100 दिन मोदी-मजबूत किलाबंदी

चीफ ऑफ डिफेंस स्टाफ और कॉर्पोरेटाइज्ड ऑर्डनेंस फैक्ट्री बोर्ड से उम्मीद की जानी चाहिए कि इससे फैसला लेना सहज होगा और सैन्य जरूरतें समय से पूरी होंगी

एएनआइ
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अब तक क्या किया गया

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने इस वर्ष के स्वतंत्रता दिवस के भाषण में आखिरकार लगभग दो दशकों से लंबित मुद्दे को लेकर घोषणा कर ही दी. दरअसल, उन्होंने एक चीफ ऑफ डिफेंस स्टाफ (सीडीएस) की नियुक्ति की घोषणा की जो सरकार का सिंगल पॉइंट सैन्य सलाहकार होगा. रक्षा पर कैबिनेट समिति की ओर से मंजूर इस घोषणा ने स्वतंत्रता के बाद के भारत के सबसे बड़े सैन्य सुधार का मंच तैयार किया है

सरकार ने रक्षा मंत्रालय (एमओडी) के 41 आयुध कारखानों को कॉर्पोरेटाइज करने का फैसला लिया है जो भारतीय सेना के लिए कपड़ों से लेकर बख्तरबंद वाहनों, राइफलों से लेकर तोपखाने की जरूरतों तक, सब कुछ बनाते हैं. निर्णय की औपचारिक घोषणा होनी बाकी है, लेकिन प्रक्रिया शुरू हो चुकी है. कारखाने रक्षा उत्पादन विभाग के संलग्न कार्यालयों के रूप में कार्य करते हैं, जो रक्षा मंत्रालय का ही एक हिस्सा है. सामूहिक रूप से वे दुनिया के सबसे बड़े रक्षा विभाग का अंग हैं और कोलकाता स्थिति आयुध फैक्ट्री बोर्ड (ओएफबी) के तत्वावधान में काम करते हैं.

ओएफबी को 80 प्रतिशत से अधिक ऑर्डर सेना से मिलते हैं. इसे 2,000 करोड़ रुपए से अधिक का वार्षिक रक्षा बजट मिलता है, इसमें 82,000 कर्मचारी काम करते हैं और इसके पास 60,000 एकड़ से अधिक भूमि है. फिर भी, यह सेना की आवश्यकताओं का 50 प्रतिशत भी बमुश्किल पूरा कर पाता है. ओएफबी के एकाधिकार को समाप्त करने के लिए पहला कदम पिछले साल उठाया गया था, जब सरकार ने 275 गैर-प्रमुख वस्तुओं को अधिसूचित किया जिसे सशस्त्र बल खुले बाजार से खरीद सकते थे

क्या यह पर्याप्त है?

सीडीएस तो सिर्फ पहला कदम है. भारत, दुनिया के सबसे ज्यादा रक्षा खर्चों वाले पांच देशों में शामिल है, फिर भी यह उसे सैन्य महाशक्ति बनाने में असमर्थ रहा है. हमें सशस्त्र बलों की तीन सेवाओं के प्रयासों के बीच तालमेल बैठाना होगा

अगला कदम 17 एकल-सेवा कमान को दो या अधिक सेवाओं के लोगों को साथ लेकर कम संख्या में बहु-सेवा कमान में बदलना होना चाहिए

अतीत में तीन सरकारी समितियों ने ओएफबी के कॉर्पोरेटाइजेशन का सुझाव दिया था. 2000 में, टी.के.ए. नायर समिति ने ओएफबी को आयुध फैक्टरी कॉर्पोरेशन लिमिटेड में बदलने की सिफारिश की थी. 2004 में विजय केलकर समिति ने इसी तरह की रूपरेखा पेश की थी. 2015 में, वाइस एडमिरल रमन पुरी समिति ने ओएफबी को कॉर्पोरेट की शक्ल देकर उसे तीन या चार खंडों में विभाजित करने का सुझाव दिया था, जिनमें हर खंड को—हथियार, गोला-बारूद, लड़ाकू वाहन निर्माण में से किसी भी एक क्षेत्र में विशेषज्ञता हो

ओएफबी के उत्पादों के साथ गुणवत्ता और मूल्य के ज्यादा होने जैसे मसले होते हैं क्योंकि इसे ऑर्डर नॉमिनेशन के जरिए मिलते हैं न कि बाजार की प्रतिस्पर्धा के जरिए. मूल्य और गुणवता में सुधार प्राथमिकता होनी चाहिए

और क्या करने की जरूरत है

भारत को राष्ट्रीय सुरक्षा नीति की जरूरत है, जिसमें देश के राजनैतिक कर्ताधर्ता राष्ट्रीय सुरक्षा लक्ष्यों को परिभाषित करें. सशस्त्र बलों के लिए रणनीति यहीं से आगे बढ़ेगी. राजनैतिक या सैन्य रणनीति के अभाव में, कोई भी सुधार ऐसा रोडमैप होगा जो किसी अनजाने गंतव्य की ओर लेकर जाता हो

सरकार को विजय केलकर समिति के ओएफबी को तीन समूहों में बांटने के सुझाव पर विचार करना चाहिए. इनमें एक समूह जो विस्फोटक और गोला-बारूद का निर्माण करता है, उसे सरकारी नियंत्रण में बनाए रखना चाहिए; दूसरा, बख्तरबंद वाहनों और तोपखाना की जरूरतों का सामान बनाने वाला समूह हो जिसे निजी-सार्वजनिक क्षेत्र की साझेदारी में चलाया जा सकता है. कपड़े, वर्दी और टेंट बनाने वाले तीसरे समूह को निजी क्षेत्र को बेचा जा सकता है

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