भारत के बेस्ट बी स्कूलः सधे कदम से शिखर तक
आइआइएम और कुछ परंपरागत रूप से प्रतिष्ठित निजी मैनेजमेंट स्कूल ही भारत के बिजनेस स्कूलों में सबसे आगे हैं लेकिन कई अन्य ने भी अपने प्रयासों से अपनी वैश्विक रैंकिंग में सुधार किया है.

वर्षों से, इंडिया टुडे ग्रुप की देश के बिजनेस स्कूलों की वार्षिक रैंकिंग को भारत में प्रबंधन शिक्षा की स्थिति पर प्रामाणिक दस्तावेज के रूप में स्वीकार किया जाता रहा है. सर्वेक्षण ने अपने दायरे और विश्लेषण का विस्तार किया है, जो अब संस्थान के बुनियादी ढांचे से लेकर शिक्षा की गुणवत्ता और वहां पढ़ाई पर खर्च किए जा रहे पैसे के रिटर्न तक पर, इससे जुड़े हर परिप्रेक्ष्य को प्रस्तुत करता है. भले ही भारतीय बिजनेस स्कूल अधिकांश वैश्विक संस्थानों की तुलना में अधिक सस्ते हैं फिर भी देश में एक मैनेजमेंट की डिग्री या डिप्लोमा लेना काफी खर्चीला है.
हालांकि, इसके लिए खर्च की जाने वाली धन राशि बहस का विषय हो सकती है, लेकिन शिक्षा की गुणवत्ता पर कोई समझौता नहीं हो सकता. इसी परिप्रेक्ष्य में, इंडिया टुडे ग्रुप के बिजनेस स्कूलों को लेकर किए जाने वाले सर्वेक्षण का महत्व साल-दर-साल बढ़ता जा रहा है. सही बिजनेस स्कूल में दाखिला, अक्सर करियर बनाने या बिगाडऩे में सबसे महत्वपूर्ण कदम होते हैं. भारत में मैनेजमेंट (प्रबंधन) पेशे के लिए सर्वोच्च राष्ट्रीय संस्था ऑल इंडिया मैनेजमेंट एसोसिएशन (एआइएमए) के आंकड़ों के मुताबिक, हर साल भारत के 4,000 बी-स्कूलों से लगभग 3,60,000 एमबीए छात्र स्नातक की डिग्री लेकर निकलते हैं. हालांकि, इनमें से केवल 60 फीसदी स्नातकों को ही नौकरी मिल पाती है.
इसलिए हर साल किया जाने वाला यह सर्वेक्षण मैनेजमेंट की पढ़ाई के इच्छुक छात्रों के लिए मैनेजमेंट शिक्षा के रुझानों को समझने में मददगार साबित होता है. उदाहरण के लिए, बाजार अनुसंधान एजेंसी एमडीआरए की ओर से किए गए इस वर्ष के सर्वेक्षण में 2014 के बाद से बिजनेस स्कूलों के प्रदर्शन का लेखा-जोखा तैयार किया गया है. ऐसा मूल्यांकन इसलिए भी बहुत महत्वपूर्ण हो जाता है क्योंकि आइआइएम और कुछ परंपरागत रूप से प्रतिष्ठित निजी स्कूलों को छोड़कर-शेष सभी बिजनेस स्कूलों को हितधारकों और विशेषज्ञों की नियमित आलोचना का सामना करना पड़ता है.
उदाहरण के लिए, एसोसिएटेड चैंबर्स ऑफ कॉमर्स ऐंड इंडस्ट्री ऑफ इंडिया (एसोचैम) की 2013 की रिपोर्ट 'बी-स्कूल ऐंड इंजीनियरिंग कॉलेजेज शट डाउन-बिग बिजनेस स्ट्रगल' में तीन चेतावनियां दी गईं जो इस प्रकार से हैं:
कई निजी स्कूल कुछ मैनेजमेंट गुरुओं की ओर से निवेश के जरिए कुछ पैसे कमाने के एक बिजनेस मॉडल भर हैं.
कई एमबीए स्कूल मीडिया में बहुत ज्यादा दिखने को आतुर रहते हैं. वे अपनी उपलब्धियों को बताने के लिए प्रमुख अखबारों में कई-कई पन्नों के विज्ञापन देते हैं.
एमबीए को उद्योग में सफलता निश्चित कराने वाला एक अनिवार्य प्रतिष्ठा टैग न मानें... अपनी वर्तमान स्थिति, अपने दीर्घकालिक लक्ष्यों (और शायद) अपने पास उपलब्ध पैसे का भी अच्छे से मूल्यांकन करें.
रिपोर्ट में यह भी दावा किया गया है कि भारतीय प्रबंधन संस्थानों के स्नातकों को छोड़कर, देश के दूसरे बिजनेस स्कूल तेजी से अपनी चमक खो रहे हैं और उनके स्नातकों में से केवल 10 प्रतिशत ही रोजगार के योग्य हैं. छह साल बाद, परिदृश्य ज्यादा नहीं बदला है. वास्तव में, इंडिया टुडे के सर्वेक्षण में पाया गया कि 2014 की तुलना में 2019 में कम निजी बिजनेस स्कूलों को शीर्ष 25 में जगह मिली है. इंडिया स्किल रिपोर्ट 2019 के अनुसार, प्रतिभा मूल्यांकन फर्म व्हीबॉक्स की ओर से तैयार की गई एमबीए की पढ़ाई करने वाले छात्रों की रोजगार योग्यता 2014 में 41.02 प्रतिशत थी, वह 2019 में घटकर 36.44 प्रतिशत रह गई है. इस आंकड़े का सबसे चौंकाने वाला तथ्य यह रहा कि जहां एमबीए में ऐसी गिरावट आई वहीं अन्य सभी स्ट्रीम में पढ़ाई करने वाले छात्रों की रोजगार क्षमता 2014 के 34 प्रतिशत से बढ़कर 2019 में 47 प्रतिशत हो गई.
यहां तक कि वैश्विक सर्वेक्षणों ने भी भारत में प्रबंधन संस्थानों और स्नातकों की गुणवत्ता में इस क्रमिक गिरावट को महसूस किया है. स्विट्जरलैंड स्थित एक शीर्ष वैश्विक बिजनेस स्कूल आइएमडी की ओर से तैयार 2019 की 'वर्ल्ड टैलेंट रिपोर्ट' में 63 देशों में से भारत की रैंकिंग 53वें स्थान पर फिसल गई जो कि 2005 में 29वें स्थान पर थी. इस गिरावट के पीछे जो कारक बताए गए थे उनमें भारत के पाठ्यक्रम का बदले दौर में व्यवसाय की जरूरतों के अनुरूप न होना प्रमुख रहा. यह रैंकिंग कार्यस्थल प्रशिक्षण, शिक्षा और भाषा कौशल जैसे क्षेत्रों में देश की क्षमताओं के मूल्यांकन पर आधारित थी. संकेतकों में स्थानीय प्रतिभाओं को निखारने में किए गए निवेश और प्रतिभाओं को आकर्षित करने और उन्हें बनाए रखने में देशों का प्रदर्शन भी शामिल था.
मैनेजमेंट छात्रों को नौकरी के योग्य न पाए जाने का सबसे बड़ा कारण, जरूरतों के अनुरूप उनके कौशल का न होना पाया गया है. वर्तमान नौकरी बाजार में सबसे बड़ी चुनौतियों में से एक है इस्तेमाल योग्य, व्यावहारिक कौशल की आवश्यकता. 2016 की वर्ल्ड बैंक की एक रिपोर्ट में कहा गया था कि ऑटोमेशन भारत में 69 फीसद नौकरियों की जगह ले लेगा- इससे बिजनेस स्कूलों को नए कौशल का प्रशिक्षण देने की जरूरतें पैदा हुई हैं. हालांकि यह निश्चित रूप से नई चुनौतियां लेकर आता है, लेकिन यह विभिन्न कौशल आवश्यकताओं के साथ नए प्रकार की नौकरियों के अवसर भी साथ लाता है.
बिजनेस स्कूलों को इसको लेकर युद्धस्तर पर तैयारी करने की जरूरत है. विशेषज्ञ अक्सर शिकायत करते हैं कि एमबीए पाठ्यक्रम बाजार की वास्तविकताओं के लिहाज से बहुत पीछे रह गए हैं. इसके अलावा, कई बिजनेस स्कूलों के पाठ्यक्रमों में व्यवहारिक बिजनेस प्रशिक्षण की जगह काफी हद तक शैक्षणिक पहलुओं पर ही ध्यान केंद्रित रहता है. एआइएमए की महानिदेशक रेखा सेठी ने सार्वजनिक रूप से कहा था कि सार्थक इंटर्नशिप और प्लेसमेंट के अवसरों के लिहाज से अधिकांश बी-स्कूल फिसड्डी हैं.
हालांकि, पिछले कुछ वर्षों में मैनेजमेंट स्कूलों ने अपने विद्यार्थियों को इंटर्नशिप के दौरान उद्योगों में व्यवहारिक ज्ञान प्रदान करने के मामले में अच्छा प्रदर्शन किया है. ऑनलाइन प्रशिक्षण और इंटर्नशिप प्लेटफॉर्म इंटर्नशाला के अनुसार, शीर्ष बिजनेस स्कूलों के प्रबंधन स्नातकों में पिछले साल की तुलना में इंटर्नशिप और औसत वजीफे की संख्या में वृद्धि देखी गई है.
एक और उत्साहजनक बात यह है कि कुछ ऐसे क्षेत्रों में भी मैनेजमेंट से जुड़ी नौकरियों के अवसर खुले हैं, जिन्हें पहले रोजगार पैदा करने वाले क्षेत्रों में नहीं गिना जाता था. उदाहरण के लिए, कृषि क्षेत्र में संकट के बावजूद, कृषि व्यवसाय और खाद्य क्षेत्र में प्रबंधकीय कौशल की मांग बढ़ रही है. टॉप बिजनेस स्कूलों में करियर विकल्प के रूप में कृषि-व्यवसाय और ग्रामीण प्रबंधन का चयन करने वाले छात्रों की बढ़ती संख्या, इसका प्रमाण है. उनके पास ऐसा करने का एक कारण है. प्रतिष्ठित नियोक्ता ग्रामीण अर्थव्यवस्था के जोखिम का अनुभव रखने वाले मैनेजमेंट ग्रेजुएट के वेतन पैकेज में लगातार वृद्धि कर रहे हैं. उदाहरण के लिए, इंस्टीट्यूट ऑफ रूरल मैनेजमेंट, आणंद (इरमा), जो वर्तमान में ग्रामीण और कृषि-व्यवसाय मैनेजमेंट में कई प्रोग्राम कराता है, इस विशेष क्षेत्र की बढ़ती मांग को पूरा करने के लिए वर्तमान में 360 छात्रों की अपनी क्षमता को बढ़ाकर 480 करने की योजना बना रहा है. संस्थान के 2019 के स्नातक बैच के लिए औसत वेतन में 36 प्रतिशत की छलांग दर्ज की गई. 2015 में जहां यह औसत 8.4 लाख रुपए सालाना था, वह 2019 में बढ़कर 11.5 लाख रुपए सालाना हो गया है.
एक और सकारात्मक प्रवृत्ति जिसका छात्रों के बीच उभार हो रहा है वह है नौकरी खोजने के बजाए उद्यमिता पर ध्यान केंद्रित करना. स्टार्ट-अप में हालिया उछाल के साथ, बी-स्कूल इनक्यूबेशन सेंटर स्थापित करके उद्यमिता-विकास कार्यक्रमों पर अब ध्यान केंद्रित कर रहे हैं. इंडिया टुडे के सर्वेक्षण में भी पाया गया है कि उद्यमिता में रुचि दिखाने वाले छात्रों की संख्या 2014 के बाद से बढ़ी है.
हालांकि, ये अभी भी छोटे कदम हैं और भारत में बिजनेस स्कूलों को बहुत बड़े बदलावों की आवश्यकता है. एसोचैम की रिपोर्ट ने मैनेजमेंट कॉलेजों को अपने बुनियादी ढांचे में सुधार, अपनी फैकल्टी को बेहतर प्रशिक्षण देने, उद्योगों के साथ तारतख्यता बढ़ाने पर काम करने, अनुसंधान और ज्ञान सृजन पर पैसा खर्च करने, साथ ही अच्छे शिक्षकों को आकर्षित करने के लिए फैकल्टी को अच्छा भुगतान करने की सलाह दी थी. उन्हें ये सब करना चाहिए, और तेजी से करना चाहिए.
सर्वेक्षण का तरीका
इंडिया टुडे ग्रुप के लिए सर्वश्रेष्ठ बिजनेस स्कूलों के वार्षिक सर्वेक्षण के 2019 संस्करण का आयोजन दिल्ली की प्रतिष्ठित मार्केट रिसर्च फर्म मार्केटिंग ऐंड डेवलपमेंट रिसर्च एसोसिएट्स (एमडीआरए) ने किया. इस प्रक्रिया में पीजीडीएम डिप्लोमा या एमबीए डिग्री के लिए पूर्णकालिक कक्षाओं में शिक्षा प्रदान करने वाले ऐसे स्कूलों को सूचीबद्ध किया गया था जिनकी स्थापना कम से कम पांच साल पहले हुई हो और कम से कम तीन स्नातक बैच पूरे हो चुके हों. इन स्कूलों से जानकारी हासिल करने के लिए एक वस्तुनिष्ठ प्रश्नावली इस सटीकता से तैयार की गई कि उससे विभिन्न चयनित मानकों तथा उप-मानकों के बारे में प्रत्येक बिंदु पर संस्थानों से नवीनतम और सर्वाधिक प्रासंगिक जानकारी प्राप्त हो सके.
इस प्रश्नावली को एमडीआरए और बिजनेस टुडे की वेबसाइटों पर प्रकाशित भी किया गया था. भागीदारी के मानदंड पूरे करने वाले देश के 2,350 से अधिक बिजनेस स्कूलों से ई-मेल, टेलीफोन और पत्रिकाओं में विज्ञापन के माध्यम से संपर्क किया गया और निर्धारित समयावधि में अपने संस्थान से संबंधित डेटा देने का आग्रह किया गया. इन प्रयासों के फलस्वरूप निर्धारित समयसीमा में देश भर के मात्र 285 संस्थानों ने अपने बारे में वांछित स्वरूप में सूचनाएं प्रदान कीं और रैंकिंग के लिए इन्हीं पर विचार किया गया.
वस्तुनिष्ठ डेटा प्राप्त करने के बाद विश्लेषण के पहले चरण में इन स्कूलों की ओर से प्रदान की गई जानकारी के हर पहलू को एमडीआरए के पास उपलब्ध जानकारी और डेटाबेस से जांचा गया. इसके दूसरे चरण में एमडीआरए शोधकर्ताओं ने दिए गए डेटा की शुद्धता तथा सटीकता सुनिश्चित करने के लिए भाग लेने वाले बिजनेस स्कूलों का भौतिक सत्यापन और ऑडिट किया.
डेटा की प्रामाणिकता सत्यापित करने के लिए शोधकर्ता दलों ने 40 से अधिक बिजनेस स्कूलों का दौरा किया था. इन दौरों में एमडीआरए शोध दल टीम ने उपलब्ध कराए गए डेटा का मूल दस्तावेजों तथा वास्तविक रूप से उपलब्ध इन्फ्रास्ट्रक्चर सुविधाओं से मिलान किया. भौतिक ऑडिट के दौरान मिली अनियमितताओं को अंतिम वस्तुपरक डेटा में संशोधित किया गया था. मूल्यांकन के पांच मानकों पर मिले अंकों (नीचे तालिका देखें) को जोड़ कर प्रत्येक संस्थान का कुल वस्तुनिष्ठ प्राप्तांक निकाला गया.
हितधारकों को यथार्थवादी, अद्यतन और सटीक जानकारी देने के लिए एमडीआरए ने इन स्कूलों का मूल्यांकन चालू वर्ष के डेटा के आधार पर किया है. इस प्रक्रिया में भाग लेने वाले बिजनेस स्कूलों को दी गई अंतिम रैंकिंग विभिन्न स्रोतों—जैसे कि संस्थान के पिछले डेटा, उनकी वेबसाइट पर दी गई जानकारी और अंतरराष्ट्रीय मान्यता निकायों—से विभिन्न स्तरों पर पुष्टि के बाद उन्हें मिले प्राप्तांकों पर आधारित थी. एमडीआरए की केंद्रीय टीम में कार्यकारी निदेशक अभिषेक अग्रवाल के नेतृत्व में परियोजना निदेशक अवनीश झा, वरिष्ठ अनुसंधान कार्यकारी राजन चौहान और सहायक अनुसंधान कार्यकारी प्रीति कश्यप शामिल थे.
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