पुस्तक समीक्षाः हमारे समय की लोक कथाएं
मनोज ने इस संग्रह के लिए एक काल्पनिक देश 'स्वर्णदेश’ की रचना की है जिसका राजा प्रजा के लिए समर्पित है.

पल्लव
साहित्य में किसी भी विधा की शक्ति और संभावना उसमें किए जा रहे लेखन के 'रूप’ से ही जानी जा सकती है. लेकिन विधा के वास्तविक विकास के लिए यह भी आवश्यक है कि अंतर्वस्तु से ही रूप का निर्माण भी हुआ हो. मनोज कुमार पांडेय बदलता हुआ देश शीर्षक से आए चौथे कहानी संग्रह में कहानी के अपने प्रचलित मुहावरे से भिन्न कथा-भंगिमा का प्रयास करते हैं.
ये कथाएं विजयदान देथा के मुहावरे में कदीमी अर्थात प्राचीन प्रतीत होती हैं लेकिन जिस तरह मनुष्य का स्वभाव, इच्छाएं और जीवन-परिणितियां शाश्वत ढंग की हैं वैसे ही ये प्राचीन प्रतीत होती कथाएं वस्तुत: आधुनिक हैं. इनके आधुनिक होने का सबसे बड़ा लक्षण यह है कि जीवन की वास्तविक चिंताओं और बेहतर जीवन की वास्तविक प्रतिज्ञाओं को इनमें देखा जा सकता है.
मनोज ने इस संग्रह के लिए एक काल्पनिक देश 'स्वर्णदेश’ की रचना की है जिसका राजा प्रजा के लिए समर्पित है. देखिये, ''प्रजा की चिंता में राजा को रात-रात भर नींद ही नहीं आती थी बल्कि राजा के अनेक निकटवर्तियों का तो यह भी कहना था कि राजा ने प्रजा के हित में अपनी नींद का सुख हमेशा हमेशा के लिए त्याग दिया था.
अपनी बातों के प्रमाणस्वरूप वे राजा की आंखों की सदा बनी रहने वाली लालिमा का जिक्र करते थे जो कि राजा की आंखों में हमेशा बनी रहती थी.” आगे इस स्वर्णदेश की विभिन्न कथाएं हैं जिनमें पहली है, 'सारे निजी काम बाएं हाथ से करें’, असल में राजा को ख्याल आया कि देश के विकास में एक समस्या यह है कि प्रजा एक हाथ से ही काम करती है जिससे दूसरा हाथ यानी बायां हाथ बेकार रहता है.
'बेरोजगारी समाप्त करने के रामबाण उपाय” और 'किसान आत्महत्या आयोग का पत्र’ इसी भाव शृंखला की अगली कहानियां हैं जिनमें स्वर्ण देश की प्रजा और राजा के मौलिक चिंतन से पाठक लाजवाब होता है. जैसे—'तो सुनिए. असली बात यह है कि बेरोजगारी कोई समस्या है ही नहीं. यह काहिली के संस्कार हैं जो आपको बताते हैं कि आप बेरोजगार हैं. एक बार जैसे ही आप इससे मुक्त होंगे, यह समस्या हमेशा के लिए समाप्त हो जाएगी.’
कहानीकारों की नयी पीढ़ी में मनोज इसलिए अलहदा हैं क्योंकि उनकी कहानियां हिंदी के जातीय गद्य के 'पाठ सुख’ का अनुपम उदाहरण भी बन सकी हैं जिसके लिए कथा की अंतर्वस्तु और कहन की वक्रता को समान श्रेय देना होगा. प्रहसन जैसी लगती इन कथाओं की शक्ति इनमंत मौजूद विडंबनाओं से आंकी जा सकती है. कहना न होगा कि ये कथाएं अपनी परंपरा में एक तरफ भारतेंदु और परसाई के लेखन की याद दिलाती हैं तो दूसरी तरफ मनोज की कथन-भंगिमा इन्हें देर तक याद रखने योग्य रचनाओं का रूप देने में सफल हुई है.
—पल्लव
बदलता हुआ देश
मनोज कुमार पांडेय
राजकमल प्रकाशन, दिल्ली
कीमत: 395 रुपए