अंदेशे से उपजा आंदोलन

सीएए और एनआरसी का विरोध, प्रदर्शन से आगे बढ़ते हुए एक आंदोलन बनता गया जिसने सरकार की चिंता बढ़ा दी

कमर सिब्तैन
कमर सिब्तैन

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी बीते 22 दिसंबर को जब रामलीला मैदान में पूरे आक्रोश के साथ यह बोल रहे थे कि उनकी सरकार में एनआरसी (नेशनल रजिस्टर ऑफ सिटिजन्स) की कोई चर्चा तक नहीं हुई है और विपक्ष झूठ फैला रहा है तो तत्काल ही सोशल मीडिया पर एनआरसी को लेकर राष्ट्रपति के अभिभाषण से लेकर गृह मंत्री अमित शाह के संसद में दिए बयान वायरल होने लगे. इतना ही नहीं, जब प्रधानमंत्री के भाषण के बाद 24 दिसंबर को गृह मंत्री एक साक्षात्कार में मोदी के बयान को सही ठहरा रहे थे, उसी वक्त सीधा प्रसारण में लोगों की जो प्रतिक्रिया आ रही थी, उसमें सीएए (नागरिकता संशोधन कानून) और एनआरसी के समर्थन के साथ ही इसके विरोध की बातें तो आ ही रही थीं. लोग यह भी प्रतिक्रिया दे रहे थे कि महंगाई, बेरोजगारी, किसानों की समस्याओं और अर्थव्यवस्था पर चुप्पी क्यों है. वे इस मुद्दे पर साक्षात्कार क्यों नहीं देते, इतनी तत्परता क्यों नहीं दिखती.

दरअसल, ये सारी बातें लोगों के उस आक्रोश को प्रकट कर रही हैं जो मोदी-2 सरकार बनने के बाद से भड़कने के कगार पर थी और सीएए तथा एनआरसी के मुद्दे ने उसे प्लेटफॉर्म प्रदान कर दिया. सीएए के विरोध में भारी संख्या में उतरे छात्रों और आम लोगों ने इसे महज विरोध की जगह आंदोलन के रूप में स्थापित कर दिया है जिसकी आग थामने की कोशिश प्रधानमंत्री ने 22 दिसंबर के अपने भाषण में की तो है पर सोशल मीडिया के इस युग में यह आंदोलन थमने की जगह और मजबूत आकार लेता दिख रहा है. हालांकि भाजपा के लोग सीएए के विरोध को आंदोलन मानने से इनकार कर रहे हैं. भाजपा का कहना है, ''देश के ज्यादातर हिस्सों में शांति है. कुछ विश्वविद्यालयों के छात्रों को बरगलाया गया है और वे प्रदर्शन का हिस्सा बन गए हैं. लेकिन अब स्थिति सामान्य होती जा रही है. लोगों को विपक्ष की साजिश का पता चल गया है.''

आंदोलन की एनसाइक्लोपीडिया ब्रिटेनिका की परिभाषा को देखें तो सीएए और एनआरसी को लेकर विरोध, आंदोलन की शक्ल ले चुका है. परिभाषा के मुताबिक ''सामाजिक आंदोलन में व्यक्ति खुद का ऐसे दूसरे लोगों से जुड़ाव महसूस करता है जो मौजूदा राजकीय व्यवस्था से असंतुष्टि का भाव रखते हैं.'' कांग्रेस मीडिया विभाग के प्रमुख रणदीप सिंह सुरजेवाला कहते हैं, ''देश भर के विश्वविद्यालयों के छात्र, आम लोग, महिलाएं, गरीब तबका सभी सीएए के विरोध में प्रदर्शन कर रहे हैं. पुलिस छात्रों पर लाठी-डंडे बरसा रही है. उन्हें गोली मारी जा रही है. 20 से ज्यादा लोग मारे गए हैं तो निश्चित रूप से यह सिर्फ प्रदर्शन नहीं बल्कि आंदोलन है जिसे कुचलने की कोशिश सरकार लगातार कर रही है.''

तो क्या यह आंदोलन सीएए और एनआरसी के खिलाफ है? राजनैतिक मामलों के जानकार एन. अशोकन कहते हैं, ''इसे सिर्फ एनआरसी या सीएए से जोडऩा ठीक नहीं है. पिछले साढ़े पांच साल में ऐसी कई बातें हुईं जिससे लोग परेशान हुए. लोगों को सरकार से काफी उम्मीद थी. नोटबंदी, जीएसटी जैसे मुद्दों पर सरकार को लोगों का साथ मिला. पर 2019 में जीत के बाद अर्थव्यवस्था की दुर्गति हो गई. लोगों को रोजगार नहीं मिला. जरूरी वस्तुए महंगी हो गईं. किसानों की परेशानी कम नहीं हुई. इन सब का आक्रोश बढ़ता गया और सीएए तथा एनआरसी एक इंजन के रूप में काम कर गए. बात सिर्फ एनआरसी या सीएए की रहती तो शायद यह आंदोलन जल्द ही थम जाता पर दूसरे मुद्दे ऐसे हैं जिसकी ताकत पर इस आंदोलन के निर्णायक मुकाम तक पहुंचने की संभावना है.'' लोग दरअसल सरकार की नीतियों से नाराज हैं.

हालांकि, टीएमसी, कांग्रेस, वामपंथी दलों की एक बड़ी चिंता यह दिख रही है कि इस आंदोलन का कोई नेता नहीं है और नेता के बिना आंदोलन लंबा नहीं खिंचता है. जेपी आंदोलन या अण्णा आंदोलन की सफलता के पीछे नेतृत्व था, पर सीएए या एनआरसी के मुद्दे पर ऐसा नहीं है. टीएमसी नेता डेरेक ओब्रायन कहते हैं, ''यह स्वत: स्फूर्त आंदोलन है. नेता होना जरूरी नहीं है. निर्भया आंदोलन में भी कोई नेता नहीं था.'' समाजवादी पार्टी के एक नेता कहते हैं कि सोशल मीडिया के जमाने में मुद्दे का नेतृत्व सोशल मीडिया करता है, ज्यादा लोकतांत्रिक तरीके से. यहां से बातें देश और दुनिया में पहुंचती हैं.

भाजपा ने यह कोशिश की थी कि इस आंदोलन को मुसलमानों तक जोड़ कर रख दिया जाए. प्रधानमंत्री ने झारखंड की चुनाव रैली में कहा था कि आंदोलनकारियों को उनके कपड़ों से पहचाना जा सकता है. लेकिन सबके सामने यह बात दिख रही है कि आंदोलनकारी तिरंगा लेकर या संविधान की किताब लेकर प्रदर्शन कर रहे हैं. जद (यू) के एक नेता कहते हैं यह अच्छी बात है कि राजनैतिक दल इसमें ज्यादा सक्रिय नहीं हो रहे हैं. उनके मोर्चा संभालते ही आंदोलन अपनी राह से भटक सकता है. सुरजेवाला कहते हैं कि आंदोलन को कांग्रेस और दूसरे दलों का समर्थन है. चूंकि यह आंदोलन लोगों का है इसलिए खुद लोग ही इसका नेतृत्व कर रहे हैं. आंदोलनकारियों के खिलाफ सरकार की दमन की नीति का कांग्रेस जमकर विरोध कर रही है और आगे भी करेगी.

फिलहाल यह मुद्दा पहली बार केंद्र सरकार के खिलाफ सबसे मजबूत विरोध के रूप में सामने आया है. सरकार की चुनौती इसलिए बड़ी है क्योंकि उसकी कई नीतियों से ऊबे हुए लोग एक मुद्दे पर एकजुट हो गए हैं. मोदी सरकार को पहली बार ऐसी स्थिति का सामना करना पड़ा है.जब तक आम लोगों से जुड़े हुए मुद्दे हल नहीं होंगे, सीएए या एनआरसी के बहाने विरोध की गर्मी बरकरार रहेगी क्योंकि लोग सोशल मीडिया पर काफी सक्रियता से इसकी चर्चा कर रहे हैं.

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