भाजपाः नब्ज से छूटती पकड़

मध्य भारत के बड़े हिस्से में भाजपा के हाथ से सरक रहे इस बड़े वोट बैंक पर अमूमन कांग्रेस ने (और झारखंड में झामुमो) ने हाथ साफ किया है

एएनआइ
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जब मामला चुनाव का हो तो अंकगणित पर केमिस्ट्री भारी पड़ जाती है. झारखंड में रघुबर दास की अगुआई वाली भाजपा के चुनावी प्रदर्शन ने तो यही साबित किया कि उसके अभियान में इन दोनों में तालमेल की कमी थी. प्रदेश भाजपा नेताओं का एक धड़ा आदिवासी आबादी की नाराजगी को इस हार की वजह मान रहा है.

2011 की जनगणना के मुताबिक, सूबे में अनुसूचित जनजाति (एसटी) की करीब 26.3 फीसद आबादी के लिए विधानसभा की 28 सीटें आरक्षित हैं. 2014 में भाजपा ने राज्य में अपना बेहतरीन प्रदर्शन किया था और उसके खाते में 37 सीटें आई थीं. तब एसटी समुदाय के बड़े तबके ने उसके पक्ष में वोट किया था और भाजपा को खुद को आदिवासी वोटों का हकदार बताने वाली पार्टी झारखंड मुक्ति मोर्चा (झामुमो) के लगभर बराबर सीटें हासिल हुई थीं. तब भाजपा को 11 और झामुमो को 13 सीटें मिली थीं. पांच साल के बाद, झामुमो-कांग्रेस-राजद गठजोड़ ने 28 में से 25 जनजातीय सीटों पर कब्जा कर लिया है, और भाजपा महज दो सीटों पर सिमट गई है.

झामुमो के एक वरिष्ठ नेता कहते हैं, ''भाजपा पर आदिवासियों का कोई भरोसा नहीं बचा है इसलिए आदिवासियों के बड़े तबके ने भाजपा को वोट नहीं किया है.''

राज्य की चार प्रमुख जनजातियों, संथाल, मुंडा, हो और उरांव में से भाजपा को पारंपरिक रूप से मुंडाओं का समर्थन हासिल रहा है जबकि झामुमो को संथालों का वोट मिलता है. पर इस चुनाव में मुंडाओं ने भी भाजपा का साथ छोड़ दिया लगता है.

पिछले चुनाव के बाद भाजपा ने सूबे में आदिवासी मुख्यमंत्री की परंपरा को बदलते हुए गैर-आदिवासी रघुबर दास को कुर्सी सौंपी और इसके जरिए पार्टी गैर-यादव पिछड़ा वर्ग का वोट साधने की कोशिश में थी. भाजपा के समीकरण में आदिवासी मुंडाओं के अपने पारंपरिक वोट के साथ गैर-मुस्लिम, गैर-आदिवासी वोटों को समेटने का गणित था.

लेकिन दास बेहतर प्रशासक साबित नहीं हुए. काश्तकारी नियमों में बदलाव और 2017 का धर्मांतरण विरोधी विधेयक का दास का दांव उलटा पड़ गया.

प्रदेश भाजपा के एक वरिष्ठ नेता मानते हैं कि आदिवासियों का गुस्सा शुरू से ही दिखने लगा था, हालांकि पार्टी नेतृत्व ने उसको नजरअंदाज किया. दिसंबर, 2015 से दिसंबर, 2018 के बीच राज्य में 7 विधानसभा सीटों पर हुए उपचुनावों में भाजपा महज एक सीट ही जीत पाई.

झारखंड में यह पराजय हिंदी पट्टी के चार राज्यों में एससी और एसटी वोटों पर भाजपा की ढीली होती पकड़ का भी संकेत है.

झारखंड समेत हालिया चार विधानसभा चुनावों में एससी-एसटी आरक्षित सीटों पर भाजपा ने पांच साल पहले के मुकाबले बेहद खराब प्रदर्शन किया है और कुल 217 आरक्षित सीटों में से 70 फीसद सीटों पर उसे हार का सामना करना पड़ा है. 2013-14 में उसने इनमें से करीब तीन-चौथाई सीटें जीती थी.

छत्तीसगढ़ में करीब 31 फीसद आदिवासी आबादी के लिए 29 सीटें आरक्षित हैं पर भाजपा सिर्फ तीन पर जीत हासिल कर पाई. पिछले चुनाव के मुकाबले भाजपा को आठ सीटों का नुक्सान झेलना पड़ा. 2013 में भाजपा ने 11 और 2008 में 19 एसटी सीटें जीती थीं. इसके उलट कांग्रेस ने 25 एसटी सीटों पर कब्जा किया.

सूबे में आदिवासियों का असंतोष अपने निवर्तमान विधायकों पर फूटा था और 12 निवर्तमान विधायकों को आदिवासी वोटरों ने पटखनी दे दी थी, इनमें से 9 भाजपा के थे.

मध्य प्रदेश में 21 फीसद आदिवासी आबादी और कुल 47 एसटी सीटों में भाजपा 16 पर सिमट गई और उसे पिछले चुनाव की बनिस्बत 15 सीटों का नुक्सान झेलना पड़ा.

उधर, राजस्थान की 25 एसटी सीटों में भी भाजपा को 2013 के चुनाव के मुकाबले 8 सीटों का नुक्सान हुआ और वह 10 सीटों पर सिमट गई.

मध्य भारत के बड़े हिस्से में भाजपा के हाथ से सरक रहे इस बड़े वोट बैंक पर अमूमन कांग्रेस ने (और झारखंड में झामुमो) ने हाथ साफ किया है और कांग्रेसमुक्त भारत का नारा देने वाले भाजपा नेतृत्व को इस पर वाकई चिंता और चिंतन करने की जरूरत है.

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