कानून के कुछ ज्यादा लंबे हाथ
आरटीआइ अधिनियम के तहत प्राप्त जानकारी के अनुसार, अप्रैल, 2016 और दिसंबर 2017 के बीच जम्मू-कश्मीर सलाहकार बोर्ड ने 99 फीसद से अधिक निरोध आदेशों की पुष्टि कर दी. लेकिन इनमें से 81 फीसद पुष्टि को बाद में जम्मू और कश्मीर उच्च न्यायालय ने रद्द कर दिया.

अनुच्छेद 370 के प्रभावी रूप से खत्म होने की संवैधानिक चुनौतियों के बाद, अब हमारी अदालतों का ध्यान उन बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिकाओं पर है जिनमें जम्मू और कश्मीर में नजरबंदी के मामलों को चुनौती दी गई है. उच्चतम न्यायालय में दायर राज्यसभा सांसद और एमडीएमके नेता वाइको की नवीनतम याचिका में, उम्र के आठवें दशक में पहुंच चुके जम्मू और कश्मीर के पूर्व मुख्यमंत्री फारूक अब्दुल्ला को अदालत में पेश करने की मांग की गई है.
निवारक निरोध कानून भारत में संवैधानिक लोकतंत्र की स्थापना के बाद से कानून की किताबों में मौजूद हैं. यह उन लोगों को हिरासत में लेने की अनुमति देता है जिनसे सार्वजनिक कानून व्यवस्था या राज्य की सुरक्षा को खतरा हो सकता है या वे कोई अपराध कर सकते हैं. सत्तारूढ़ दलों की ओर से राजनैतिक विरोधियों के खिलाफ उन कानूनों के दुरुपयोग का भी इतिहास है. जक्वमू और कश्मीर सार्वजनिक सुरक्षा अधिनियम (जेकेपीएसए), राज्य का अपना निवारक निरोध कानून है जिसे 1978 में लागू होने के बाद से ही बार-बार इस्तेमाल किया जाता रहा. राज्य की प्रमुख सियासी हस्तियों की हालिया गिरक्रतारी के लिए यह सबसे पसंदीदा साधन रहा है.
अनुच्छेद 370 के 'कमजोर' पडऩे के नौ दिन बाद 14 अगस्त को ही नौकरशाह से नेता बने शाह फैसल के खिलाफ जेकेपीएसए को लागू किया गया था. वाइको की बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका के बाद 'सार्वजनिक व्यवस्था के लिए खतरा' बताते हुए फारूक अब्दुल्ला को नजरबंद कर दिया गया. ये दो मामले सबसे ताजा उदाहरण हैं कि किस प्रकार जेकेपीएसए या राष्ट्रीय सुरक्षा कानून (एनएसए) जैसे कड़े निवारक नजरबंदी प्रावधानों का उपयोग सत्तारूढ़ प्रतिष्ठान आलोचकों की आवाज को दबाने के लिए कर सकता है—कभी-कभी तो नजरबंदी कई वर्षों की भी हो सकती है.
यह कानूनी प्रावधानों से संभव हुआ है जो हिरासत में लेने के बाद बंदियों को गिरफ्तारी की वजहों की तत्काल जानकारी देने, कानूनी मदद और जमानत जैसे बुनियादी अधिकार, जो 'गिरक्रतार' लोगों के पास होते हैं पर 'नजरबंद' लोगों के पास नहीं, से वंचित करने के अलावा बंद दरवाजों के पीछे सुनवाई जैसे अतिरंजित अधिकार सत्ता प्रतिष्ठानों को देता है. मसलन, एनएसए और जेकेपीएसए के तहत, सरकार बिना कारण बताए किसी को 10 दिन के लिए हिरासत में ले सकती है. उसके बाद भी, सरकार को लगे कि यह प्रकटीकरण सार्वजनिक हित के खिलाफ है, तो नजरबंदीआदेश को प्रभावी ढंग से चुनौती देना मुश्किल है.
सेवानिवृत्त न्यायाधीशों की अध्यक्षता वाला एक सलाहकार बोर्ड सभी निरोध आदेशों की समीक्षा करता है. बोर्ड इसकी पुष्टि या निरस्त करने का निर्णय ले सकता है और इसमें 12 सप्ताह लग सकते हैं. पर बोर्ड एक सक्षम निगरानीकर्ता होने के बजाए, नियमित रूप से इन निरोध आदेशों की पुष्टि कर देते हैं, जैसा कि जेकेपीएसए का हालिया अनुभव रहा है. आरटीआइ अधिनियम के तहत प्राप्त जानकारी के अनुसार, अप्रैल, 2016 और दिसंबर 2017 के बीच जम्मू-कश्मीर सलाहकार बोर्ड ने 99 फीसद से अधिक निरोध आदेशों की पुष्टि कर दी. लेकिन इनमें से 81 फीसद पुष्टि को बाद में जम्मू और कश्मीर उच्च न्यायालय ने रद्द कर दिया. यह जेकेपीएसए के दुरुपयोग की ओर इशारा करता है, क्योंकि अधिकतर निरोध आदेशों को उच्च न्यायालय ने अवैध पाया.
एनएसए के तहत निवारक निरोध प्रावधानों का उपयोग सियासी वजहों से किया गया है. उत्तर प्रदेश में दलित अधिकार कार्यकर्ता चंद्रशेखर आजाद और मणिपुर में पत्रकार किशोरचंद्र वांग्मेचा के हालिया मामले इसके उदाहरण हैं. दोनों ही, प्रदेश सरकार के मुखर आलोचक रहे हैं. दोनों मामलों में, उन्हें अन्य आपराधिक मामलों में जमानत मिलने के तुरंत बाद निरोध आदेश दिए गए ताकि उनकी हिरासत अवधि बढ़ाई जा सके. मसलन, आजाद के मामले में 'गिरफ्तारी' को 'निवारक निरोध' में बदल दिया गया, जिसके सियासी कारण थे.
सुप्रीम कोर्ट ने भी उन्हें संवैधानिक रूप से बरकरार रखा है, पर निवारक निरोध कानूनों के तहत राज्य को दी गई अपार शक्तियां इस खतरे को बढ़ाती हैं कि इन कानूनों के जरिए नागरिकों की स्वतंत्रता का हनन किया, राजनैतिक तथा वैचारिक विरोधियों को निशाना बनाया जा सकता है. न्यायमूर्ति कृष्ण अय्यर ने मेनका गांधी (1978) मामले में, एक बड़ी टिप्पणी की थी, ''अगर न्यायविरुद्ध कानून को हटाया नहीं जाता तो कानूनी अवैधता नियम बन जाता है.'' निवारक निरोध कानूनों का हर दुरुपयोग उनके विवेचनात्मक पुन: परीक्षण का और भी मजबूत आधार बनाता है.
हर्ष बोरा क्रिमिनल लॉयर हैं और दिल्ली की अदालतों तथा दिल्ली हाइकोर्ट में प्रैक्टिस करते हैं.
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