बिहारः 'वापसी' की जोर आजमाइश

पप्पू यादव ने बाढ़ राहत कार्यों में बढ़-चढ़कर हिस्सा लिया और उन्हें पटना विश्वविद्यालय के छात्रसंघ चुनाव में अच्छे नतीजे मिले

सोनू किशन
सोनू किशन

संकट को एक मौके के तौर पर भी देखा जाता है. बिहार में डॉन से नेता बने और पांच बार लोकसभा सांसद रह चुके राजेश रंजन उर्फ पप्पू यादव ने इस साल उस मौके को दोनों हाथों से लपका जब पटना में तूफानी बारिश हुई.

27 सितंबर को शुरू हुई तीन दिन की भीषण बारिश ने आधे से ज्यादा पटना को कमर तक पानी में डुबो दिया था और हजारों की तादाद में लोग बेघर हो गए. पटना की सड़कों पर नावें तैर रही थीं और शहर जलमग्न नजर आ रहा था. उस समय यादव अपनी जन अधिकार पार्टी (जेएपी) के करीब सौ कार्यकर्ताओं के साथ कई दिनों तक पानी से भरे इलाकों में उतरे, लोगों को बचाते रहे और वहां खाना और दवाइयां बांटते रहे.

बाढ़ का पानी जब उतरा तो यादव ने लोगों के लिए चिकित्सा शिविर लगाए. यह आश्चर्य की बात थी कि वे यह सारे काम पटना में कर रहे थे जहां उनका कोई सियासी आधार नहीं माना जाता था. 2013 में बरी होने से पहले हत्या के मामले में जेल में लंबा समय काट चुके 51 साल के इस नेता ने अपने सभी लोकसभा चुनाव कोसी इलाके से जीते हैं जो पटना से करीब 300 किलोमीटर की दूरी पर है.

पटना में बाढ़ के दौरान उनके राहत कार्यों की मेहनत के नतीजे दो महीने बाद नजर आने लगे हैं. 2015 में शुरू की गई जेएपी ने पटना यूनिवर्सिटी के छात्रसंघ चुनाव में खासा फायदा उठाया और अध्यक्ष पद का चुनाव जीत लिया. विजयी प्रत्याशी मनीष ने अपनी जीत का श्रेय यादव के बाढ़ राहत कार्यों को दिया.

बिहार के समग्र सियासी परिदृश्य में जेएपी की यह जीत भले कोई खास मायने न रखती हो पर विश्लेषकों का मानना है कि छोटी-सी पार्टी के लिए यह अच्छी शुरुआत है. जेएपी के एक पदाधिकारी का कहना है, ''लालू प्रसाद भी सियासी रोशनी में तब आए जब वे 1973 में पटना यूनिवर्सिटी छात्रसंघ के अध्यक्ष चुने गए थे. सुशील कुमार मोदी उसी साल छात्रसंघ के महासचिव चुने गए थे.'' जेएपी का कहना है कि यह जीत यादव के लिए बेहतर वक्त में आई है. वे 2019 के आम चुनावों में अपनी मधेपुरा सीट बचाने में नाकाम रहे. उनकी पत्नी रंजीत रंजन भी सुपौल की अपनी सीट गंवा बैठी थीं.

पटना अरसे से भाजपा का गढ़ रहा है. पार्टी ने 2015 में विधानसभा चुनाव में महागठबंधन के हाथों करारी शिकस्त खाई पर उसने पटना में सभी सीटें जीत ली थीं. शहर के नगर निगम पर भी उसी का कब्जा है. अब जेएपी के करीबी लोगों का कहना है कि पार्टी 2020 के विधानसभा चुनाव में पटना की सभी सीटों पर लडऩे की तैयारी कर रही है. यादव भी उनमें से एक सीट पर खड़े हो सकते हैं.

यादव को पता है कि तब तक सरगर्मी कैसे कायम रखी जाए. अक्तूबर में वे कूड़े से लदा ट्रैक्टर चलाने लगे और कूड़े को एक मंत्री के घर उलट देने की चेतावनी दी. हालांकि पुलिस ने उनको रोक लिया. हाल ही में प्याज के संकट के दौरान भी उन्होंने शहर में भाजपा के दफ्तर के सामने लोगों को रियायती दरों पर प्याज बेचा. विश्लेषक मान रहे हैं कि यह खुद को पटना में भाजपा के इकलौते विकल्प के रूप में पेश करने की उनकी कोशिश का हिस्सा है.

वे लंबे वक्त तक अपनी सियासी महत्वाकांक्षाओं का ही शिकार होते रहे हैं. राजद ने 2014 के आम चुनाव के बाद उन्हें पार्टी से निलंबित कर दिया था, जब यह माना जा रहा था कि वे लालू की विरासत को ही हड़पने की कोशिश कर रहे हैं. कांग्रेस और जद (यू) ने पहले ही उनके लिए दरवाजे बंद कर रखे हैं. भाजपा की भी उनमें कोई रुचि नहीं है. ऐसे में यादव के सामने संकट है तो एक मौका भी.

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