेटिव यूनियन और यूपी उपभोक्ता सहकारी संघ के जिला प्रबंधक, सोनभद्र में यूपी सहकारी संघ (पीसीएफ) के जिला प्रबंधक, कानपुर मंडल में पीसीएफ के क्षेत्रीय प्रबंधक को निलंबित कर दिया गया है. इसके अलावा खरीद एजेंसियों के 130 कर्मचारियों पर भी कार्रवाई की गई है. सहकारिता विभाग के आयुक्त और निबंधक एम.वी.एस. रामी रेड्डी बताते हैं, ''सहकारी समितियों के धान खरीद क्रय केंद्रों पर उदासीनता और अनियमितता में 33 केंद्र प्रभारियों के खि‍लाफ एफआइआर और 24 केंद्र प्रभारी सचिवों को प्रतिकूल प्रविष्टि दी गई है.''

किसान, माफि‍या और लेखपाल का गठजोड़

लखीमपुर जिले की मितौली तहसील के औरंगाबाद धान क्रय केंद्र में धान खरीद माफि‍याओं ने किसानों के फर्जी दस्तावेज के आधार पर धान बेचने के लिए ऑनलाइन आवेदन किए थे. मितौली के एसडीएम दिग्विजय सिंह‍ ने जब स्थानीय लेखपाल से आवेदनों का सत्यापन कराया तो पता चला कि 26 संदिग्ध किसानों ने अलग-अलग 200 क्विंटल से अधि‍क धान बेचने के लिए आवेदन किया था. इनमें कुछ ऐसे भी थे, जिन्होंने खेत के अनुपात से कहीं अधि‍क धान बेचने का आवेदन किया था. कई आवेदक ऐसे भी थे, जिनके खेत में केले की फसल लगी पाई गई. गहन पड़ताल करने पर सामने आया कि ये 26 संदिग्ध किसान असल में बिचौलिये हैं, जो गरीब किसानों का धान सस्ते में खरीदकर उसे सरकारी क्रय केंद्र पर एमएसपी पर बेच रहे हैं. ऐसी शिकायतें राज्य में कई जिलों से आ रही हैं.

असल में यूपी में इस वर्ष करीब 260 लाख मीट्रिक टन धान की पैदावार हुई है. इसमें 55 लाख मीट्रिक टन की सरकारी खरीद की जानी है. इस वर्ष कोरोना संक्रमण के कारण लॉकडाउन और उसके बाद विभि‍न्न समारोहों पर प्रतिबंध के चलते धान की खपत अपेक्षाकृत कम है. इस वजह से खुले बाजार में सामान्य धान 1,000 रुपए प्रति क्विंटल के आसपास बिक रहा है. जबकि सरकार इसे 1,868 रुपए प्रति क्विंटल खरीद रही है. खरीद मूल्य में यही बड़ा अंतर धान खरीद माफि‍याओं को लुभा रहा है. धान खरीद की निगरानी में लगे खाद्य और रसद विभाग के अधि‍कारियों को कुछ ऐसे बड़े किसानों के बारे में भी जानकारी मिली है, जिन्होंने अपने खेत की खतौनी और अन्य दस्तावेज माफि‍याओं को देकर अवैध रूप से उनका धान बिकवाया. खरीद का पैसा इन बड़े किसान के खाते में आया. किसान ने प्रति बीघा 200 से 300 सौ रुपए के हिसाब से अपना हिस्सा लेकर बाकी पैसा माफि‍याओं को सौंप दिया. नतीजतन, सरकारी दस्तावेजों में तो किसान से ही धान खरीद दर्ज हुई. 

आंकड़ो में सरकारी खरीद

सरकार की हाइटेक धान खरीद में बड़े किसान और माफियाओं के गठजोड़ ने सेंध लगा दी है. धान बेचने वाले किसानों के खेतों का सत्यापन लेखपाल के जरिए कराया जा रहा है. बांदा के महोखर गांव निवासी दयाशंकर तिवारी 7 नवंबर को धान लेकर स्थानीय मंडी पहुंचे लेकिन उनका धान नहीं खरीदा गया. तिवारी बताते हैं, ''मैंने जारी गांव में 20 बीघे जमीन पर धान की फसल तैयार की थी और रजिस्ट्रेशन भी कराया था. लेखपाल ने दिखा दिया कि मेरे खेत में धान है ही नहीं. ऐसे में रजिस्ट्रेशन निरस्त हो गया.''

धान खरीद प्रक्रिया में लेखपालों की मनमानी भी किसानों का दर्द बढ़ा रही है. बिना मौके पर गए ही खेतों में धान की फसल का सत्यापन करके लेखपाल धान खरीद माफि‍याओं की मदद कर रहे हैं. खाद्य आयुक्त मनीष चौहान कहते हैं, ''मैं स्वयं धान खरीद प्रक्रिया की पूरी निगरानी कर रहा हूं. किसी भी जगह पर गड़बड़ी की शि‍कायत मिलने पर फौरन कार्रवाई की जा रही है.''

रिकवरी 57 किलो, सरकार को चाहिए 67 किलो

धान की कुटाई और चावल रिकवरी को लेकर बने कानून काफी पुराने हो जाने की वजह से भी खरीद प्रक्रिया विवादों में आ रही है. क्रय केंद्रों से खरीदा गया धान राइस मिलों को भेजा जाता है. राइस मिलें धान से चावल निकालकर इसे भारतीय खाद्य निगम (एफसीआइ) को भेजती हैं. करीब छह दशक पहले बने कानून के मुताबिक, राइस मिलों को एक क्विंटल धान के बदले 67 किलोग्राम चावल खाद्य निगम को देना होता है. खरीफ की फसल के दौरान अनियमित बारिश होने से धान की कमजोर गुणवत्ता और हाइब्रिड प्रजातियों के कारण रिकवरी रेट भी घटी है. गोंडा के एक राइस मिल संचालक अजय सिंह बताते हैं, ''अब बड़ी मुश्कि‍ल से 57 प्रतिशत तक ही चावल की रिकवरी हो रही है. इसमें भी 40 से 50 फीसद तक ब्रोकेन है जबकि खाद्य निगम 25 फीसद तक ही स्वीकार करता है. ब्रोकेन बढ़ने या गुणवत्ता खराब होने से एक क्विंटल में करीब 35 किलो चावल ही बचता है.''

इतना ही नहीं, राइस मिलें कुटाई की दर बढ़ाने की मांग भी कर रही हैं. यूपी राइस मिलर्स एसोसिएशन के महामंत्री विनय शुक्ल बताते हैं कि 1984 में डीजल 50 पैसे लीटर था तब धान की कुटाई 10 रुपए क्विंटल थी. 2020 में भी कुटाई की दर 10 रुपए ही है जबकि डीजल 70 रुपए से ऊपर निकल गया है. शुक्ल ने प्रमुख सचिव खाद्य और खाद्य आयुक्त को पत्र लिखकर कुटाई और रिकवरी के नियम नए सिरे से तय करने की मांग की है.

आढ़तियों को बेचने की मजबूरी

गोंडा के मनकापुर इलाके में रहने वाले किसान रामसरन आजाद 20 बीघे खेत को बंटाई पर लेकर खेती करते हैं. यह खेत उनके गांव के एक सेवानिवृत्त डॉक्टर का है, जो अब अपने परिवार के साथ दिल्ली में रहते हैं. अपने नाम से खेत के कागजात और बैंक एकाउंट न होने से रामसरन ने 80 क्विंटल धान नवाबगंज इलाके के एक आढ़ती को 800 रुपए प्रति क्विंटल के हिसाब से बेच दिया. वहीं बाराबंकी में जैदपुर से सिद्धौर की ओर जाने वाली सड़क पर कदम-कदम पर धान को सेलहा धान बनाने का कुटीर उद्योग दिखाई देता है. भट्ठियों में चढ़ी पतीली पर धान को उबालने के बाद उसे सड़क पर ही किनारे बिछाकर सुखाया जा रहा है. सेलहा धान बनाने के ये कुटीर उद्योग उन गरीब किसानों का धान खरीदने के बड़े केंद्र के रूप में उभरे हैं, जो अपनी फसल का अच्छा दाम पाना चाहते हैं. सिद्धौर के मोहल्ला अली अकबर में सेलहा धान तैयार करने का काम करने वाले राम सागर बताते हैं, ''साधारण धान को सेलहा धान में तब्दील करने के बाद यह 1,500 से 1,700 रुपए प्रति क्विंटल की दर से बिक जाता है.''

सोनभद्र के बड़े किसान राकेश सिंह पटेल का कहना है कि प्रदेश की आदित्यनाथ सरकार किसानों की आय दोगुनी करने का प्रयास कर रही है लेकिन यह यहां कुल पैदा हुए धान का महज 20 प्रतिशत ही खरीदकर नहीं हो सकता. पटेल का सुझाव है, ''सरकार को इस दिशा में प्रयास करना चाहिए कि खुले बाजार में धान का अच्छा मूल्य मिले और सरकारी खरीद केवल उन्हीं किसानों से हो जो गरीब हैं.'' विरोधाभासी तथ्य यह है कि जो गरीब किसान है, वह असल में खेतिहर मजदूर है. ऑनलाइन पंजीकरण की व्यवस्था में शामिल होने के लिए उसके पास न तो अपने खेत के कागजात हैं और न ही बैंक एकाउंट के दस्तावेज. गरीब किसान के पास केवल उसकी मेहनत है जिसका उचित मूल्य निर्धारित करना सरकार के सामने सबसे बड़ी चुनौती है. —साथ में संतोष पाठक

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