आधा-अधूरा प्रोत्साहन
कॉर्पोरेट कंपनियों के बेहतर मुनाफे की उम्वमीद से सेंसेक्स ने 3,300 अंकों की उछाल दर्ज की—जो खरीद-फरोख्त के महज दो सत्रों में 8 फीसद उछाल थी. मगर यह सारा उत्साह कितना उचित और तर्कसंगत है?

केंद्र सरकार का कॉरपोरेट टैक्स में 30 फीसद कटौती का फैसला एक-दो साल की देरी से आया है. मगर पहले घोषित 25 फीसद से भी आगे बढ़कर 22 फीसद की आधार दर के ऐलान से शेयर बाजारों की बांछें खिल गईं. कंपनियों को अब 25.17 फीसद की प्रभावी दर से भुगतान करना होगा, जो 34.94 फीसद की मौजूदा दर से बहुत कम है. 1 अक्तूबर, 2019 के बाद बनाई गई मैन्युफैक्चरिंग कंपनियों को तो और भी कम महज 15 फीसद की दर से कर चुकाना होगा—जो दुनिया में सबसे कम कर दर होगी—जबकि प्रभावी दर 17.01 फीसद आएगी.
कॉर्पोरेट कंपनियों के बेहतर मुनाफे की उम्वमीद से सेंसेक्स ने 3,300 अंकों की उछाल दर्ज की—जो खरीद-फरोख्त के महज दो सत्रों में 8 फीसद उछाल थी. मगर यह सारा उत्साह कितना उचित और तर्कसंगत है?
कॉर्पोरेट टैक्स में कटौती से साबित होता है कि केंद्र सरकार अब भी यही मानती है कि अर्थव्यवस्था में सुस्ती निवेश की कमी की वजह से है, मांग में कमी की वजह से नहीं. इसीलिए वह मांग के अर्थशास्त्र पर काम करने के बजाए सप्लाई या आपूर्ति के अर्थशास्त्र पर काम कर रही है. बीते कुछ हफ्तों में वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने कई सारी प्रेस कॉन्फ्रेंस में जो घोषणाएं कीं, उन सबका मकसद धन के प्रवाह को बढ़ाना है—चाहे वह कारोबारों के लिए ऋण में बढ़ोतरी हो, या कारोबार करने में आसानी में सुधार लाना, बैंकों का विलय और ढांचागत सुधार, सस्ते रियल एस्टेट के लिए दबावग्रस्त परिसंपत्ति फंड लागू करना. यह सब वे इस उम्मीद में कर रही हैं कि निजी निवेशों में अच्छी-खासी बढ़ोतरी को अंजाम दे सकेंगी.
यह नादानी है. दुर्ग्राह्य निजी निवेशों का इंतजार करते हुए भारत पहले ही तीन कीमती तिमाहियां गंवा चुका है और अर्थव्यवस्था लगातार नीचे ही गई है. इसके बजाए केंद्र को मांग के अर्थशास्त्र पर काम करना चाहिए—यानी जीएसटी में कटौती के जरिए खपत को बढ़ाना, नीतिगत ब्याज दरों में आरबीआइ की कटौतियों को उधार लेने वालों तक पहुंचाना और निजी आयकर पर राहत देना. हैरानी कि वित्त मंत्री इसके लिए इच्छुक दिखाई नहीं देतीं.
आर्थिक वृद्धि में नई जान फूंकने के लिए भारत को दोनों की जरूरत है—लोगों के हाथ में खर्च करने लायक ज्यादा पैसा और कॉर्पोरेट कंपनियों के पास निवेश करने लायक ज्यादा रकम. वित्त मंत्री सीतारमण की कर कटौतियां समस्या के केवल एक छोर से निपटने का जतन करती हैं. इसलिए यह आधा-अधूरा प्रोत्साहन है—यह मांग को बढ़ाने का कोई जतन नहीं करता.
कर कटौतियों से केंद्र के खजाने को 1.45 लाख करोड़ रुपए की चपत लगेगी. यह रकम कंपनियां नए क्षमता निर्माण में निवेश करेंगी और आर्थिक वृद्धि को रफ्रतार देंगी. पर क्या ऐसा निवेश होने की उम्मीद है? कतई नहीं. जब बाजार में मांग ही नहीं है, तो कंपनियां भला उत्पादन क्षमता बढ़ाने में निवेश क्यों करना चाहेंगी, खासकर तब जब उनकी मौजूदा क्षमता का (तमाम क्षेत्रों में करीब 30-50 फीसद) इस्तेमाल ही नहीं हो पा रहा. नतीजा यह होगा कि कर में कटौती की बदौलत कंपनियों के हाथ में जो अतिरिक्त रकम आएगी, वह मांग बढ़ाने में लगने के बजाए कंपनियों की शुद्ध आमदनी और मुनाफा बढ़ाने में जाएगी.
मांग में गिरावट से निपटे बगैर सप्लाई के मुद्दों पर निशाना साधने से रही-सही उम्मीद भी जाती रही. ऑटोमोबाइल और रियल एस्टेट जैसे उद्योग इतनी बुरी तरह ध्वस्त हैं कि उनके पास ज्यादा छूट देकर मांग बढ़ाने की गुंजाइश ही नहीं है. उपभोक्ताओं का भरोसा कम है और तरलता की स्थिति तंग बनी हुई है. यही वजह है कि अच्छे-खासे कयास लगाए जा रहे हैं कि इस रकम का इस्तेमाल किन चीजों में किया जा सकता है. मारुति के आर.सी. भार्गव कहते हैं कि उनकी कंपनी ज्यादा से ज्यादा इतना कर सकती है कि कीमतों में 0.5 फीसद की कटौती कर दे, हालांकि वह अचानक मिली इस रकम को रिसर्च में खर्च करना चाहेगी.
दूसरी कंपनियां 8 फीसद की कर कटौती से हाथ आई रकम का इस्तेमाल विज्ञापन और मार्केटिंग को बढ़ाने में कर सकती हैं, इसलिए भी क्योंकि भारत में विज्ञापनों पर करीब 40 फीसद खर्च अक्तूबर-नवंबर के त्यौहारी महीनों में किया जाता है. बीते साल विज्ञापनों पर इन महीनों के दौरान 25,000 करोड़ रु. से ज्यादा खर्च किए गए थे. इस साल इनके 30,000 करोड़ रु. से ऊपर पहुंच जाने की उम्मीद है.
नई मैन्युफैक्चरिंग कंपनियों के लिए 15 फीसद कर दर की पेशकश का मकसद उन्हें आकर्षित करना है जो चीन से बाहर निकलना चाहती हैं या निवेश के लिए विकल्पों की तलाश कर रही हैं. मगर वियतनाम, ताइवान, थाइलैंड—जहां सभी के यहां 20 फीसद कॉर्पोरेट टैक्स है—और सिंगापुर, मलेशिया तथा बांग्लादेश (17, 24 और 25 फीसद) बड़ी चुनौती बने हुए हैं. यही नहीं, अगर कंपनियां भारत का रुख करती भी हैं तो अर्थव्यवस्था पर उनके निवेशों का असर दिखाई देने में दो से तीन साल का वक्त लगेगा.
उधर, इन आधे-अधूरे प्रोत्साहनों की कीमत खजाने को 1.45 लाख करोड़ रु. से चुकानी होगी. कर राजस्व में वृद्धि का भी कोई सबूत नहीं है (कर संग्रह इस वित्तीय साल के लक्ष्य से भारी अंतर से पीछे चल रहा है). इसकी मार सबसे पहले भारत के राजकोषीय घाटे पर पडऩे की संभावना है—विश्लेषकों को आशंका है कि 2019-20 में राजकोषीय घाटा बढ़कर 3.8-4 फीसद पर पहुंच जाएगा.
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