लग्जरी विशेष-चाहिए शांत, सहज, सुरम्य सैर-सपाटा

आज दुनिया जलवायु परिवर्तन के मुहाने पर खड़ी है, इसलिए दुनियाभर में आतिथ्य-सत्कार उद्योग को शानो-शौकत के नए चलन की ईजाद करनी होगी, जो पर्यावरण के अनुकूल हो और उसके प्रति आकर्षण पैदा करना होगा

कैंप प्रवास का सुख बेहद निजी किस्म की सेवा मुहैया कराने वाले रिजॉर्ट शानो-शौकत के नए ठिकाने
कैंप प्रवास का सुख बेहद निजी किस्म की सेवा मुहैया कराने वाले रिजॉर्ट शानो-शौकत के नए ठिकाने

शोभा मोहन

पर्यटन का मतलब ही अस्थायी होता है और शानो-शौकत वाला पर्यटन तो और भी थोड़ा होता है. ऐसी कोई जगह नहीं, जहां ढेर सारा डीजल-पेट्रोल न फूंकें. इसमें उन तमाम सहूलतों को जोड़ दीजिए जो लग्जरी के नाम पर परोसी जाती हैं, और फिर आपको इस बात पर जरा भी हैरानी नहीं होगी कि हमारी हर यात्रा, ठहरना और घूमना-सब कार्बन नेगेटिव होते हैं. हालांकि घूमना-फिरना अपने आप में एक लग्जरी है, फिर भी हम पर्यटन के सकारात्मक पक्ष को नकार नहीं सकते.

कोशिश इस बात की होनी चाहिए कि पर्यटन के दुष्प्रभावों को कैसे संतुलित किया जा सके. अब ऐसे लोगों की तादाद बढ़ रही है जो जानने-समझने, मन को एकाग्र करने और नई ऊर्जा के साथ लौटने के लिए यात्राएं कर रहे हैं. इसलिए हम अगर लग्जरी को नए चलन में ढालकर पेश करें तो हर पर्यटन हमारी खूबसूरत धरती को बड़ी नजाकत के साथ देखना और घूमना-फिरना बन जा सकता है.

जो बात सबसे पहले दिमाग में आती है, वह है धीमे चलना. सहज भोजन और धीमा सफर हर चीज की गति को धीमा करने की दिशा में एक सांस्कृतिक बदलाव हो सकता है, ताकि हमारा मकसद दुनियाभर के भागमभाग वाला सैर-सपाटा करके खास-खास जगहों को छूने और केवल इंस्टाग्राम पर पोस्ट करने लायक भोजन करने का न रहे. हम कम जगहों की यात्रा करें और तब लग्जरी यह होगी कि हम तसल्ली से जाएं और हर जगह आराम से घूमें और वे सारे काम करें जो घिसी-पिटी लीक पर न हों. हम उस जगह के हर पहलू का भरपूर आनंद लें—भोजन, विरासत, संस्कृति, लोग—और फिर किसी जगह पर लंबे समय तक रुकने को ही लग्जरी माना जाए.

तेजी से व्यावसायिक होती दुनिया में हमें जिन चीजों से समझौता करना पड़ रहा है, वह है समय, स्वास्थ्य और अपने आसपास के लोगों से हमारे रिश्ते. नए चलन के लग्जरी पर्यटन का मकसद इन सारी चीजों को वापस लौटाने की दिशा में होना चाहिए और व्यावसायिकता को भी इन सारे मुद्दों पर ध्यान देने की दिशा में खुद को ढालना चाहिए. न्यूनतम डिजाइन, पर्यावरण-अनुकूल वास्तुशिल्प हो या हेरिटेज इमारतों को नए मकसद से ढाला जाए, मेहमानों को व्यक्तिगत सेवाएं मिलें, जिन्हें उनके कमरा नंबर की जगह नामों से संबोधित किया जाए. इस तरह आप एक ज्यादा संबद्ध दुनिया की तरफ लौट सकते हैं.

बगीचे इस तरह से फिर से संरक्षित किए जाएं कि उनमें तितलियों, पक्षियों और अन्य जीव-जंतुओं का प्राकृतिक स्थान बने. यह सहजीवन सामंजस्य के साथ जीने का एक सबक और सबब बने. ऐसे पर्यटन में खासियत यह हो कि आप ऐसी जगह रहें जहां अपने आप ही आपका डिजिटल संपर्क टूट जाए क्योंकि वहां न इंटरनेट हो और न मोबाइल कनेक्टिविटी ताकि परिवार आपस में मिलकर समय और स्थानीय खेतों और किचन गार्डन में ऑर्गेनिक उत्पादों से तैयार भोजन का लुत्फ उठाएं. इससे भोजन की बर्बादी करने वाले बफे की परिपाटी की जगह खेत से मेज तक वाले भोजन का चलन बढ़े.

जलवायु परिवर्तन हमारे दरवाजों पर दस्तक दे चुका है, ऐसे में हर व्यवसाय को तमाम उद्योगों में हो रही ज्यादतियों की चुनौतियों का सामना करने के लिए खुद को तैयार करना होगा. नए चलन के लग्जरी पर्यटन में यह जिम्मेदारी सैलानियों पर भी डाली जाए कि वे ब्रांड का चयन करें जो इस संकट से वाकिफ हो और इस दिशा में कदम भी उठा रहे हों, जैसे प्लास्टिक, खासकर एक बार ही इस्तेमाल होने वाले प्लास्टिक, का इस्तेमान न करें, जल संचयन की दिशा में काम करें, कूड़े की रीसाइक्लिंग और सुरक्षित तरीके से उसके निस्तारण को लेकर सक्रिय हों और भूमि तथा बाकी संसाधनों का जिम्मेदारी से इस्तेमाल करें. वह दिन दूर नहीं जब सैलानी इन मानकों के आधार पर अपने ठहरने का इंतजाम करेंगे. दरअसल ऐसा करने का समय आ चुका है!

यह तो पाखंड की इंतिहा है कि बड़ी कंपनियां जिम्मेदार लग्जरी की बात तो करें लेकिन उन्हीं इलाकों में नए होटल खोलें जहां पहले ही से होटलों की भरमार है. कहने का मतलब यह कि नए चलन के लग्जरी ट्रैवल को मुख्यधारा का हिस्सा बनना होगा और उसे सरकार के पर्यटन घोषणापत्र में शामिल करना होगा.

नए चलन के लग्जरी ट्रैवल का प्रचलन बढ़े, इसके लिए जरूरी है कि उद्योग उसे अपनाएं और लोगों को वह आकर्षक लगे. आतिथ्य-सत्कार उद्योग स्थानीय समुदायों के प्रति जवाबदेही से भाग नहीं सकता. इसमें सबसे पहले तो यह बात गांठ बांध लेनी चाहिए कि स्थानीय संसाधनों पर वहां के लोगों का हक होता है और वे सैलानियों को केवल इस्तेमाल के लिए किराए पर दिए जाते हैं. विरासत और प्रकृति का संरक्षण, गैर-मोटर गतिविधियां, समुदाय से मेलजोल व उनके जीवनयापन पर सकारात्मक प्रभाव, अमूर्त सांस्कृतिक विरासत को रेखांकित करना, भूमि व संसाधन के इस्तेमाल को लेकर संवेदनशील होना—ये सब नए चलन के लग्जरी सैर-सपाटा के मानक हो सकते हैं. इन सबसे पर्यटन को लेकर शहरी प्रवास की प्रवृत्तियां भी कम होंगी.

मुझे यकीन है कि जागरूकता बढ़ जाए तो हर सैलानी अपने हिसाब से  अपनी हर यात्रा में तरीके से इस तरह के विकल्प चुन सकता है जिनसे अंतत: उसका कार्बन फुटप्रिंट कम हो जाए. जलवायु परिवर्तन से बदलाव अब मजबूरी बनता जाता है और अगली पीढिय़ां हम पर दबाव डालें, उससे पहले हमें नए चलन के पर्यटन की ओर बढ़ जाना चाहिए, वही अब रास्ता बचा है.

—शोभा मोहन संस्थापक, रेयर इंडिया.

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