जड़ों की ओर लौटने का वक्त
इन सबको जोड़ते जाइए, तो आपको एक खास रुझान आकार लेता दिखाई दे जाएगा. सांस्कृतिक, राजनैतिक और आर्थिक उठापटक के दौर में लग्जरी ब्रांड खुद को प्रासंगिक बनाए रखने के लिए संघर्ष कर रहे हैं, और जो चीज बाकी रह गई है.

प्राची भूचर
लग्जरी या शानो-शौकत की दुनिया पहेली जैसी है; उसे जियो तो मुश्किल और न जियो तो मुश्किल. वर्षों से लग्जरी का बाजार वजूद के संकट से जूझ रहा है—आखिर कितना है जो काफी है? लग्जरी के मायने उत्पाद से होने चाहिए या एहसास से? क्या हमें किसी ब्रांड की मुहर का पीछा छोड़कर नामालूम (और लिहाजा सामान्य से भी ज्यादा महंगे) सामान को अपनाना चाहिए?
और, क्या हमें इस बात की भी परवाह करनी चाहिए कि कोई ब्रांड कितना टिकाऊ है? तो ऐसे में जब लोग इन सवालों के साथ माथापच्ची कर रहे हैं और इस बात को समझने की कोशिश कर रहे हैं कि आखिर कोई स्मार्ट उपभोग क्या हो सकता है, यह बात तो साफ होती जा रही है कि हमारे सामने जितना ज्यादा परोसा जा रहा है, उतना ही आशंकित हम उसे आंखें मूंदकर इस्तेमाल करने को लेकर होते जा रहे हैं.
पिछले सालभर से यह बताने को धीमे-धीमे कदम बढ़े हैं कि लग्जरी असल में किसे कहेंगे. एक तरफ लोग पैसे से खरीदी जा सकने वाली बेहतरीन की फिराक में हैं, वहीं कुछ लोगों में इस बात की भी चाह है कि वे असली रिश्ते बनाएं और उन ब्रांड को अपनाएं जो उन्हें यह महसूस न कराते हों कि उनमें न तो कोई सोच है और न ही कोई एहसास. इन सारे चलन के मद्देनजर इस साल हमारे लग्जरी विशेष में सहज और बुनियादी बातों को केंद्र में रखा गया है और नए चलन की लग्जरी को इसी नजरिए से देखा गया है.
ब्रांड्स और यहां तक कि एहसास के साथ भी बुनियादी रिश्ता कायम करने की इच्छा को ही हमारे इस अंक के सभी स्तंभकार अपनी तरह से व्यक्त करते हैं. टिकाऊ और जागरूक पर्यटन जैसे लफ्ज अब ज्यादा पुख्ता तौर पर कहे जाने लगे हैं; और यहां तक कि लग्जरी होटल ब्रांड भी अपने मेहमानों को इस बात के लिए जागरूक कर रहे हैं कि वे किस तरह सभी मामलों में जागरूक होकर चीजों का इस्तेमाल कर सकते हैं. इसी तरह डिजिटल दुनिया के कोलाहल में एक खामोश पहल इस दिशा में भी हो रही है कि कुछ समय डिजिटल संपर्कों से दूर रहकर बिताया जाए क्योंकि उसमें भी एक राहत है.
खाने का भी मकसद है—थोड़ा ही वहां पर्याप्त है और स्थानीय पर जोर है—और, यह चलन कुछ समय से तेजी पकड़ रहा है. अब असली लग्जरी उन रेस्तरांओं में जाने में देखी जा रही है जो दूर-दराज का खाना मंगाने के बजाए भूले-बिसरे स्थानीय जायकों को पेश कर रहे हैं. यही बात घडिय़ों के मामले में भी देखी जा रही है, जिसमें लंबे अंतराल के बाद हम लोगों की पसंद को फिर से मैकेनिकल घडिय़ों की ओर मुड़ता देख रहे हैं जो आज की भागादौड़ी की दुनिया में अलग तरह की लग्जरी दे रही हैं.
इन सबको जोड़ते जाइए, तो आपको एक खास रुझान आकार लेता दिखाई दे जाएगा. सांस्कृतिक, राजनैतिक और आर्थिक उठापटक के दौर में लग्जरी ब्रांड खुद को प्रासंगिक बनाए रखने के लिए संघर्ष कर रहे हैं, और जो चीज बाकी रह गई है, वह है उनकी शांत, सुंदर, सुरम्य पर्यटन की पेशकश और सबसे बढ़कर लग्जरी को नए चलन में ढालने की उनकी उत्कट इच्छा.
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