ताकतवर-रसूखदारः शाश्वत योद्धा
मेधा पाटकर ने सिंगूर के नैनो प्लांट और नंदीग्राम में भी आंदोलन में अपनी भूमिका निभाई. लवासा से लेकर श्रीकाकुलम में एटमी ऊर्जा परियोजना तक हर जगह वे विस्थापितों के अधिकारों के लिए खड़ी रही हैं.

मेधा पाटकर
65 वर्ष सामाजिक कार्यकर्ता
क्योंकि वे तीन दशकों से लगातार विकास बनाम आम आदमी की लड़ाई में विस्थापितों की आवाज बनी हुई हैं. पहली बार उनका नाम 1989 में हरसूद में सुना गया था जब वे इंदिरा सागर बांध के डूब क्षेत्र में आ रहे गांवों के मसले पर खबरों में आई थीं. तब से मेधा हर उस जगह मौजूद होती हैं जहां इनसानों का विस्थापन सरकार के अमानवीय तौर-तरीकों से हुआ
क्योंकि वे सिर्फ नर्मदा घाटी की आवाज ही नहीं हैं. वे बड़े बांधों के खिलाफ मुखर रही हैं. उन्होंने महेश्वर बांध के विस्थापितों की लड़ाई भी लड़ी है और किसानों की हर समस्या पर उनके साथ नजर आती हैं
क्योंकि उन्होंने मुंबई के झुग्गीवासियों को बेघर होने से बचाने के लिए घर बचाओ, घर बनाओ आंदोलन 2005 में शुरू किया. उन्होंने यह आंदोलन मुंबई में तब शुरू किया था जब सरकारी आदेश के बाद 75,000 झुग्गियां तोड़ दी गई थीं
क्योंकि उन्होंने सिंगूर के नैनो प्लांट और नंदीग्राम में भी आंदोलन में अपनी भूमिका निभाई. लवासा से लेकर श्रीकाकुलम में एटमी ऊर्जा परियोजना तक हर जगह वे विस्थापितों के अधिकारों के लिए खड़ी रही हैं
सियासत की मेधा
पाटकर 2014 में मुंबई नॉर्थ-ईस्ट लोकसभा सीट से आप उम्मीदवार थीं, पर तीसरे स्थान पर रहीं.
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