मोर्चे पर सबसे आगे
कोरोना वायरस के खिलाफ असली लड़ाई का मैदान तो देश के जिले हैं, जहां प्रशासनिक अधिकारी महामारी से निपटने के दौरान गढ़ रहे हैं नई इबारतें.

कपड़ों के लिए मशहूर राजस्थान का भीलवाड़ा शहर मार्च के आखिरी हफ्ते तक 27 पॉजिटिव मरीजों और दो मौतों के साथ कोविड-19 का हॉटस्पॉट बन चुका था. जिला प्रशासन फौरन हरकत में आया और उसने कर्फ्यू लगाकर लॉकडाउन की रणनीति पर पूरी कड़ाई से अमल किया. जिले को अलग-थलग कर दिया गया, तमाम हॉटस्पॉट की पहचान की गई, घर-घर जांच के साथ बीमारी के संपर्क में आने वाले एक-एक शख्स का आक्रामक ढंग से पता लगाया गया.
वहीं क्वारंटीन सुविधाओं और आइसोलेशन वार्ड सहित स्वास्थ्य सेवाओं के बुनियादी ढांचे में बढ़ोतरी की गई. अनिवार्य वस्तुएं लोगों के दरवाजों तक पहुंचाई गईं ताकि वे घरों के अंदर रहें. इस सबका नतीजा यह हुआ कि भीलवाड़ा जिले में 30 मार्च से कोविड-19 का एक भी नया मरीज नहीं है. यही नहीं, जो 27 लोग संक्रमित हुए थे, उनमें से 17 भले-चंगे हो चुके हैं.
भीलवाड़ा मॉडल राज्य के दूसरे जिलों में दोहराया जा रहा है और देश भर में इसकी भूरि-भूरि प्रशंसा हुई है. इस कामयाब रणनीति की योजना बनाने और इसे अमल में लाने के पीछे यहां के जिला मजिस्ट्रेट राजेंद्र भट्ट थे. 2007 में आइएएस में शरीक इस 57 वर्षीय अधिकारी की तरह पूरे देश में कई और प्रशासनिक अधिकारी हैं जो कोरोना वायरस के खिलाफ देश की लड़ाई में अहम भूमिका अदा कर रहे हैं.
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की केंद्र सरकार जहां राष्ट्रीय रणनीति की अगुआई कर रही हैं, वहीं जिले इस लड़ाई के ग्राउंड जीरो हैं और असली लड़ाई यहीं लड़ी जा रही है. जिला प्रशासक यह लड़ाई कई मोर्चों पर लड़ रहे हैं और इसके बीच उन्हें हर वह कदम उठाना होता है जो इस वायरस को फैलने से रोक सके. उनका काम सिर्फ वायरस के प्रकोप की रोकथाम तक ही खत्म नहीं होता, अब उन्हें देश की आॢथक गतिविधियों को पटरी पर लाने में अपनी भूमिका का निर्वाह करना है. अपने कार्यक्षेत्र में आने वाली फैक्ट्रियों को चलवाना और खेती-किसानी से जुड़े कामों को पटरी पर लाना भी अब जिला प्रशासन के जिम्मे है.
यहीं से जिलों में नेतृत्व की भूमिका अहम हो जाती है. भट्ट की तरह देश भर में तैनात उनके साथियों को पिछले कुछ दिनों में सबसे बड़ी चुनौती का सामना पड़ा है. देश में स्वास्थ्य सेवाओं के खस्ताहाल बुनियादी ढांचे और कमजोर सामाजिक सुरक्षा व्यवस्था ने उनके काम को और भी मुश्किल और पेचीदा बना दिया, जबकि उन्हें जिंदगी और आजीविकाओं की रक्षा के बीच कड़े संतुलन के साथ आगे बढऩा पड़ा. रोज काफी देर तक मोर्चे पर डटे रहकर, हर नई उभरती परिस्थिति के जवाब में तेजी से और अनोखे ढंग से सोचकर जहां भी जरूरी हुआ वहां सख्त प्रशासक की भूमिका अख्तियार करके वे इस चुनौती पर लगातार खरे उतरे. उन्होंने स्वास्थ्यकर्मियों, म्युनिसिपल कर्मचारियों और पुलिस बलों के साथ खड़े रहकर खुद संक्रमित होने का जोखिम मोल लिया.
यहां ऐसे ही 16 जिला योद्धाओं की कहानियों में आपको कोविड-19 के खिलाफ देश की उस लड़ाई की एक झलक मिलेगी जो बिल्कुल अगली कतार के मोर्चों पर लड़ी जा रही है. उनकी इन कहानियों में देश भर के जिलों में फैले उनके बहुतेरे अन्य साथियों के प्रयासों और त्याग की कहानियां भी गुंथी हुई हैं. कोविड-19 से लड़ाई की जिलों की ये दास्तानें आपको बताएंगी कि जमीनी स्तर पर काम करना किस कदर मुश्किल और चुनौतीपूर्ण होता है लेकिन हर परिस्थिति में सूझबूझ से रास्ता निकल जाता है.
शशांक कोडुरू, 34 वर्ष
कलेक्टर
करीमनगर, तेलंगाना
कुछ क्षेत्र 2,128 वर्ग किमी
आबादी 10,04897
मरीज 19, ठीक हुए 8, मौत 0
एक कदम आगे
करीमनगर में 13 मार्च को एक इंडोनेशियाई इस्लामी प्रचारक के पॉजिटिव होने का पता चला, जो जिले में पहला मरीज था. कोंडुरु ने तभी भांप लिया कि उनके सामने असाधारण चुनौती आ गई है. यह धर्मप्रचारक इंडोनेशिया से आए 16 सदस्यों के समूह का हिस्सा था और दिल्ली में हुए तद्ब्रलीगी जमात के जमावड़े में शरीक हुआ था. उसके टेस्ट का पॉजिटिव निकलना मरकज के देश में 'सुपरस्प्रेडर' के तौर पर उभरने का सबसे पहला संकेत था.
कुछ ही दिनों बाद 23 मार्च को संक्रमित हुआ पहला स्थानीय शख्स सामने आया, जो इंडोनेशियाई लोगों के संपर्क में आए पहले लोगों में था. कोंडुरु ने आइडीएसपी (इंटीग्रेटेड डिजीज सर्विलांस प्रोग्राम) के जरिए उनके संपर्क में आए लोगों की पड़ताल शुरू कर दी और पुलिस की टीमों ने उन तमाम रास्तों और इलाकों की पहचान की, जहां से वे गुजरे थे. उनकी आवाजाही उनके ठहरने की जगह और करीमनगर की एक मस्जिद तक सीमित थी. इस तरह उन्होंने केंद्र और बफर इलाकों की निशानदेही की और रैपिड हेल्थ सर्वे तथा साफ-सफाई के विशेष अभियान शुरू कर दिए.
करीमनगर शहर में दरवाजे-दरवाजे जाकर 13,428 घरों का सर्वे किया गया. वायरस के संभावित वाहक के तौर पर कोई 70 लोगों की पहचान की गई. हालांकि उनमें से एक को छोड़कर सब निगेटिव निकले, लेकिन सभी को क्वारंटीन में रखा गया. कोंडुरु समुदाय के बड़े लोगों तक पहुंचे, उनका भरोसा हासिल किया और उन्हें अपनी इच्छा से नियमों का पालन करने के लिए प्रोत्साहित किया.
उधर, करीमनगर के जिला अस्पताल (डीएच) में 25 बिस्तरों की आइसीयू सुविधा और छह वेंटीलेटर सहित 200 बिस्तरों के कोविड वार्ड का इंतजाम किया गया. अस्पताल में सुविधा जहां मध्य मार्च तक तैयार हो गई, वहीं कोंडुरु करीमनगर में दो निजी मेडिकल कॉलेजों—चलमेड़ा और प्रथिमा—को भी इस लड़ाई में साथ ले आए.
व्यवस्थाओं का निर्माण, जवाबदेही तय करना और काम करने का एकाग्र ढंग कोंडुरु की कार्यशैली की खासियतें हैं. वे स्वीकार करते हैं, ''महामारी सरीखी स्थिति में समुदाय का भरोसा हासिल करना एक चुनौती है. लगातार संवाद ने इसमें मदद की. इलाका या व्यक्ति चाहे जो रहा हो, व्यवस्थित तरीके और नियम-कायदों के अनुपालन की बदौलत हम सबका भरोसा हासिल कर सके.'' करीमनगर सांप्रदायिक तौर पर बहुत संवेदनशील नहीं है, पर खटास बढऩे का जोखिम तो था ही. मुख्यमंत्री के. चंद्रशेखर राव ने अपने पूर्व लोकसभा क्षेत्र करीमनगर आने का ऐलान किया था लेकिन बाद में इरादा छोड़ दिया. यह उनका लोकसभा क्षेत्र रहा है जिसकी नुमाइंदगी अब भाजपा सांसद कर रहे हैं.
खासियत
कोर टीम और अफसरों के साथ रोज मीटिंग की ताकि व्यवधान डालने वालों पर नकेल कसी जाए और गाइडलाइंस का पालन कराया जाए
कामकाज का पैमाना
उन्होंने 250 बिस्तरों का क्वारंटीन सेंटर कोविड संक्रमण के शुरुआती मामलों के लिए मार्च के शुरू में ही तैयार किया; कोविड-19 की टेलीमेडिसिन सुविधा शुरू की; हेल्पलाइन लांच की; महामारी फैलने की हालत में लोगों की मनोवैज्ञानिक मदद के लिए चेयुथा सेवा शुरू की.
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